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बायर्न म्यूनिख की जीत की आदत

बुंडेसलीगा की टीमों में बायर्न म्यूनिख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक जाना जाता है. सबसे ज्यादा चैंपियनशिप जीतने का रिकॉर्ड उसके पास है, हालांकि हर बार उसे कड़ी टक्कर के बाद ही पहला स्थान मिल सका है.

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सुपर कप में जीत के साथ शुरुआत

जर्मन फुटबॉल लीग बुंडेसलीगा के खेलों की शुरुआत से पहले ही पिछले सत्र में दूसरे स्थान पर रहने वाली टीम शाल्के 04 को सुपर कप के मैच में 2-0 से हराकर बायर्न म्यूनिख ने अपनी जीत का बिगुल बजा दिया. विश्वकप के लिए जर्मनी की राष्ट्रीय टीम में इस क्लब के सात खिलाड़ी शामिल थे. इसके अलावा कई विदेशी खिलाड़ी अपनी राष्ट्रीय टीमों में, मसलन कप्तान मार्क फ़ान बोम्मेल और आर्यन रोबेन नीदरलैंड्स की टीम में या फ़्रांक रिबेरी फ़्रांस की टीम में.

डेढ़ लाख से अधिक सदस्यों के साथ बायर्न म्यूनिख बेनेफ़िका लिसबन और एफ़सी बार्सिलोना के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क्लब है. साथ ही इसे दुनिया के सबसे अमीर क्लबों में माना जाता है. यह 22 बार बुंडेसलीगा चैंपियन रह चुका है, 13 बार उसे जर्मन फुटबॉल कप में जीत मिली है. इसके अलावा उसे यूरोप में चैंपियंस लीग कप, विनर्स कप और यूएफा कप में एक-एक बार और इंटर कंटिनेंटल कप में दो बार जीत मिल चुकी है. क्लब का स्टेडियम है म्यूनिख का मशहूर आलियांज अरेना, जहां 69000 दर्शकों के बैठने की जगह है.

एक झगड़े की वजह से इस क्लब का जन्म हुआ. 27 फ़रवरी, 1900 को म्यूनिख जिम्नास्टिक एसोसिएशन में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कहा गया कि क्लब के सदस्य जर्मन फ़ुटबॉल संघ के साथ कोई संपर्क नहीं रख सकते हैं. उसी शाम क्लब के फ़ुटबॉल विभाग के 11 सदस्य क्लब से अलग हो गए और उन्होंने फ़ुटबॉल क्लब बायर्न म्यूनिख की स्थापना की. शुरू के वर्षों में क्लब को स्थानीय स्तर पर काफ़ी सफलता मिली और 1910-11 के सत्र में वह बवेरिया प्रांत की क्षेत्रीय लीग में खेलने लगा.

1932 में आइनट्राख़्ट फ़्रैंकफ़र्ट को फ़ाइनल में 2-0 से हराकर बायर्न म्यूनिख राष्ट्रीय चैंपियन बना. लेकिन एक साल बाद जब हिटलर गद्दी पर बैठा, तो इस क्लब के बुरे दिन आ गए. क्लब के अध्यक्ष और कोच, दोनों यहूदी थे और उन्हें देश छोड़कर भागना पडा. बायर्न म्यूनिख को यहूदी क्लब कहकर गाली दी जाने लगी. विश्वयुद्ध के बाद भी क्लब की स्थिति अच्छी नहीं रही, एक के बाद एक कोच हटाए जाते रहे. क्लब दीवालिएपन के कगार पर था. 1960 के दशक में धीरे धीरे स्थिति सुधरी. 1965 में उसे जर्मन फुटबॉल लीग यानी बुंडेसलीगा में जगह मिली और टीम में ऐसे युवा खिलाड़ी उभरे, जिनका नाम जर्मनी के फ़ुटबॉल जगत में आज भी सोने के अक्षरों में लिखा है - फ़्रांज बेकेनबावर, गैर्ड म्यूलर या ज़ेप मायर.

बायर्न म्यूनिख के भारत के फ़ुटबॉल जगत के साथ भी संपर्क हैं. क्लब के प्रसिद्ध गोलकीपर ओलिवर कान ने कोलकाता में अपना आख़िरी अंतरराष्ट्रीय मैच खेला. क्लब ख़ासकर पश्चिम बंगाल में युवा खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के लिए कार्यक्रम चला रहा है.

कम से कम राष्ट्रीय स्तर पर लगातार कामयाबी की वजह से जर्मन फ़ुटबॉल प्रेमियों को इस क्लब की सफलता कभी कभी उबाऊ लगती है. दूसरी ओर, अगर टीम कुछ एक मैच हार जाए, या कोच बहुत ज़्यादा अपने विचार लाने लगे, तो उसे सीधे टाटा बोल दिया जाता है. कई मशहूर कोचों को यहां से विदा लेना पड़ा है, जिनमें रेहहागेल, मागाथ और युर्गेन क्लिंसमन शामिल हैं. इस समय नीदरलैंड्स के लुई फ़ान गॉल क्लब के कोच हैं. माना जाता है कि क्लब के पदाधिकारियों के साथ उनके अच्छे संबंध हैं. वैसे क्लब को कुछ प्रमुख खिलाड़ियों के चोटिल हो जाने की समस्या से जूझना पड़ रहा है. पैर में ऑपरेशन के पांच हफ़्ते बाद फ़्रांक रिबेरी ने फिर से ट्रेनिंग शुरू की है, लेकिन अभी तक यह तय नहीं है कि शुक्रवार को वोल्फ्सबुर्ग के साथ पहले मैच में वह होंगे या नहीं. स्टॉपर डानिएल फ़ान बुइटेन 10 दिन के लिए नहीं होंगे और आर्यन रोबेन तो जांघ की चोट की वजह से दो महीने तक मैदान से बाहर रहेंगे.

लेख: उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादनः ए जमाल