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विज्ञान

बर्फ के घर में भारतीय वैज्ञानिकों की रिसर्च

उत्तरी ध्रुव से कुछ ही मील पहले बर्फ से ढके ऊंचे पहाड़ों के बीच है हिमाद्री, जहां भारतीय वैज्ञानिक कई अहम शोध कर रहे हैं. हिमाद्री नॉर्वे में फ्योर्ड के समुद्री किनारे से कुछ ही दूर बने छोटे छोटे पीले घरों में से एक है.

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बर्फ के इस घर में डिटर्जेंट यानी वॉशिंग पाउडर पर भी शोध हो रहा है. हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्युलर और मॉलिक्युलर बायोलॉजी यानी कोशिकीय और आण्विक विज्ञान केंद्र के डॉ. शिवाजी बताते हैं, "दो एन्जाइम्स में बहुत संभावनाएं हैं. इनका बायोटेक्नोलॉजी व्यवसाय में इस्तेमाल किया जाता है. एक है लाइपेज़ जो तेल के अणुओं को तोड़ता है और इसलिए डिटर्जेंट बनाने में इस्तेमाल होता है. दूसरा है प्रोटेज़ जो प्रोटीन को तोड़ता है और वॉशिंग मशीन के डिटर्जेंट में इस्तेमाल होता है. हम उम्मीद कर रहे हैं कि हम इन एन्जाइम्स को बायो इंजीनियरिंग के जरिए ज्यादा मात्रा में बना सकेंगे. उम्मीद है उद्योग जगत इसका स्वागत करेगा."

Klima Eisschmelze in Grönland Gletscher

आर्कटिक के बर्फीले पहाड़ों में भारत के शोध केंद्र इंडियन आर्कटिक रिसर्च स्टेशन की शुरुआत 2008 में की गई. वैसे ध्रुवों पर भारतीय शोध का काम 1981 में ही शुरू हो गया था. जब भारत ने पहली बार अंटार्टिक यानी दक्षिणी ध्रुव पर वैज्ञानिकों का दल भेजा था और 1984 में वहां बाकायदा एक केंद्र बनाया. गोवा में नेशनल सेंटर फॉर अंटार्कटिक एंड ओशन रिसर्च के डॉ राजन शिवरामकृष्णन की आर्कटिक शोध में अहम भूमिका है. वे बताते हैं, "भारत की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक कृषि पर निर्भर है. कृषि मानसून पर निर्भर है. हम यहां शोध कर रहे हैं कि किस तरह मानसून पर उत्तरी और दक्षिणी गोलार्धों का असर पड़ता है. यहां ऐसे कौन से कारण हैं जो मानसून पर प्रभाव डालते हैं."

हर साल गर्मियों में भारत के अलग अलग संस्थानों से वैज्ञानिक हिमाद्री में आते हैं और शोध करते हैं. यहां पर्यावरण विज्ञान, ग्लेशियर विज्ञान, ध्रुवीय विज्ञान, भूगर्भशास्त्र जैसे विषयों पर शोध किए जाते हैं. जलवायु परिवर्तन फिलहाल एक हॉट टॉपिक है. शोध में जुटे एक वैज्ञानिक का कहना है, "जलवायु परिवर्तन के मामले में ऐसे कई सबूत हैं जो बताते हैं कि कम समय वाले जलवायु चक्र भी होते हैं. हम जानना चाहते हैं कि क्या दक्षिणी और उत्तरी गोलार्धों में भी इस तरह के कम समय वाले चक्र हैं."

इस साल भारतीय वैज्ञानिक बर्फ के पिघलने का क्या प्रभाव हो सकता है, इस बारे में शोध कर रहे हैं. फ्योर्ड एक प्राकृतिक प्रयोगशाला जैसी है. यह छह महीने ही खुली रहती है इस समय गर्मी में बर्फ पिघल कर फ्योर्ड में आ जाती है. इससे यहां पानी की प्रकृति ही बदल जाती है. इसमें रहने वाले जीवों में बदलाव आ जाता है.

वहीं डॉ. शिवाजी उत्तरी ध्रुव पर यह शोध कर रहे हैं कि किस तरह के बैक्टेरिया ठंडे वातावरण में पाए जाते हैं. उनका वैज्ञानिक और व्यावसायिक स्तर पर कैसे उपयोग हो सकता है. डॉ. शिवाजी कहते हैं, "ठंड में बैक्टेरिया कैसे काम करते हैं, इस बारे में शोध भारत के उत्तरी हिस्सों के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि वहां कम तापमान में पेड़ पौधों की पैदावार कम होती है. हम ऐसे जीन्स ढूंढ सकते हैं कि कम तापमान में जीव कैसे रहते हैं. ये जीन्स फिर दूसरे पौधों में डाले जा सकते हैं ताकि वे कम तापमान में भी जीवित रहें. आर्कटिक की तो गर्मियां भी हमारी बर्फीली ठंड से ठंडी होती हैं."

रिपोर्टः डीडब्ल्यू/आभा एम

संपादनः ए कुमार

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