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ब्लॉग

बिचौलियों के चक्रव्यूह में फंसा विकास

"केंद्र सरकार से एक रुपया चलता है, जो गरीबों तक पहुंचते पहुंचते 15 पैसा बचता है" - राजीव गांधी का यह बयान भारत के लिए जितना 30 साल पहले प्रासंगिक था, उतना ही आज भी है.

भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी बिचौलियों की तरफ इशारा कर रहे थे और कितनी अजीब बात है कि वह खुद भी बिचौलिएपन के आरोप से नहीं बच पाए. उनके करियर में सबसे बड़ा दाग बोफोर्स तोप सौदे का है, जिसमें बिचौलियों का हाथ होने की बात है.

भारत की आधारभूत संरचना इन बिचौलियों और इनसे पनपने वाले भ्रष्टाचार के इर्द गिर्द घूमती है. चाहे उच्च स्तर पर रक्षा खरीद सौदे हों या फिर छोटे किसानों के उत्पाद. बिना बिचौलियों के कोई सौदा पूरा नहीं होता. हाल ही में ऑगस्टा वेस्टा हेलिकॉप्टर और टाट्रा ट्रक के रक्षा सौदों पर भी भ्रष्टाचार और बिचौलियों के छींटे पड़े.

देश की आबादी का आधा से ज्यादा हिस्सा खेती पर निर्भर है लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी 15 फीसदी भी नहीं है. आखिर ऐसा क्यों है. दिल्ली की ग्लोबलएग्री सिस्टम ने इस पर रिसर्च कर डाली और पता चला कि किसान जब सामान बेचने निकलता है, तो थोक मंडी में उसका सामान औने पौने खरीद लिया जाता है. बाद में इसे महंगे दाम पर सप्लाई कर दिया जाता है. संस्था का दावा है कि इस अपारदर्शी व्यवस्था में बिचौलियों के हाथ में कीमत का 75 फीसदी लगता है, जबकि अनाज उपजाने वाले किसान को 15 से 20 फीसदी में संतोष करना पड़ता है.

Bofors Waffen im Einsatz in Indien

रक्षा सौदे भी रहे हैं सवालों में

ऐसा नहीं कि यह व्यवस्था दूसरे देशों में नहीं. खेती के मामले में ज्यादातर देश इसी संरचना पर काम करते हैं लेकिन वहां बिचौलियों का मार्जिन 30 फीसदी से ज्यादा नहीं होता. इसे तय कर दिया गया है. और सिर्फ खेती ही क्यों, भारत में भला कौन सा काम बिचौलियों के बिना होता है. ड्राइविंग लाइसेंस से लेकर पासपोर्ट बनवाने तक. हर जगह बिचौलियों की जेब गर्म करने से काम आसान हो जाता है, जो उस गर्मी का थोड़ा हिस्सा अधिकारियों तक पहुंचाता है. स्कूल पास करने के बाद किसी भी बच्चे का यह पहला अनुभव होता है, जो निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार की पहली सीढ़ी बन जाता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री रामविलास पासवान तक इन बिचौलियों की समस्या पर बयान दे चुके हैं. वक्त आ गया है कि बयान से आगे बढ़ कर इन्हें अमली जामा पहनाया जाए.

यह जान कर कितना अजीब लगता है कि हीरों के खान अफ्रीकी देशों और रूस में हैं. लेकिन भारत में उन्हें तराशे जाने से पहले एंटवर्प, बेल्जियम और दुबई के बाजारों में रगड़ खानी पड़ती है. वहां से अंतरराष्ट्रीय बिचौलिए इन्हें सूरत, वडोदरा और दूसरे भारतीय हिस्सों में पहुंचाते हैं. बदले में भारी कमीशन लेते हैं.

मोदी सरकार की कोशिश है कि कच्चे हीरे खानों से निकल कर सीधे भारतीय बाजार में आ जाएं और बीच की कड़ी को तोड़ा जा सके. इसके लिए खास नोटिफाइड जोन भी बनाया जा रहा है. हीरों के उद्योग में जब चीन ने भारतीय बाजार में सेंध लगाना शुरू किया, तो सरकार की नींद खुली है. उद्योग के लिए आसान शर्तें तय की जा रही हैं, टैक्स नियम बदले जा रहे हैं. रूस से कच्चे हीरों के सौदे की डील हो रही है.

लेकिन सिर्फ हीरा उद्योग से बात नहीं बनने वाली. देश के हर तबके को भ्रष्टाचार के इस दीमक से दूर करना होगा. सरकार को पहले खुद विश्वास करना होगा और बाद में नागरिकों को भरोसा दिलाना होगा कि बिचौलियों के बगैर भी कारोबार हो सकता है. उन्हें नजरअंदाज किए जाने की जगह उन पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी. हो सकता है कि पूंजीवादी आर्थिक जरूरतों में बिचौलियों के बगैर कारोबार न हो पाए. जहां जरूरत हो, उनके लिए कानूनी दायरे में सीमित कमीशन का प्रावधान करना होगा. और यह काम हर क्षेत्र में करना होगा. खेती किसानी से लेकर रक्षा सौदों तक.

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