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खेल

बायर्न और पेप दोनों की परीक्षा

सुर्ख लाल जर्सी, मोतियों सा चमकता स्टेडियम और सात साल में सात मैनेजर. जर्मनी के सबसे मशहूर फुटबॉल क्लब बायर्न म्यूनिख ने इस बार स्टार कोच पर हाथ मारा है लेकिन क्या गुआर्डिओला टिक पाएंगे और क्या बायर्न की कामयाबी लौटेगी.

मैनचेस्टर यूनाइटेड के सर एलेक्स फर्गुसन के बाद पेप गुआर्डिओला लीग फुटबॉल के सबसे करामाती कोचों में गिने जाते हैं. बार्सिलोना को शीर्ष पर पहुंचाने में उनका बड़ा रोल रहा है और अब रोल बदलना चाहते हैं. लेकिन उनके सामने सितारों से भरी ऐसी मुश्किल टीम है, जो कभी कभी मैच तो जीत लेती है लेकिन जिसका करिश्मा फीका पड़ता जा रहा है. इन दिनों यूरोपीय चैंपियनशिप में आखिरी पड़ाव पर पहुंच कर लुढ़क जाने वाली बायर्न की टीम ने खूब कोचों को आजमाया है लेकिन बाहर के कोच आम तौर पर नाकाम ही रहे हैं. अब गुआर्डिओला के पास इस भ्रम को तोड़ने की चुनौती है.

जर्मन फुटबॉल लीग बुंडेसलीगा की राजा कही जाने वाली बायर्न की टीम का पिछला दो साल बुरे सपने की तरह बीता है. डॉर्टमुंड नाम की नई टीम ने चैंपियन का रंग फीका कर दिया है और यूरोप की सबसे बड़ी लीग चैंपियनशिप चैंपियंस लीग के फाइनल में पहुंच कर भी उसे चेल्सी के चीतों ने मात दे दी है. टीम में ज्यादातर जर्मन राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ी खेलते हैं और ऐसी नाकामी देखने के आदी नहीं हैं.

मार ली बाजी

लिहाजा टीम के चेयरमैन कार्ल हाइंस रुमेनिगे को इस बात की खुशी है कि जब गुआर्डिओला को दुनिया भर की टीमें आकर्षित करने की कोशिश में लगी थीं, उनकी टीम ने बाजी मारी है, "हमें इस बात की खुशी है कि हम एक्सपर्ट कोच पेप गुआर्डिओला को एफसी बायर्न में लाने में कामयाब हुए हैं. दुनिया भर की टीमें उनके साथ जुड़ना चाहती थीं."

रुमेनिगे को उम्मीद है कि अब रिकॉर्ड बदलेंगे, "पेप गुआर्डिओला दुनिया के जाने माने कोच हैं और हमें यकीन है कि उनके आने से जर्मन फुटबॉल और एफसी बायर्न का भविष्य बेहतर होगा."

स्पेनी कोच सिर्फ 41 साल के गुआर्डिओला के नाम 2008 से 2012 तक अपने ही देश के क्लब बार्सिलोना को ट्रेनिंग देने का अनुभव है और उनके नाम जितने खिताब हैं, उससे ज्यादा सिर्फ सर फर्गुसन के नाम हैं. अलबत्ता फर्गुसन उनसे 30 साल बड़े हैं.

भाषा की बाधा

गुआर्डिओला ने इससे पहले इंग्लैंड जाने का संकेत दिया था. रिपोर्टें हैं कि चेल्सी ने उन्हें लुभाने की भी कोशिश की थी लेकिन मालिक रोमान इब्राहिमोविच कामयाबी की प्यास के लिए जाने जाते हैं और एक नाकामी के बाद कोच की छुट्टी हो जाती है. हाल ही में उन्होंने रफाएल बेनिटेज को कोच बनाया है. शायद गुआर्डिओला इस भंवर में नहीं पड़ना चाहते थे. पर वह न्यूयॉर्क में रह कर इंग्लिश मजबूत कर रहे थे. अब उन्हें अचानक जर्मन सीखनी होगी. बायर्न में उनका कार्यकाल जुलाई में शुरू होना है, इस हिसाब से जर्मन जैसी मुश्किल भाषा के लिए उनके पास छह महीने के एक्सटेंसिव कोर्स का मौका है.

बायर्न के लिए मुश्किल यह है कि टीम के ज्यादातर खिलाड़ी जर्मन हैं और देश के बाहर नहीं खेले हैं. ऐसे में भाषा उनके लिए बाधा बन जाती है. पहले भी इटली के जियोवानी ट्रापोटोनी ने 1990 के दशक में टीम को कोचिंग दी थी लेकिन भाषा को लेकर उन्हें बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. उनके बाद टीम ने किसी गैर जर्मन को कोच नहीं बनाया. अलबत्ता नीदरलैंड्स के लुई फान खाल ने कोचिंग की है पर दोनों देशों की भाषाएं बहुत मिलती जुलती हैं.

कामयाबी की दरकार

स्विट्जरलैंड के जर्मन मैनेजर ओटमार हित्सफेल्ड का मानना है कि इन बाधाओं के बाद भी गुआर्डिओला टिक जाएंगे, "वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कोचों में हैं. सफलता से काम कर चुके हैं और बायर्न की मानसिकता के अनुरूप हैं. वह जवान हैं और उनके पास जर्मन सीखने के लिए आधे साल का समय है. यह बिलकुल फिट हो रहा है." हित्सफेल्ड भी बायर्न के कोच रह चुके हैं.

देखना है कि मिस्टर पर्फेक्शनिस्ट कहे जाने वाले गुआर्डिओला जर्मन लीग में भी परफेक्शन की इबारत लिख पाने में कामयाब होते हैं या नहीं. यह गुआर्डिओला और बायर्न दोनों के लिए अग्नि परीक्षा है. बायर्न जीत तलाश रही है तो गुआर्डिओला के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि बार्सिलोना की कामयाबी सिर्फ उसके स्टार खिलाड़ियों की वजह से नहीं, बल्कि उनकी ट्रेनिंग से भी हुई थी.

एजेए/एमजे (एएफपी, डीपीए, रॉयटर्स)

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