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दुनिया

बाप के बाद नौकरी पर विवाहित बेटी का भी हक

कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि नौकरी के दौरान पिता की मृत्यु की स्थिति में विवाहित पुत्रियों को भी अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने का समान अधिकार है.

पहले यह अधिकार सिर्फ अविवाहित पुत्रियों तक ही सीमित था. लेकिन पुत्रों के मामले में विवाह की कोई बाधा नहीं थी. लैंगिक समानता की खाई पाटने के मामले में अदालत के इस फैसले को मील का पत्थर माना जा रहा है. तमाम महिला संगठनों ने इस फैसले की सराहना की है.

क्या है मामला

बीरभूम जिले की पूर्णिमा दास ने वर्ष 2011 में अपने पिता हारूचंद्र दास की मौत के बाद अनुकंपा के आधार पर नौकरी की अर्जी दी थी. लेकिन सरकार ने यह कह उसकी अर्जी खारिज कर दी थी कि कानून में विवाहित पुत्रियों को नौकरी देने का कोई प्रावधान नहीं है. यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि हारूचंद्र को कोई पुत्र नहीं था. सिर्फ तीन पुत्रियां थीं. हारू की पत्नी और दोनों बड़ी बहनों ने लिख कर दे दिया था कि नौकरी छोटी बहन को दी जाए. बावजूद इसके सरकार ने विवाहित होने की दलील देते हुए उसकी अर्जी खारिज कर दी. वर्ष 2013 में पूर्णिमा ने हाई कोर्ट में अपील की थी. अदालत में सरकार की ओर से पंचायत और श्रम विभाग की ओर से वर्ष 2008 में जारी एक गजट अधिसूचना पेश की गयी जिसमें कहा गया था कि नौकरी में रहते पिता की मौत की स्थिति में सिर्फ अविवाहित पुत्रियां ही अनुकंपा के आधार पर नौकरी का आवेदन दे सकती हैं. लेकिन पूर्णिमा के वकील की दलील थी कि संविधान की धारा 14,15 और 16 के मुताबिक पुत्र और पुत्री में कोई भेदभाव नहीं है. ऐसे में अगर विवाहित पुत्र को नौकरी मिल सकती है तो विवाहित पुत्री के मामले में भेदभाव क्यों?

लगभग चार साल तक चली सुनवाई के बाद कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश निशीथा म्हात्रे, न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति दीपकंर दत्त की खंडपीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि पुत्री के विवाह के बावजूद माता-पिता के साथ उसके संबंध खत्म नहीं होते. वह अपने माता-पिता के दिल में रहती है. अदालत ने इस बारे में सरकार की अधिसूचना को असंवैधानिक करार देते हुए उसमें जरूरी संशोधन का निर्देश दिया है. पूर्णिमा के अलावा नदिया जिले की अर्पिता सरकार और काकली चक्रवर्ती ने भी क्रमशः अपने पिता और माता की मौत के बाद उनकी जगह अनुकंपा के आधार पर नौकरी की याचिका ठुकराए जाने के बाद अदालत की शरण ली थी. हाई कोर्ट ने सरकार से अतीत में किये गये ऐसे तमाम आवेदनों पर भी दोबारा विचार करने को कहा है. पूर्णिमा के वकील अंजन भट्टाचार्य बताते हैं, "सरकार के समक्ष ऐसे कम से कम पांच हजार मामले विचाराधीन हैं. अब उन सबको उनका जायज हक मिलने का रास्ता साफ हो गया है."

वैसे, पहले यह मामला हाई कोर्ट की एकल पीठ में था. वहां फैसला खिलाफ होने के बाद सरकार ने अपनी अधिसूचना का हवाला देते हुए नौकरी देने से मना कर दिया. उसके बाद फिर उसी न्यायाधीश की अदालत में मामला उठा था. वहां भी मुंह की खाने के बाद सरकार ने खंडपीठ में अपील की थी. लेकिन अब खंडपीठ ने अपने फैसले में सब कुछ साफ कर दिया है.

महिला संगठनों में खुशी

हाई कोर्ट के इस फैसले से महिला संगठनों में काफी प्रसन्नता है. उनकी दलील है कि इससे महिलाओं को न्याय मिलेगा. एक महिला संगठन की सचिव सुरभि चक्रवर्ती कहती हैं, "बंगाल में ऐसी हजारों महिलाएं हैं जो राज्य सरकार के इस भेदभावमूलक कानून की शिकार हो चुकी हैं. अब उनको न्याय मिलने की उम्मीद है."

महिला अधिकार कार्यकर्ता देवस्मिता गोस्वामी कहती हैं कि राज्य के आम परिवारों में बेटे और बेटी में भेदभाव नहीं किया जाता. उल्टे यहां बेटियों को ही परिवार में ज्यादा इज्जत मिलती है. लेकिन सरकार ने राज्य की परंपराओं और संस्कृति के उलट लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देने वाला कानून बनाया था. वह कहती हैं कि इस कानून की वजह से ऐसे मामलों में महिलाएं अपने जायज हक से वंचित रह जाती थीं. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा.

दूसरी ओर, सरकार ने कहा है कि वह अदालत का विस्तृत फैसला पढ़ने के बाद ही कोई टिप्पणी करेगी. श्रम मंत्री मलय घटक कहते हैं, "अभी फैसले की प्रति नहीं मिली है. फैसले को विस्तार से पढ़ने के बाद ही आगे की कार्रवाई पर फैसला किया जाएगा." सरकार ने भले फिलहाल इस पर चुप्पी साध रखी हो, लेकिन महिला संगठनों का कहना है कि लैंगिक भेदभाव खत्म करने में अदालत का यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा.

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