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दुनिया

बांग्लादेश: आतंकी बेटे की लाश नहीं देख पा रहा है बाप

बांग्लादेश के एक हमलावर की उम्र महज 18 साल थी. अच्छे परिवार का यह लड़का कैसे कट्टरपंथियों के हाथ लग गया? पिता भी इसी सवाल का जवाब खोज रहे हैं.

रमजान के महीने का आखिरी जुम्मा था. मीर हैयत कबीर उम्मीद लगाए बैठे थे कि शायद आज तो बेटा घर लौट ही आएगा. चार महीने से बेटे की कोई खबर नहीं थी. यह भी समझ नहीं आ रहा था कि खुद ही घर छोड़ कर चला गया है या किसी के कब्जे में है. लेकिन ईद पर तो बुरे लोगों का भी दिल पिघल जाता है. पिता ने सुना था कि बांग्लादेश में अपहरणकर्ता भी कई बार ईद के मौके पर लोगों को छोड़ दिया करते हैं.

उसी रात बेटे की खबर तो आई लेकिन ये खबर दिल तोड़ देने वाली थी. 18 साल का मीर सामेह मुब्बशीर ढाका में पुलिस के हाथों मारा गया था. वो उन पांच बंदूकधारियों में से एक था जिन्होंने ढाका के एक रेस्तरां पर हमला कर बीस लोगों की जान ली थी.

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पिता सदमे में हैं, समझ नहीं पा रहे कि बेटे ने यह राह क्यों चुनी होगी. मुब्बशीर ने अपना बचपन गरीबी या मुश्किलों के बीच नहीं बिताया था. वह ढाका का "अच्छे घर का लड़का" था, रोज स्कूल जाने वाला, कम बोलने वाला. "कहीं तो कुछ गलत हुआ है, कहीं कुछ गड़बड़ हुई है", अपने आंसू रोकते हुए पिता बार बार यही दोहराते हैं. उन्हें बार बार अखबारों और टीवी में अपने बेटे का नाम देखने को मिल रहा है लेकिन उन्हें यकीन नहीं हो रहा कि उनका बेटा आतंकियों से जा मिला, "मैं मानने को तैयार नहीं कि मेरे बेटे ने खुद ऐसा किया, अपनी सोच समझ से."

मुब्बशीर का बचपन किसी भी सामान्य उच्च मध्य वर्गीय परिवार के बच्चे जैसा था. उसे डायनासॉर पसंद थे, जानवरों के नाम याद करता था. परिवार के साथ ताज महल देखने भारत गया तो लौट कर मुगल राजाओं और दुर्गा की तस्वीरें बनाने लगा. स्कूल में 1971 की जंग और आजादी के बारे में पढ़ा, तो इतिहास में रुचि बढ़ गई. कार्टून भी देखता, अंग्रेजी फिल्में भी. स्कूल में बच्चे उसे मां का लाडला कह कर चिढ़ाते. वह घर के पास वाली मस्जिद में भी जाता और दिन में पांच बार नमाज भी पढ़ता. पिता बताते हैं कि गायब होने से पहले उन्हें उसके रवैये में कोई बड़ा बदलाव देखने को तो नहीं मिला लेकिन उनका ध्यान इस ओर जरूर गया था कि बेटे ने फेसबुक का इस्तेमाल कम कर दिया था और हर वक्त पढ़ता रहता था.

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मुब्बशीर की ही तरह बाकी के हमलावर भी बांग्लादेश के सबसे अच्छे स्कूलों में पढ़े थे और अच्छे परिवारों से नाता रखते थे. ऐसे में पूरा देश इस वक्त यही सवाल कर रहा है कि इन बच्चों के साथ आखिर हुआ क्या. एक अन्य आतंकी की पहचान 22 साल के निबरस इस्लाम के रूप में की गई है जिसने मलेशिया की मोनाश यूनिवर्सिटी से बैचलर्स की पढ़ाई की. यहां सालाना फीस 9,000 डॉलर है. ऐसे में अब गरीबी और अनपढ़ता को आतंकवाद के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता.

निबरस इस्लाम की पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

सब जवाब खोजने में लगे हैं. मुब्बशीर के परिवार वाले इंटरनेट को इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं, तो पिता का भी कहना है कि कुछ ही महीने पहले बेटे को जो स्मार्टफोन दिलाया था, उसी ने उसकी जान ले ली. कट्टरपंथी किस तरह युवाओं तक पहुंच रहे हैं, इसे ले कर सब चिंतित हैं. कबीर कहते हैं, "अगर वो मेरे बेटे को छीन सकते हैं, तो वो किसी के भी बच्चे को छीन सकते हैं." कबीर ने अभी अपने बेटे का मृत शरीर नहीं देखा है. पुलिस ने उन्हें शिनाख्त के लिए बुलाया है. बाप की उम्मीदें अभी भी बंधी हुई हैं, "काश की कोई करिश्मा हो जाए, काश वो मेरा बच्चा ना हो!"

आइबी/वीके (रॉयटर्स)

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