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दुनिया

बहुत दूर नहीं आ पाया है भारत

भारत के कई तबकों में ऐसे मामले आज भी हैं जहां अंतरजातीय विवाह पर बवाल हो जाता है. लेकिन बाल विवाह जैसी प्रथाओं को समर्थन मिला हुआ है. इतने कानून बन जाने के बाद भी बहुत दूर नहीं आ पाया है भारत.

उच्च जाति से संबंध रखने वाली तिलकम ने जब 12 साल पहले अपने दलित प्रेमी से शादी की तो रिश्तेदारों से लेकर जान पहचान वालों ने खूब विरोध किया. हालांकि उनकी प्रेम कहानी का सुखद अंत रहा लेकिन आज भी भारत में प्रेम और संबंधों के मामले में दिल से आगे परिवार की प्रतिष्ठा आती है और अक्सर प्रेमी युगल को अपनी जान से बदला चुकाना पड़ता है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2012 में 9,623 अंतरजातीय विवाह हुए जिसमें दंपति में से एक दलित था. जबकि एक साल पहले यही संख्या 7,617 थी. हालांकि 1.2 अरब आबादी वाले देश में जहां शादी करना जीवन का एक अहम हिस्सा माना जाता है, यह संख्या बहुत मामूली है.

समाज के खिलाफ

तिलकम के पति काथिर दलित जाति के हैं जिसे एक समय में अछूत माना जाता था. भारतीय समाज में जाति प्रथा के खिलाफ छेड़ी गई तमाम मुहिमों और दावों के सालों बाद भी समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी इसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है. परिवार के खिलाफ जाकर शादी करने पर कई बार दंपतियों को पारिवारिक सम्मान के नाम पर अपनी जान भी गंवानी पड़ जाती है. समाज के खिलाफ जाकर शादी करने वालों में से एक साहसी कहानी तिलकम और काथिर की है.

तिलकम ने कहा कि उन्हें इस शादी के बाद बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं हुई क्योंकि उनके पिता उनके साथ खड़े होने को तैयार थे. उन्होंने रिश्तेदारों का सामना करने का साहस दिखाया. ए विंसेंट राज उर्फ काथिर ने अंतरजातीय शादियों के मामले में अन्य दलितों की मदद के लिए एक संस्था की स्थापना की है. वे उनकी शादी के अलावा जीवन शुरू करने में उनकी नौकरी और घर ढूंढने में भी मदद करते हैं.

प्रतिष्ठा के नाम पर हत्या

भारतीय कानून अंतरजातीय विवाह के खिलाफ भेदभाव को रोकता है. जबकि सच्चाई यह है कि इस कानून के होने के बाद भी आधुनिकीकरण की राह पर अग्रसर देश में लोगों में इस तरह की शादियों को लेकर अभी भी झिझक है. भारत में परिवार की प्रतिष्ठा के नाम पर हर साल सैकड़ों दंपतियों की हत्या होती है. कई मामलों में उन्हें परिवार के ही सदस्य जहर दे देते हैं, तो कई बार उनकी बर्बरता से हत्या कर दी जाती है.

दो महीने पहले ही तमिलनाडु पुलिस को 21 वर्षीय शशिकला की जली हुई लाश मिली. शशिकला ने एक मंदिर में अपने दलित प्रेमी से शादी कर ली थी. क्षेत्रीय मीडिया के अनुसार दो साल तक वे साथ रहे लेकिन फिर परिवार की नाराजगी और गुस्से से डरकर वहां से भाग खड़े हुए. लेकिन शशिकला के परिवार ने उसे ढूंढ निकाला और इससे पहले कि पुलिस वहां तक पहुंच पाती वे उसे आग के सुपुर्द कर चुके थे.

Massenhochzeit in Indien

कभी कभी परिवार के खिलाफ जाना महंगा पड़ता है

बाकी है खाई

भारत के कई इलाकों में दलित वर्ग के लोग अभी भी निचले तबके के माने जाते हैं. काथिर कहते हैं, "अगर कोई ऊंचे तबके का आदमी किसी दलित महिला से शादी करता है तो ऐसा माना जाता है जैसे कि उसने उसका उद्धार किया है." वह आगे कहते हैं कि यही अगर किसी ऊंचे तबके की लड़की करती है तो इसका बिल्कुल उल्टा असर होता है, "वह महिला फिर निचले तबके की मानी जाती है, ऐसे में दंपति के लिए समाज का मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि उनकी नजर में होने वाला बच्चा भी उनकी आगे की नस्ल को अपवित्र करता है."

भारत के बड़े हिस्से में अपनी पसंद से अंतरजातीय विवाह करना लड़के और लड़की दोनों ही के लिए अभी भी आसान नहीं है. क्षेत्रीय अखबारों में भी अपने बच्चों के लिए वर और वधू ढूंढ रहे लोग जाति विशेष की मांग करते हैं. हालांकि अब ऐसे मामले बढ़ रहे हैं.

परिवार की इज्जत

लखनऊ में गिरि इंस्टिट्यूट ऑफ डेवेलपमेंट स्टडीज के प्रोफेसर श्रीनिवास गोली कहते हैं, "अभिभावक अपने बच्चों की पसंद से सहमत हो सकते हैं. लेकिन उन्हें अपने परिवार की प्रतिष्ठा का ख्याल होता है. ऐसे में वे बच्चों को इस बात के लिए मजबूर करते हैं कि वे परिवार की इज्जत के लिए अपनी मर्जी के खिलाफ शादी करें."

वह मानते हैं कि ज्यादातर परिवारों को खुद इस बात का डर रहता है कि ऐसे किसी फैसले से समाज और उनकी जान पहचान के लोग उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसा खासकर भारत के गावों और पिछड़े इलाकों में होना सामान्य बात है. उत्तरी भारत के कई इलाकों में पुरुष प्रधान खाप पंचायत ऐसे मामलों में नैतिक पुलिस की तरह बरताव करती है.

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली जगमती सांगवान कहती है कि हरियाणा में जहां खाप पंचायत का दबदबा है, दलित ज्यादातर भूमिहीन हैं. ऐसे में उच्च जाति के सदस्य से शादी करने पर वे उनकी ताकत को चुनौती देते हैं. सांगवान कहती हैं, "उन्हें ताकत के समीकरण बदलने का खतरा होता है जो कि रुतबे के लिए मरने वाले तबके के लिए बर्दाश्त से बाहर बात होती है. वे आर्थिक और सामाजिक मामलों में अपना आधिपत्य चाहते हैं."

एसएफ/आईबी (एएफपी)

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