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दुनिया

बांग्लादेश में गिरफ्तार उल्फा नेताओं की हिरासत बढ़ी

बांग्लादेश में गिरफ्तार दो उल्फा नेताओं की पुलिस हिरासत सात दिन के लिए और बढ़ाई गई. रंजन चौधरी और उसके सहायक प्रदीप मारक को बांग्लादेश की पुलिस ने ढाका से 70 किलोमीटर दूर किशोरगंज से शनिवार को गिरफ्तार किया.

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किशोरगंज की अदालत में जूडीशियल मजिस्ट्रेट मुहम्मद अली अहसान ने पुलिस की याचिका स्वीकार कर ली और उल्फा नेताओं को पूछताछ के लिए और सात दिन की पुलिस हिरासत में वापस भेज दिया. इससे पहले रविवार को इन दोनों को तीन दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया था. सरकारी वकील का कहना है कि रंजन और प्रदीप को बुलेटप्रूफ जैकेट पहना कर कड़ी सुरक्षा के बीच कोर्ट में लाया गया. उल्फा नेताओं को पुलिस वापस ढाका ले गई है जहां टास्क फोर्स इंटेलिजेंस यानी टीएफआई के अधिकारी उनसे पूछताछ करेंगे.

मेजर रंजन के नाम से विख्यात रंजन चौधरी भारत में असम के धुबरी जिले का रहने वाला है. रंजन ने 1988 में उल्फा की सदस्यता ली. इसके बाद वो तीन महीने की मिलिट्री ट्रेनिंग में भी शामिल हुआ. 1995 में रंजन भूटान में उल्फा की मिलिट्री विंग के कमांडर परेश बरुआ से मिलने गया था. इसके अगले महीने ही वापसी के बाद भारतीय सुरक्षा बलों ने उसे गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद उसे गुवाहाटी की जेल में डाल दिया गया जहां से वो 1996 में रिहा हुआ.

उल्फा पर कार्रवाई के साथ ही हथियारों से लदे 10 ट्रकों के पकड़े जाने की भी जांच चल रही है. माना जाता है कि ये हथियार उल्फा के लिए असम भेजे जा रहे थे. इस मामले में बांग्लादेश के एक पूर्व मंत्री लुत्फुज्जमान बाबर को सजा मिलना लगभग तय है. बेगम खालिदा जिया की सरकार में बाबर गृह राज्यमंत्री थे. पुलिस के मुताबिक उन्हें इस मामले में पक्के सबूत मिले हैं जिनसे बाबर के हथियारों की तस्करी में शामिल होने की पुष्टि होती है. बाबर कई और आरोपों में घिरने के बाद पहले से ही जेल में है. गृह मंत्रालय के एक बड़े अधिकारी ने भी बाबर के खिलाफ आरोप लगाए हैं. इस मामले में पूर्व उद्योग मंत्री मौलाना मतिउर रहमान निज़ामी के भी गिरफ्तार होने के आसार हैं. पुलिस उनसे पहले ही पूछताछ कर चुकी है. ये हथियार 2004 में पकड़े गए और ये अब तक पकड़ा गया हथियारों का सबसे बड़ा जखीरा है. सरकार में शामिल कई प्रभावशाली लोगों ने इन ट्रकों के सुरक्षित निकल जाने की कोशिश की थी लेकिन इसे पकड़ लिया गया.

रिपोर्टः एजेंसियां/एन रंजन

संपादनः महेश झा