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दुनिया

बर्लिन में मनमोहन सिंह का इंतजार

भारतीय प्रधानमंत्री जर्मनी के दौरे पर आ रहे हैं. जर्मनी और भारत कई दशकों से वित्तीय साझेदार रहे हैं और माना जा रहा है कि इस मुलाकात से इस संबंध को और गहरा बनाया जा सकेगा.

भारत उन देशों में है जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मन गणराज्य यानी पश्चिम जर्मनी को राष्ट्र के रूप में मान्यता दी. 1990 में भारत ने जर्मन एकीकरण का भी पूरी तरह समर्थन किया, "भारत और जर्मनी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कई राजनीतिक मामलों को लेकर एकमत हैं." ऐसा मानना है नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आरके जैन का, "दोनों देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता चाहते हैं. दोनों जी 20 गुट के संदर्भ में एक दूसरे के साझेदार हैं."

भारत और जर्मनी दोनों देशों के बीच दूसरे सरकारी बैठक के लिए साथ आ रहे हैं. भारत के अलावा जर्मनी केवल चीन और इस्राएल के साथ इस तरह के द्विपक्षीय बैठकों में शामिल होता है.

Angela Merkel und Manmohan Singh

2011 मई में मैर्केल भारत आईं

जैन मानते हैं कि बर्लिन बैठक में स्वच्छ पर्यावरण तकनीकों और वैकल्पिक ऊर्जा पर द्विपक्षीय साझेदारी मुख्य मुद्दा रहेगी. जैन मानते हैं कि इसमें परमाणु ऊर्जा भी शामिल है, "भारत का परमाणु कार्यक्रम बहुत महत्वाकांक्षी है. इस सिलसिले में जर्मन कंपनियों के योगदान को लेकर बातचीत होनी चाहिए." कई सालों से फ्रांस भारत के असैन्य परमाणु ऊर्जा सेक्टर में निवेश पर बातचीत कर रहा है.

केंद्र में वित्तीय संबंध

दोनों देशों के बीच व्यापार बैठक का अहम मुद्दा रहेगा. 2011 मई में नई दिल्ली की बैठक में जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल और मनमोहन सिंह ने तय किया था कि वे आपसी व्यापार को 15 अरब यूरो से 2012 के अंत में 20 अरब यूरो तक बढ़ाएंगे. 2011 के अंत तक व्यापार 18 अरब यूरो तक पहुंच गया था. इस बीच जर्मनी भारत को निर्यात करने वाला सातवां सबसे बड़ा देश है. भारत के आयात में से 30 प्रतिशत मशीनों का है और इसमें से ज्यादातर मशीनें जर्मनी से आती हैं. भारत में ऊर्जा तकनीक की मांग भी बहुत ऊंची है. भारत जर्मनी को कपड़ा, खाद्य सामग्री और चमड़ा निर्यात करता है लेकिन रसायन, धातु और तकनीक भी इसका हिस्सा बन रहे हैं.

यूरोपीय संघ के साथ खुला व्यापार समझौता

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लेकिन आपसी व्यापार को स्थायी तौर पर विकास की राह पर लाने के लिए दोनों देशों को और मेहनत करनी होगी. भारत जर्मनी वाणिज्य संगठन आईजीसीसी के प्रमुख बेर्नहार्ड श्टाइनरुएके इस सिलसिले में एक अहम पड़ाव की ओर संकेत करते हैं, भारत और यूरोपीय संघ के बीच खुला व्यापार समझौता, "जर्मन सरकार जोर देगी कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच यह समझौता दोनों पक्षों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा और इसलिए जर्मनी के लिए भी यह उतना ही अहम है." जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आरके जैन का मानना है कि भारत इसके हक में है, "भारत जर्मनी को आश्वस्त करने की कोशिश करेगा कि उसे ईयू पर दबाव डालना चाहिए ताकि यह समझौता एक असली रूप ले सके."

मर्सिडीज, फोल्क्सवागेन, बीएमडब्ल्यू और सीमेंस पहले से ही भारत में अपने पैर जमा चुके हैं. दूसरी ओर भारत एक खुले व्यापार समझौते से जर्मन मध्यवर्ग भी इसमें शामिल हो. "इन कंपनियों के पास जानकारी है जो दुनिया भर में आगे है और भारत चाहता है कि यह कंपनियां भी भारत के वित्तीय विकास में अपना योगदान दें." श्टाइनरुएके इस पहलू से बहुत खुश हैं. कहते हैं, "जर्मन उद्योग उम्मीद कर रहा है कि भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा भारत में उद्योग और शिक्षा के क्षेत्र में जर्मन निवेश पर ध्यान देगा."

चुनाव के बावजूद

जर्मनी को भारत से शिक्षित कर्मचारियों की जरूरत पर भी जोर देना होगा. 2005 में क्रिस्टियन डेमोक्रैट्स ने "किंडर श्टाट इंडर" यानी भारतीयों की जगह बच्चों के नारे के जरिए अपने देशवासियों के लिए नौकरियों की पहल की थी. उस वक्त इसे लेकर बहुत विवाद हुआ था लेकिन अब यह बातें भुलाई जा चुकी हैं. भारतीय राजनीतिज्ञ आने वाले दिनों में जर्मनी में भारतीय प्रतिभाओं को लेकर दिलचस्पी पर ध्यान देंगे.

इस साल सितंबर में जर्मन संसद चुनाव होंगे. 2014 में भारत भी चुनावों का आयोजन करेगा. बेर्नहार्ड श्टाइनरुएके मानते हैं कि इससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों पर खास फर्क नहीं पड़ेगा. "अगर दोनों देश कुछ मुद्दों को लेकर एकमत हैं तो फिर भविष्य में सरकार का गठन कर रही राजनीतिक पार्टियों का इससे लेना देना कम होगा. हम स्थिति के बदलने की उम्मीद नहीं कर रहे."

रिपोर्टः ग्रैहम लूकस/एमजी

संपादनः ए जमाल

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