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मनोरंजन

बदल रहा है पैसे का मोल

परिवारों में पैसे के साथ बर्ताव बदल रहा है. साझे खातों के बदले अपने अपने खातों का चलन बढ़ रहा है. पहले महिलाएं पति के पैसे पर निर्भर थीं, आज वित्तीय आजादी युवाओं को आत्मनिर्भर बना रहा है. समाज चुपके चुपके बदल रहा है.

एक पुराना चुटकुला है. शादी के ठीक पहले लड़का लड़की से कहता है, "मैं सिर्फ 2000 महीने कमाता हूं, क्या तुम इसमें जिंदगी चला लोगी?" लड़की जवाब देती है, "हां, लेकिन तुम्हारा खर्च कैसे चलेगा?"

वह जमाना तेजी से बदलता जा रहा है जब मर्द कमाते थे और औरतें खर्च करती थीं. पिछली पीढ़ी से भी तुलना करें तो ऐसे जोड़ों की तादाद बहुत घट गई है जिनमें ऐसा था. यह संख्या और घटती जा रही है, लेकिन विवाहित जोड़ों में के प्रति बर्ताव नहीं बदला है.

प्रोफेसर रोल्फ हाउबल पेशे से सोशल साइकोलॉजिस्ट हैं और जर्मन शहर फ्रैंकफर्ट में जिगमुंड फ्रॉयड इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर हैं. वह परिवार के सदस्यों के आपसी व्यवहार पर रिसर्च करते हैं. उनका कहना है कि यदि पति-पत्नी पैसे पर झगड़ते हैं तो इसका संबंध आम तौर पर उनके पुराने परिवारों के वित्तीय झगड़ों से होता है. पैसे खर्च करने का तरीका इंसान बचपन में ही सीख लेता है और फिर जीवन भर वैसे ही करता है. हाउबल कहते हैं, "रिश्तों का तनाव पैसे के माध्यम से व्यक्त होता है."

पैसे की अहमियत मर्द और औरतों के लिए अलग अलग होती है. मर्द पैसे को सफलता और ताकत से जोड़ता है. महिलाओं के लिए यह सुरक्षा और आजादी है. हाउबल का कहना है कि जिन समाजों में पैसा महत्व रखता है, उनमें पैसा रिश्तों को खामोशी से रूप देने का माध्यम बन जाता है. वे धन की क्षमता को सबसे अहम सांस्कृतिक तकनीकों में से एक मानते हैं और कहते हैं, "हमें बचपन में न सिर्फ यह सीखना चाहिए कि पैसे का क्या करें बल्कि यह भी कि पैसा हमारे साथ क्या करता है."

रिश्तों के बारे में सलाह देने वाले योखेन कुंस शायद ही ऐसे जोड़ों से मिलते हैं जो पैसे पर झगड़ते हों. अपने 20 साल के पेशे में उन्होंने 500 से ज्यादा जोड़ों को रिश्तों के संकट से निकलने में मदद की है. उनका कहना है कि विवाहित जोड़ों की मुख्य समस्या एक दूसरे के साथ खुलकर बात करने और यौन संबंधों की होती है. उनका कहना है, "शादी के दौरान पैसे शायद ही समस्या होती हो, लेकिन अलग होने की स्थिति में वह उभर कर सामने आ जाती है."

रिश्ता टूटने की हालत में भावनात्मक अपराधबोध पैसे से चुकाया जाता है. कुंस कहते हैं, "महिलाएं बच्चों पर अपनी ताकत का इस्तेमाल करती हैं तो पुरुष पैसे की ताकत का." अगर आप आसपास देखें तो दो तरह के जोड़े होते हैं. एक दल का मंत्र होता है, "हम अपने पैसे को क्यों न बांटें, हम दूसरी सारी चीजें तो बांटते हैं, बच्चे, घर, बिस्तर, नाम फिर बैंक खाता क्यों नहीं?" तो दूसरे का विचार एकदम अलग होता है, "मेरे लिए बैंक खाता छोड़ना नामुमकिन है. यह आत्मनिर्भर होने की निशानी है." कुंस का कहना है कि दोनों दल के लोग ऐसे जोड़ों को बचपन से जानते होंगे जिनमें पति पत्नी को घर चलाने के लिए हर महीने पैसे देता था.

आजकल विवाहित जोड़े पैसों के साथ किस तरह पेश आते हैं, इसके बारे में बैंकों के पास कोई जानकारी नहीं है. सभी इसे दिलचस्प सवाल बताते हैं, लेकिन किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं है. कुछ सिद्धांत जरूर हैं. बैंक खातों की रणनीति के जानकारों का कहना है कि बहुत कम युवा जोड़े अपने माता-पिता की तुलना में साझा खाता रखते हैं. "वित्तीय आत्मनिर्भरता और आजादी की चाहत का नतीजा अपने अपने अलग खातों में दिखता है."

एमजे/एजेए (डीपीए)

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