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मनोरंजन

बला बन जाती है खूबसूरती

महिलाओं के बारे में बात करते हुए कवियों को उनके नखशिख और शील का ही ख़्याल आता है. विरले ही देखने को मिला है कि किसी महिला के ज्ञान या उसकी क्षमता की चर्चा होती है. नौकरी पानी हो, तो यह एक समस्या बन जाती है.

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किरन बेदी के मामले को एक अपवाद समझा जा सकता है. अगर दरोगा के इंटरव्यू के लिए किसी महिला का आवेदन आए, तो सबसे पहले तो सबकी भौंहें तन जाएंगी, और अगर कोई खूबसूरत महिला हो, तो फिर तो कोई मौका ही नहीं होगा. यहां क्या करने आई है, वे पूछेंगे. और यह सिर्फ़ भारत जैसे देशों में ही नहीं. सर्वेक्षणों से पता चला है कि सारी दुनिया में ऐसा पाया जाता है.

अमेरिका के कोलोराडो यूनिवर्सिटी के डेनवर बिज़नेस स्कूल की ओर से किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि खूबसूरत होने से तथाकथित पुरुषों वाले पेशों में नौकरी पाने में महिलाओं को परेशानी हो सकती है. देखने की बात है कि ये ऐसी नौकरियां हैं, जिनमें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई देखने में कैसा है, मसलन रिसर्च एंड डेवलपमेंट मैनेजर, डाइरेक्टर ऑफ़ फ़ाइनेंस, मेकनिकल इंजीनीयर या कंस्ट्रक्शन सुपरवाइज़र.

ज़ाहिर है कि सिक्योरिटी डाइरेक्टर, जेल गार्ड या ट्रक ड्राइवर जैसी नौकरियों के लिए उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है, भले ही महिलाओं पास इनके लिए पर्याप्त योग्यता हो. डेनवर बिज़नेस स्कूल की स्तेफ़ानी जॉनसन का कहना है कि इन नौकरियों में खूबसूरती महिलाओं के लिए बला हो जाती है. दूसरी ओर रिसेप्शनिस्ट या सेक्रेटरी जैसे पदों के लिए हमेशा खूबसूरत युवतियां खोजी जाती हैं

तथाकथित महिलाओं की नौकरियों में उनकी खूबसूरती पर ध्यान दिया जाता है. लेकिन तथाकथित पुरुषों की नौकरियों में इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ये पुरुष देखने में कैसे हैं.

जर्नल ऑफ़ सोशल साइकोलॉजी में इस अध्ययन को प्रकाशित किया गया है. इस अध्ययन में कुछ नौकरियों के लिए 55 पुरुषों और 55 महिलाओं की तस्वीरें दी गई थीं, और भागीदारों से कहा गया था कि वे पदों के साथ तस्वीरों को जोड़ें. नतीजे में पाया गया कि कुछ पदों के लिए सुंदर महिलाओं को बिल्कुल अलग रखा गया. सुंदर पुरुषों की किस्मत इतनी खराब नहीं थी.

लेकिन स्तेफ़ानी जॉनसन का यह भी कहना है कि नौकरी पा जाने के बाद ख़ुबसूरत पुरुष और महिलाएं दोनों फ़ायदे में रहती हैं. उनके वेतन में बेहतरी जल्दी आती है, उनके बारे में बेहतर फ़ैसले लिए जाते हैं, परेशानियों का सामना कम करना पड़ता है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादन: ओ सिंह

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