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ब्लॉग

बाल मजदूरी पर चिंता है कार्रवाई नहीं

पूरी दुनिया में बाल मजदूरी पर रोक न लगा पाने को लेकर चिंताएं हैं. भारत समेत कई देशों में असंगठित क्षेत्र में बाल मजदूरी एक विकराल समस्या बन गई है. सरकार के कार्यक्रम भी कुछ दूर चलकर दम तोड़ रहे हैं.

पिछले दिनों अर्जेटीना की राजधानी ब्युनस आयर्स में चौथे वैश्विक सम्मेलन में 190 देशों के करीब दो हजार प्रतिनिधियों ने 2025 तक बाल मजदूरी को पूरी तरह मिटाने का संकल्प लिया. लेकिन ये लक्ष्य करीब करीब असंभव भी बताया गया क्योंकि देशों में बाल मजदूरी मिटाने वाली, आमूलचूल बदलावों की प्रक्रिया नदारद है.  युद्ध, प्राकृतिक आपदा, भुखमरी, बीमारी, बेरोजगारी, पलायन और विस्थापन ने हालात और पेचीदा कर दिए हैं. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, आईएलओ के मुताबिक दुनिया में कुल 15 करोड़ बाल मजदूर हैं.

भारत में भी बाल मजदूरी प्रकट-अप्रकट कई स्तरों पर मौजूद है जबकि उन्मूलन के उपाय कमतर हैं. कैम्पेन अंगेस्ट चाइल्ड लेबर संस्था के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में एक करोड़ 26 हजार से ज्यादा बाल मजदूर काम कर रहे हैं. इनमें से सबसे ज्यादा बाल मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में हैं. ध्यान देने की बात है इन सबसे कुख्यात पांच राज्यों में से चार हिंदीभाषी उत्तर भारतीय राज्य हैं. भारत में 80 फीसदी बाल श्रमिक ग्रामीण इलाकों में हैं. 14-17 साल के 63 फीसदी बच्चे, खतरनाक व्यवसायों से जुड़े हैं.

बाल मजदूरी से निपटने के लिए कार्यदायी संस्थाएं हैं, नीति और अभियान हैं, यहां तक कि अब तो कैलाश सत्यार्थी जैसा बाल अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्ट के नाम नोबेल शांति का पुरस्कार भी है. लेकिन ये भी एक तथ्य है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, आईएलओ की न्यूनतम आयु संधि 1973 (संख्या 138) पर अनुमोदन नहीं कर पाया है जिसमें वैश्विक स्तर पर बच्चों को काम पर रखने के जमीनी नियम कायदे निर्दिष्ट हैं. आईएलओ का, न्यूनतम आयु से जुड़े दूसरे निर्देश का भी भारत में कायदे से अनुपालन नहीं होता जबकि भारत इसका अनुमोदन कर चुका है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चे किसी भी तरह के पेशे में काम पर नहीं रखे जाएंगें. इस तरह देखा जाए तो देश के कुल राष्ट्रीय उत्पाद में बच्चे भी खर्च हो रहे हैं. भारत में हर 11 बच्चों में एक, अपनी जीविका खुद कमाता है. यानी वो मजदूरी करता है. अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी और मुस्लिम वर्गों में बाल मजदूरी का आंकड़ा चिंताजनक है. ‘चाइल्ज रिलीफ ऐंड यू' यानी क्राई नाम की संस्था के मुताबिक पिछले दस साल के दरम्यान देश में बाल मजदूरी सिर्फ 2.2 प्रतिशत की दर से ही नीचे आ पाई.

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1986 में बाल श्रम निरोधी कानून बन चुका था. इसमें संगठित क्षेत्र पर ही फोकस था. लेकिन विशाल असंगठित क्षेत्र अनदेखा ही रह गया. 90 के दशक के बाद नवउदारवादी बाजार उन्मुख नीतियों और तीव्र भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने इस पहलू को कमोबेश भुला ही दिया कि असंगठित क्षेत्र में कितना बाल श्रम झोंका गया है. 1987 में सातवीं पंचवर्षीय योजना के तहत भारत सरकार ने नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट, एनसीएलपी शुरू किया. प्रोजेक्ट के तहत कुछ सार्थक उपाय किए गए हैं. एनसीएलपी के प्रशिक्षण केंद्रों में शिक्षा, व्यवसायिक प्रशिक्षण, मिड डे मील, मानदेय, स्वास्थ्य सेवाएं- इन सब योजनाओं को बच्चों के समग्र विकास से जोड़ा गया. इसमें चार लाख ले ज़्यादा कामगार बच्चों को कवर किया गया है. ये प्रोजेक्ट 14 जिलो के 250 जिलों में कार्यरत है.

गरीब बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखने के लिए जरूरी हैं कि उन्हें मोबाइल लर्निग और घर पर ही शिक्षा मुहैया करायी जाए. बहुत नाजुक परिस्थितियों में भी शिक्षा मिलती रहनी चाहिए, यहां तक कि अगर हालात बच्चों को शरणार्थी शिविरों में धकेल देते हैं तो वहां भी ये प्रयत्न होना चाहिए कि उन्हें अपने हाल पर न छोड़ दिया जाए. भारत में बाल मजदूरी से निपटने के लिए खतरनाक व्यवसायों से बच्चों को छुड़ाने की सरकारी गैर सरकारी कोशिशों को और संकेद्रित ऊर्जा के साथ चलाए जाने की जरूरत है. सिर्फ मजदूरी ही नहीं बल्कि तस्करी और यौन उत्पीड़न तक बच्चों का शोषण बिखरा हुआ है. इस लिहाज से ये सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों के लिए बेशक एक कठिन टास्क है. बेहतर पुनर्वास का अर्थ पीड़ित बच्चों को रिहाइश देना या भूख से बचाना ही नहीं, उन्हें मनोवैज्ञानिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बनाए रखना भी जरूरी है. बाल मजदूरी पर 24 घंटे सक्रिय एक मुस्तैद निगरानी सिस्टम भी चाहिए. कानून के डर और नियमों की सख्ती से ज्यादा जरूरी है स्थायी सहयोग और निरंतर काउंसिलिंग.

कृषि सेक्टर में संकट का दौर बना हुआ है. खराब मौसम, कर्ज न चुका पाने, फसल की बरबादी की दारुणता में किसानों की आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं. पीड़ित परिवार अपने बच्चों का स्कूल छुड़ाकर उन्हें काम पर लगा रहे हैं. निर्माण सेक्टर ने देखते ही देखते किसान परिवारों को दिहाड़ी मजदूरों में तब्दील कर दिया है. मनरेगा जैसी विशाल परियोजना भी इस लिहाज से उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से स्वतंत्र नहीं कर पायी है. रोजगार के अवसर तैयार न कर पाने की सूरत में एक कैजुअल वर्कफोर्स का उदय हुआ है और इसमें निरंतर वृद्धि हो रही है. ये वर्ग नितांत गरीबी, अशिक्षा और बीमारी में जीवन काट रहा है. चमकदमक से घिरी आर्थिक रिपोर्टो में इस बदहाली पर ध्यान देना न सरकार को सूझता है न उसके कारिंदों को न एक निश्चित लाभ दायरे में काम कर रहे एनजीओ के तंत्र को.

(तरक्की के चक्कर में बिखरा समाज)

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

 

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