बयानों के बाहर भी दिखे सुशासन | दुनिया | DW | 25.12.2014
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दुनिया

बयानों के बाहर भी दिखे सुशासन

मोदी सरकार का गुड गवर्नेंस डे मनाने का सरकारी एलान अच्छा कदम है. लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार को कार्यक्रमों और समारोहों से अधिक ध्यान प्रशासनिक सुधारों और वास्तविक सुशासन पर देना होगा.

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई अभियानों की शुरुआत की. उन्होंने गांधी जयंती के मौके पर स्वच्छ भारत अभियान, 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि और सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया. 5 सितंबर को शिक्षक दिवस से गुरु उत्सव में तब्दील कर दिया गया. और अब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन 25 दिसंबर पर सुशासन दिवस. नरेंद्र मोदी किसी बड़ी शख्सियत की जयंती या पुण्यतिथि के मौके पर सेंटर स्टेज में आने का मौका नहीं खो रहे. लेकिन सुशासन के लिए नीतियों और सुधार कार्यक्रमों में तेजी लाने की जरूरत है.

मोदी जानते हैं कि वे जो फैसले लेंगे वह उनकी पार्टी के नेता और मंत्री सिर आंखों पर लेंगे. वे लगातार अपनी योजनाएं पेश कर रहे हैं. सुशासन दिवस के दिन उन्होंने पारदर्शी, प्रभावी और जवाबदेह सरकार की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है. इस वक्त देश की तरक्की के लिए इन चीजों की जरूरत भी है. सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होनी भी चाहिए. आखिरी पायदान पर खड़े शख्स का भी सरकार पर उतना ही हक है जितना पहले पायदान पर खड़े शख्स का है.

एक ओर प्रधानमंत्री के वायदे हैं लेकिन दूसरी ओर उसका कोई स्पष्ट ढांचा नहीं दिखता. सुशासन सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन नौकरशाही कम करने, दफ्तरी बाधाओं को दूर करने, सरकार को लोगों के दरवाजे पर लाने का कोई ब्लू प्रिंट मोदी ने अभी तक नहीं दिया है. सिवाय इसके कि प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल किया जाएगा. सरकार और जनता के बीच भरोसे की खाई पाटने के लिए मोदी की पहल सराहनीय साबित हो सकती है, लेकिन सरकारी बाबूओं को चुस्त दुरुस्त के लिए बड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम की जरूरत होगी. इसे प्रधानमंत्री कार्यालय से शुरू कर ब्लॉक और थाना स्तर तक पहुंचाना होगा.

भारत में इन दिनों धर्मांतरण का मुद्दा संसद से सड़क तक छाया हुआ है. प्रधानमंत्री ने इस पर खुल कर कुछ नहीं कहा है, लेकिन शासन में लोगों का भरोसा मजबूत करने के लिए उन्हें ऐसे मुद्दों से भी निबटना होगा. लोगों को महसूस होना चाहिए कि सरकार उन्हें धर्म या जाति के नजरिए से नहीं, बल्कि आम भारतीय नागरिक की नजर से देख रही है, तभी मोदी का "सबका साथ सबका विकास" का नारा सही साबित होगा.

देश की जनता कागजों और फाइलों में उलझे रहने के बदले अमन के माहौल में देश के विकास में योगदान देना चाहती है. लालफीताशाही को कम कर, यातायात को सुगम बना कर और नए रोजगार पैदा कर बेकार में बर्बाद हो रहे घंटों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है. सरकार की कथनी और करनी में फर्क मिटाना सुशासन के लिए जरूरी है. पारदर्शी और जवाबदेह सरकार देने की मोदी की तत्परता यदि लागू हो सके तो सुशासन दिवस सिर्फ एक दिन नहीं बल्कि पूरे साल मनाया जा सकेगा.

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