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मंथन

बाली का ग्रीन स्कूल

किसी भी परिवर्तन के लिए शुरुआत अपने घर से करनी होती है. इंडोनेशियाई द्वीप बाली में इसी तर्ज पर काम कर रहा है, 'ग्रीन स्कूल' जहां बचपन में ही छात्रों में पर्यावरण के प्रति उनकी जिम्मेदारी का बोज बोया जा रहा है.

ग्रीन स्कूल की शुरुआत आज से पांच साल पहले हुई और अब दुनिया के अलग अलग कोनों से बच्चे यहां पढ़ने आ रहे हैं. उनके ग्रीन स्कूल में बच्चों की क्लास सीमेंट से बने कमरों में नहीं, झोपड़ियों में लगती है. पढ़ाई क्लास के बाहर भी होती है. पेड़ पौधों और प्रकृति से बच्चे सीखते हैं. एक विषय 'ग्रीन स्ट्डीज' भी है. पौधे में फूल कैसे उगाने हैं, यह कोर्स का हिस्सा है. बच्चों को इससे जुड़े प्रोजेक्ट देकर सिखाया जाता है. बच्चे अपनी पसंद के पौधे एक साथ या अलग अलग उगाते हैं और कुछ ही देर में एक पूरा बायोस्फीयर तैयार हो जाता है. जीवों की रक्षा कैसे की जाए, तालाब में मेंढकों की क्या जरूरतें है, यह सब इनके सिलेबस का हिस्सा है. छात्र यहां स्कूल का सालाना कार्बन फुटप्रिंट तैयार करते हैं और फिर उसकी भरपाई के लिए पेड़ भी लगाते हैं.

पर्यावरण के अलावा ग्रीन स्कूल में सामान्य विषय यानी मैथ्स, फिजिक्स और दूसरे विषयों की भी पढ़ाई होती है. 40 देशों से बच्चे यहां पढ़ने आते हैं. स्कूल के कोर्स को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल चुकी है. ग्रीन स्कूल में ग्रीन स्टडीज विषय पढ़ाने वाले नोआन फेस्नॉक्स ने बताया कि बच्चों के साथ उन्होंने तालाब साफ करवाने के प्रोजेक्ट पर दो हफ्तों तक काम किया. अंत में बच्चों ने यह जाना कि अगर मेंढकों को बाहर जाने का मौका न मिले तो वे मर जाते हैं.

स्कूल की फिजिक्स लैब में बांस और बेंत से रोलर कोस्टर जैसी चीजें बनाना और उनकी कार्यविधि सिखाई जाती है. फिजिक्स की टीचर सारा डर्फे ने कहा, "हमारा विचार था कि हम आसपास की प्रकृति से कुछ लें और सब कुछ खुद ही बनाए जिससे कि अलग अलग दृष्टिकोण से इसकी गति को देखा जा सके. इससे छात्रों को अपनी रचनात्मकता के लिए वक्त और जगह मिलती है, बांस के साथ, बेंत के साथ और आपस में. यह आम स्कूलों में पारंपरिक क्लास से कहीं ज्यादा दिलचस्प होता है." ग्रीन स्कूल में इसे टिकाऊ शिक्षा का नाम दिया गया है. यानी बच्चे रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली क्षमताएं हासिल करते हैं और साथ ही पर्यावरण का ख्याल रखना भी सीखते हैं.

इसके अलावा यहां बच्चों को लोक नृत्य भी सिखाए जाते हैं. दिन के खाने में बच्चों को कभी बाली के पारंपरिक पकवान तो कभी इटली का पास्ता जैसी चीजें परोसी जाती हैं. साथ में स्कूल के बगीचे के ताजे टमाटर जैसी चीजें भी. खाना केले के पत्तों पर खाया जाता है. बर्तन धोने नहीं पड़ते और पानी कम खर्च होता है.

लेकिन ऐसे स्कूल में बच्चों की फीस भी ज्यादा है. सालाना करीब पांच लाख रुपये की रकम स्थानीय मां बाप दे नहीं सकते. ग्रीन स्कूल बाली में रह रहे रईस विदेशियों के लिए है. लेकिन जो बच्चे यहां पढ़ते हैं, वे शायद भविष्य में अपने सपने पूरा कर सकते हैं.

रिपोर्ट: जूरी रेशेटो/एसएफ

संपादन: एन रंजन

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