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मंथन

'बालकनामा' से मुस्कुराता बेघर बचपन

दुनिया के कई देशों में बच्चों की हालत दयनीय हैं. लाखों बच्चे बेघर हैं. वो कभी मजदूरी करते हैं तो कभी ड्रग माफिया के चंगुल में फंसते हैं. लेकिन बालकनामा नाम की एक कोशिश ऐसे बच्चों को नई राह दिखा रही है.

आबादी के लिहाज से भारत में बेघर बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है. अनुमान है कि भारत में चार से आठ लाख बच्चे बिना घर बार भटकते हैं. इनमें से ज्यादातर देर सबेर दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों तक पहुंचते हैं, जहां पेट भरने के लिए उन्हें मजदूरी करनी पड़ती है. इस दौरान अक्सर उनके शारीरिक, मानसिक और यौन शोषण की संभावनाएं भी बनी रहती हैं.

पूर्वी यूरोप, अफ्रीकी या दक्षिण अमेरिकी देशों के उलट भारत में ज्यादातर बेघर बच्चे घर से भागे हुए मासूम हैं. गरीबी, घरेलू हिंसा और परवरिश में होने वाली अनदेखी के चलते ये बच्चे अपने ख्वाबों का पीछा करते हुए घर से भाग जाते हैं. भारत में 80 और 90 के दशक में कई ऐसी फिल्में बनी जिनमें बेघर या अनाथ बच्चे जवान होकर नायक बन गए. घर से भागने वाले कई बच्चे ऐसी कहानियों से भी प्रेरित हुए.

नजरें मिलाऊं कैसे

लेकिन फिल्म और असल जिंदगी में बड़ा फासला है. असल जिंदगी में ज्यादातर बेघर बच्चे शोषण का शिकार होते हैं. वो कूड़ा बीनने, बर्तन साफ करने, पोछा लगाने, चाय पानी पहुंचाने या भीख मांगने के लिए मजबूर होते हैं. आए दिन पुलिस का डंडा भी उन पर पड़ता ही रहता है.

इस दुर्दशा और घर लौटने पर समाज की तानेबाजी का डर अक्सर बच्चों को मानसिक रूप से इतना कमजोर कर देता है कि वे वापस लौटने का जज्बा नहीं जुटा पाते. लेकिन कुछ गैर सरकारी संगठन अब इस तस्वीर को धीरे धीरे बदल रहे हैं. दिल्ली में चलने वाला 'बालकनामा' अखबार इसका जीता जागता उदाहरण है. इस अखबार को गरीब बच्चे ही चलाते हैं.

Ausschnitt Hindi TV Wissenschaftsmagazin DW Manthan

दिनभर की मेहनत के बाद पढ़ाई

समाज की हकीकत

इन्हीं में से एक है 15 साल की ज्योति. हर सुबह दिल्ली की सड़कों पर वह प्लास्टिक जमा करने निकल पड़ती है. यह आसान काम नहीं. खाली बोतलों की तलाश में उसे मीलों भटकना पड़ता है. प्लास्टिक के साथ साथ ज्योति गत्ते, कागज और ऐसे सामान को उठाती है जिसे दूसरे लोग फेंक देते हैं. गर्मी, जाड़ा या बरसात, कुछ भी हो, तीन चार घंटे पैदल घूमना ज्योति के लिए आम बात है. किस्मत रोज ऐसी नहीं होती कि ठीक ठाक कचरा मिल जाए. ऊपर से लोगों की बदसलूकी भी झेलनी पड़ती है, "गंदी गंदी बातें करतें हैं लड़कियों से. जब बोतल उठाने जाओ तो मारने आते हैं, गालियां देते हैं. बोलते हैं भागो यहां से तुम चोरी करते हो. पुलिस वाले के पास लेकर जाते हैं, पुलिस वाले से भी मार खिलाते है."

ज्योति का परिवार दिल्ली में एक फ्लाईओवर के नीचे रह रहा है. दिन रात उनके ऊपर, दाएं और बाएं लगातार गाड़ियां दौड़ती रहती है. परिवार को हर दिन जिंदगी के लिए लड़ना है. दिल्ली में ऐसे रहना गैर कानूनी भी है. ज्योति परिवार में पहली इंसान है जो पढ़ना जानती है. ज्योति की मां सुनीता देवी के लिए यही उम्मीद की किरण है, "अच्छा ही होगा कि इस माहौल से निकल जाए. हम तो कूड़ा कबाड़ा चुनते हैं. हम लोगों को आज यहां रहना, कल वहां रहना, कोई ठिकाना तो है नहीं हमारा. ना कोई घर बार है, पुलिसवाला अभी आए, अभी भगा दे."

बच्चों का अखबार

सुबह बोतलें जमा करने के बाद ज्योति अपनी व्यस्त जिंदगी से कुछ समय निकालकर पढ़ने जाती है. बस्ती के बीच बिना आधुनिक सुविधाओं के चल रही इस पाठशाला में ज्योति अपने ही जैसे कई बच्चों के साथ पढ़ना लिखना सीखती है. बच्चे साफ सफाई और स्वास्थ्य के बारे में भी सीखते हैं. दिल्ली में अलग अलग इलाकों में सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए करीब 100 पाठशालाएं चल रही हैं. इन्हें चेतना नाम का गैर सरकारी संगठन चला रहा है. चेतना को इन पाठशालाओं के लिए कुछ फाउंडेशनों से वित्तीय मदद मिलती है.

दूसरे बेघर बच्चों के साथ ज्योति भी बालकनामा नाम का एक अखबार निकालती है. अखबार में ज्योति जैसे बच्चों की ही कहानियां छपती हैं. संपादकीय बैठक भी होती है. बच्चों की टीम तय करती है कि पहले पन्ने में कौन सा विषय होगा.

अखबार बीते 10 साल से छप रहा है. इसके पीछे बच्चों का ही आइडिया है. वह अपनी बात कहना चाहते हैं. मुख्य संपादक विजय कुमार कहते हैं, "एक खुशी यह होती है कि हम किसी के दबाव में आकर निर्णय नहीं लेते. फ्रंट पेज पर कौन सी खबर लगानी है, लास्ट पेज पर कौन सी."

रिपोर्टर ज्योति

ज्योति के पास एक स्टोरी आईडिया है, अगले अंक में वह ड्रग्स के चंगुल में फंसे बच्चों पर एक कहानी करना चाहती हैं. ज्योति चाहती हैं ऐसे बच्चों की मदद की जाए, "मैं भी कभी भीख मांगती थी, कबाड़ चुनती थी, लेकिन जब मैंने अपना फोटो बालकनामा में देखा तो मुझे अच्छा लगा. मैंने सोचा कि मैं इस काम में क्यों रहूं. जिस काम में मेरी तस्वीर छप रही है, उसी काम में न चली जाऊं. फिर मैं रोज दस बजे सेंटर लाने लगी."

ज्योति ने दूसरे बच्चों में भी प्रेरणा भरी है. आज वे तैमूर नगर की झुग्गियों में जा रही है. यहां के ज्यादातर गरीब बांशिदें कबाड़ बेचकर गुजर बसर करते हैं. ज्योति बच्चों को बताना चाहती है कि पढ़ाई क्यों जरूरी है. साथ ही वह बच्चों की अच्छी कहानियों वाली रिपोर्टें भी तैयार करेगी. ज्योति को उम्मीद है कि एक दिन वह वाकई पेशेवर पत्रकार बन सकेगी.

रिपोर्ट: क्रिस्टियान ड्राइशीगाकर/ओंकार सिंह जनौटी

संपादन: ईशा भाटिया

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