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दुनिया

बाढ़ का नुकसान घटाने को तैयार नहीं

सरकारी आंकड़ों ने उत्तराखंड में 100 से ज्यादा की जान ली है. जबकि बहते हुए होटल, लापता लोगों की संख्या कहीं बड़े नुकसान की आहट दे रही है. उधर कई राज्य बाढ़ का नुकसान कम करने के बिल पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं.

उत्तराखंड में बाढ़ का प्रकोप देखने के बाद भी भारत के कई राज्य 38 साल पुराने मॉडल फ्लड बिल का विरोध कर रहे हैं. इस बिल का लक्ष्य है बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाले जान माल के नुकसान को कम करना.

यह बिल 1975 में केंद्रीय जल आयोग ने बनाया था. इससे अधिकारियों को बाढ़ की आशंका वाले इलाकों से बस्तियों को हटाने की अनुमति होगी.

बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं. उनकी दलील है कि इन बस्तियों से हटाए गए लोगों को फिर से बसाना बहुत मुश्किल काम होगा. जल संसाधन मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, "उन्हें यह भी डर है कि केंद्र मुआवजे का धन उन्हें नहीं देगा. अगर वह इस कानून का अच्छे से पालन नहीं कर पाए. आज नीचे बसी कई बस्तियों को व्यावसायिक विकास के लिए दे दिया गया है. इन इलाकों में रहने वाले लोगों और सामान की सुरक्षा करने का कर्तव्य राज्य सरकार का है. वे जानते हैं कि इस तरह के इलाकों में नुकसान होने पर वह (केंद्र से) मुआवजा नहीं मांग सकते. "

वहीं कुछ अन्य राज्य हैं जिन्होंने इस बिल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. अगर यह बिल लागू कर दिया जाता है तो इसके तहत पानी के पास या निचली बस्तियों में घर बसाने की बजाए पार्क, खेल का मैदान बना दिया जाएगा. ताकि यहां कोई नहीं रह सकें. इससे इन इलाको में जान माल की हानि नहीं होगी. केंद्रीय जल आयोग ने यह मॉडल बिल कई राज्यों को भेजा है ताकि वो इसे कानून बनाने में मदद करें. मणिपुर और राजस्थान के अलावा किसी भी राज्य ने इस मॉडल बिल ऑन फ्लड प्लेन जोनिंग पर कार्रवाई नहीं की है. मणिपुर ने तो इसे 1978 में ही पास कर दिया था. हालांकि फ्लड जोन को चिन्हित करने का काम अभी तक नहीं हो सका है. राजस्थान ने इसे पास तो किया है लेकिन इसमें कहे गए उपायों पर काम नहीं किया.

केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने हाल ही में गंगा बाढ़ नियंत्रण बोर्ड की मीटिंग में कहा था, "राज्य सरकारों की बदलती मांगों और बिल के अलग अलग हिस्सों पर उनके विरोध के मद्देनजर केंद्र इस बिल के ड्राफ्ट को बदल सकता है. अभी का मॉडल ड्राफ्ट बिल फॉर फ्लड प्लेन जोनिंग बहुत पुराना है. केंद्र इसमें संशोधन के बारे में सोच रहा है. फिर नया बिल राज्यों को भेजा जाएगा."

वहीं जल आयोग की शिकायत है, "इस मुद्दे पर प्रगति बहुत ही खराब है. और बुरा यह है कि बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में हाल के सालों में अनियोजित घुसपैठ हुई है जिसे सरकार नजरअंदाज कर रही है."  

उधर उत्तराखंड में बाढ़ के कारण बुरा हाल है. शुक्रवार को भारतीय वायु सेना ने पैराट्रूपर्स के साथ खाना और दवाइयां हजारों लोगों तक पहुंचाई. ये लोग बारिश और भूस्खलन के बाद इलाके के 100 गांवों और शहरों में फंसे हुए हैं. 

गुरुवार से श्रद्धालुओं की दो हजार गाड़ियों को यहां से आगे भेजा गया है. सैनिक राहत काम में जुटे हुए हैं लेकिन फिर कई लोगों तक राहत अभी नहीं पहुंच पा रही है. उत्तराखंड में मरने वालों की संख्या 105 बताई गई है लेकिन इसके कहीं ज्यादा होने की आशंका है.

केदारनाथ में फंसे हुए 27 हजार लोगों को निकालने का काम जारी है. 

शुक्रवार को कई सौ लोगों ने देहरादून में प्रदर्शन किया. ये लोग अपने रिश्तेदारों के इंतजार में थे. इन लोगों की शिकायत है कि सरकार बचे हुए लोगों को निकालने में बहुत देर कर रही है. क्योंकि हेलिकॉप्टरों में एक बार में सिर्फ चार या पांच लोग ही लाए जा रहे हैं.

भारी बारिश के कारण आई बाढ़ में रास्ते बह गए हैं, दो दर्जन पुल नष्ट हो गए हैं और 365 मकान तहस नहस हैं.

मॉनसून की बारिश भारत की खेती के लिए जीवनदायी मानी जाती है लेकिन अक्सर इस दौरान आई बाढ़ जानलेवा भी साबित होती है.

एएम/एनआर (पीटीआई, एएफपी)

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