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ब्लॉग

बलात्कारी का बच्चा नहीं, जीवन चाहिए

स्त्रियों के विरुद्ध यौन हिंसा की बर्बर वारदातों वाले देश, भारत में अब एक नई बहस उठी है. इसका संबंध भी स्त्री के मानवाधिकारों से है. यहां पर सवाल उसके गर्भपात के अधिकार का है लेकिन वह कानून से टकरा रहा है.

बलात्कार की घटनाओं से घिरे भारत में पीड़ित स्त्रियों के सामने एक के बाद एक कई चुनौतियां रहती हैं. कई मामलों वे गर्भवती हो जाती हैं. ऐसी स्थिति में उन पर अपने परिवार और समाज से बलात्कार से पैदा शिशु को गिराने का जोर पड़ने लगता है, लेकिन कानून 20 सप्ताह से ज्यादा की गर्भावस्था के बाद गर्भपात की इजाजत नहीं देता. इस तरह औरतें एक दुष्चक्र से किसी तरह निकलकर एक नए और अधिक भीषण दुष्चक्र में फंस जाती हैं. वे जाएं तो जाएं कहां? स्त्री से यह समाज और कानून आखिर क्या चाहता है? कानून कहता है कि वह और बहादुरी दिखाए. समाज कहता है वह इस 'कलंक' से पीछा छुड़ाए. पर इसमें कैसी बहादुरी और कैसा कलंक?

दरबदर भटकी

गुजरात की वह महिला पिछले साल अगवा कर ली गई थी. छह महीने तक दुराचारियों के कब्जे में रही, यातना और तकलीफ के बीच किसी तरह भागकर अपनी जान बचाते हुए घर लौटी. लेकिन वहां उसके लिए घर जैसी जगह शायद ही बची थी. उसे पता चला कि वह गर्भ से है. अस्पताल गई. 18 सप्ताह का गर्भ था. अस्पताल ने गर्भपात के लिए मना कर दिया. कहा अदालत से ऑर्डर लाओ. पहले जिला अदालत गई, उसने मना कर दिया, तब तक गर्भ 21 सप्ताह का हो गया था. फिर गर्भपात की अर्जी लेकर हाई कोर्ट पहुंची. लेकिन वहां से भी लौटा दी गई. कोर्ट के आदेश के वक्त उसकी कोख में पल रहा बच्चा 28 सप्ताह का है. और चिकित्सा कानून इस अवस्था में गर्भपात की कतई इजाजत नहीं देता है. इस तरह अपहरण के साथ शुरू हुई उस महिला की यातना, कोख में पल रहे बच्चे और घर-परिवार की बेरुखी, तानों और समाज के डर के बीच जारी है. यह इस देश में हो रहा है जो अपनी 'उपलब्धियों' और अपने 'मेक इन' में इतना उन्मत्त और गर्वीला है कि उसे नहीं पता कि उसकी एक नागरिक कैसी यातना भुगत रही है.

गुजरात मामला कई चिकत्सीय, वैधानिक और नैतिक प्रश्नों की जटिलताओं में उलझा हुआ है. नैतिकता और मानवाधिकार का पहला तकाजा तो यही कहता है कि महिला को गर्भपात की इजाजत मिलनी चाहिए, ये उसका हक है. लेकिन मेडिकल जटिलताएं और कानूनी गुत्थियां जैसे ही सामने आती हैं, एक नयी धुंध सामने आ जाती है. दूसरी ओर गर्भस्थ शिशु करीब सात महीने का है और वो जीवित है लिहाज़ा जीवित प्राणी के तौर पर जीवन का उसका भी बुनियादी अधिकार और मानवाधिकार है. तो कोर्ट के सामने भी ये अत्यंत असमंजस और दुविधा की स्थिति है. उसे ये चिंता भी है कि बच्चे को जन्म देने के बाद उसकी परवरिश कहां और किन हालात में होगी, कौन जानता है.

घर समाज का क्या?

और इस पूरे मामले की सामाजिक स्थिति तो और भी भयावह है. थोड़ी देर के लिए मान लें कि महिला गर्भपात करा ले. फिर इस बात की क्या गारंटी है कि उसका पति और परिवार उसे बाखुशी कबूल कर लेगा? कोर्ट ने भले ही आदेश दिया है लेकिन प्रशासन आखिर महिला की अपने घर पर और बाहर कब तक और किस स्तर की हिफाजत मुहैया कराता रहेगा? थोड़ा रुककर फिर से देखें तो कोर्ट का फैसला उचित ही लगता है कि महिला अपनी जान और अपनी स्वतंत्रता का सम्मान करे और बच्चे को जन्म दे.

फिर इसके बाद भूमिका आती है महिला और बाल कल्याण संगठनों की. उसे यह बताना होगा कि वो अपने परिवार और समाज से भयभीत न हो, बल्कि दोहरी जिंदगियों की रक्षा करे और उनके अधिकार का बचाव करे. उसे भरोसा दिलाना चाहिए कि शिशु की परवरिश की उसे चिंता नहीं करनी होगी और वो अपने परिवार के बीच सामान्य ढंग से रह सकती है. इसके लिए इन नागरिक संगठनों को परिवार को भी जागरूक करना पड़ेगा. वे महिला का सामाजिक पुनर्वास करें. उसे अकेला न छोड़ें और उसे बार बार याद दिलाएं कि वहशियों से लड़कर वह लौट आ सकती है तो घर और समाज में भी निर्भयता और आत्मसम्मान से अपनी जगह बनाए रख सकती है.

अंत में, सच पूछिए तो वाकई किसी के पास उस महिला की मुश्किलों का कोई सीधा हल नहीं है, उसके सवालों का कोई सीधा जवाब किसी के पास नहीं है. आम औरतों के लिए यह एक कठिन जगह बनती जा रही है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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