बलप्रयोग से नहीं आ सकती शांति | ब्लॉग | DW | 23.03.2015
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ब्लॉग

बलप्रयोग से नहीं आ सकती शांति

भारत ने पाकिस्तान को आपसी विवादों के निबटारे के लिए आतंकमुक्त माहौल में संवाद की पेशकश की है. कुलदीप कुमार का कहना है कि पाकिस्तान और भारत निरंतर संघर्ष की व्यर्थता को समझ पाए हैं, इसके संकेत नहीं हैं.

तेईस मार्च को हर वर्ष पाकिस्तान दिवस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन 1940 को लाहौर में हुए मुस्लिम लीग के अधिवेशन में पाकिस्तान के निर्माण की मांग करने वाला प्रस्ताव पारित किया गया था और पार्टी के सर्वोच्च नेता मुहम्मद अली जिन्ना द्वारा प्रतिपादित द्विराष्ट्र सिद्धान्त पर स्वीकृति की मुहर लगाई गई थी. पिछले सालों की तरह ही इस बार भी नई दिल्ली-स्थित पाकिस्तान उच्चायोग ने कश्मीरी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के सभी नेताओं को आज के समारोह में शिरकत करने के लिए निमंत्रण भेजा है और इनमें हाल ही में रिहा हुए मसर्रत आलम भी शामिल हैं.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परंपरा को निभाते हुए इस अवसर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बधाई का संदेश भेजा है और उन्हें “आतंक मुक्त माहौल में द्विपक्षीय संवाद” के लिए आमंत्रित किया है. क्या इससे भारत-पाक संबंधों में किसी बड़े बदलाव की उम्मीद की जा सकती है? क्या भारत और पाकिस्तान भी निरंतर संघर्ष की व्यर्थता को उसी तरह समझ गए हैं जिस तरह सदियों तक एक-दूसरे के साथ लड़ने वाले देश फ्रांस और जर्मनी समझ गए थे?

दुर्भाग्य से इस आशय का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिल रहा है. उल्टे जम्मू में दो दिनों में लगातार एक-के-बाद-एक हुए आतंकवादी हमलों का संदेश तो कुछ और ही लगता है और इसकी संगति पाकिस्तान उच्चायोग द्वारा समूचे हुर्रियत नेतृत्व को निमंत्रित करने के साथ बैठती है. यहां यह याद करना अप्रासंगिक न होगा की पिछले साल मोदी सरकार ने ऐन आखिरी वक्त पर पाकिस्तान के साथ विदेश सचिव स्तर की बातचीत रोक दी थी क्योंकि विदेश मंत्रालय की सलाह को नजरंदाज करके पाकिस्तान उच्चायोग ने वार्ता से पहले हुर्रियत नेताओं से मिलना जरूरी समझा था.

दरअसल भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध दो प्रमुख बिन्दुओं पर अटके हुए हैं. पाकिस्तान का कहना है कि जब तक कश्मीर विवाद का “संतोषजनक और सम्मानजनक हल” नहीं निकलता, दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य नहीं हो सकते. इसके बरक्स भारत का कहना है कि आपसी संबंधों को सामान्य करने और कश्मीर समस्या का हल खोजने की प्रक्रिया तब तक पटरी से उतरी रहेगी जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को अपनी विदेशनीति के लक्ष्य हासिल करने के औजार के रूप में इस्तेमाल करना नहीं छोडता. यह ऐसे ही है जैसे इस बात पर बहस करना कि पहले मुर्गी पैदा हुई या अंडा!

इस तथ्य को अब दुनिया भर में स्वीकार किया जाता है कि पाकिस्तान सरकार आतंकवाद को अपने राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करती आई है और आज भी उसने अपनी यह रणनीति बदली नहीं है. परिस्थितियों के बदलने के साथ-साथ वह इसमें जरूरी हेर-फेर करता रहता है लेकिन किसी प्रकार का बुनियादी बदलाव नहीं करता. कभी कोई लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार सत्ता में आती भी है तो वह चाहकर भी इसे नहीं बदल पाती क्योंकि वहां परंपरा-सी बन गई है कि देश की विदेश और रक्षा नीति सेना ही तय करती है, और उसने अभी तक ‘अच्छे' और ‘बुरे' आतंकवादियों के बीच फर्क करना बंद नहीं किया है. ‘अच्छे' आतंकवादी वे हैं जिनके निशाने पर भारत और कश्मीर हैं. 1947 से लेकर आज तक वह कश्मीर पर कब्जा करने की असफल कोशिश करता आ रहा है लेकिन बार-बार मुंह की खाने के बावजूद उसने अपनी यह कोशिश नहीं छोड़ी है.

जब तक पाकिस्तान इस बात को नहीं समझ लेता कि बलप्रयोग द्वारा वह सीमाओं को दुबारा से निर्धारित नहीं कर पाएगा, तब तक भारत के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण ही बने रहेंगे और थोड़े-थोड़े समय बाद संवाद बहाल करने की कोशिशों की कदमताल जारी रहेगी. सार्थक संवाद के लिए उसे आतंकवाद का सहारा लेना छोड़ना होगा. इसी तरह भारत को भी यह समझ लेना होगा कि यथास्थिति बरकरार रखने का उसका आग्रह यथार्थपरक नहीं है. संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया में लेन-देन स्वाभाविक है. उसे कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान को कुछ रियायतें देना स्वीकार करना होगा. जब जनरल परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे, तब इस दिशा में पर्दे के पीछे होने वाली वार्ताओं में काफी प्रगति हुई थी. जरूरत यह है कि जिस बिन्दु पर वार्ता रुकी थी, उसे वहीं से फिर शुरू किया जाये और उसकी परिणति तक पहुंचाया जाए. दक्षिण एशिया में अमन-चैन बहाल होने की यह पूर्व-शर्त है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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