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विज्ञान

बदला लेना स्वास्थ्य के लिए अच्छा..

बदला लेना बहुत कभी कभी स्वास्थ्य के लिए अच्छा भी साबित हो सकता है. अहम बात बस इतनी है कि स्थिति आपके काबू से बाहर न हो जाए क्योंकि अधिकतर मामलों में प्रतिशोध किसी मुश्किल को हल नहीं करता, न ही मन हल्का करता है.

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कई कारण हो सकते है कि आप बदला लें. ऑफिस के किसी साथी ने दूसरों के सामने खराब व्यव्हार किया हो या फिर बॉस ने किसी और को प्रमोशन दे दिया हो या उनके किसी अच्छे दोस्त ने उनसे असत्य बोला हो. ऐसे समय दिमाग में आता है कि बदला लिया जाए. शोधकर्ताओं का कहना है कि इस विचार को बिलकुल नहीं रोकना चाहिए. बदला लेने के शुरुआती विचार आने दें. यह कई बार कुछ अच्छे के लिए भी जरूरी होता है.

जर्मनी के मार्बुर्ग शहर में फिलिप यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मारियो गोलविट्जर कहते हैं, "प्रतिशोध एक ऐसी प्रक्रिया है जो हमारे रोजमर्रा के जीवन में बहुत बार होता है. लोग प्रतिशोध की कल्पनाएं करते हैं जो वह रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल करते हैं. बदला लेने के कुछ तरीके तो किसी कीमत पर स्वीकार नहीं किए जा सकते. लेकिन कुछ अच्छे परिणाम देते हैं. सिर्फ सपने में बदला लेने के बारे में सोचने से संतुष्टि नहीं मिलती." न्यू यॉर्क में स्टेट यूनिवर्सिटी में एर्लेने स्टिलवेल और उनकी सहयोगियो ने इस विषय पर शोध

Symbolbild Mord Ehrenmord Messer

रिश्तों को खत्म करती है बदले की आग

किया और गोलविट्जर के शोध की पुष्टि की. इसमें सामने आया है कि जो लोग बदला नहीं लेते उन्हें बहुत ज्यादा गुस्सा आता है.

सामान्य तौर पर लोग प्रतिशोध के जरिए एक से ज्यादा लक्ष्य पाने की कोशिश करते हैं. "कुछ मामलों में यह संतोषजनक हो सकता है. बदला लेना व्याव्हारिक है. इसके जरिए आप यह दिखा सकते हैं कि मेरे साथ इस तरह से व्यव्हार नहीं कर सकते. इसके जरिए आप सामने वाले को यह भी साफ कर सकते हैं कि मैं ऐसा नहीं हूं जिसे आप कहीं भी दबा दें. बदला संतोष तभी दे सकता है, जब सामने वाले व्यक्ति तक संदेश पहुंच जाए."

इसके अलावा प्रतिशोध हमेशा अन्याय की भावना से पैदा होता है. जिसे भी यह लगता है कि उसके साथ गलत हुआ है और वह बदला लेने के बारे में सोचता है."

इसी तथ्य की कनाडा की कैलगैरी यूनिवर्सिटी ने भी पुष्टि की है. सूजन बून और उनके टीम के शोधकर्ताओं ने पाया कि कम से कम 47 फीसदी लोगों के बदला लेने का उद्देश्य न्याय पाना था.

लेकिन दूसरी ओर यह भी है कि जो बदला लेने के बारे में सोचते हैं वह कहीं और भटक जाते हैं.

लेकिन हमेशा यह सही प्रतिक्रिया नहीं है. बर्लिन में एक लाईफकोच मारिया एल साफ्टी युएटे कहती हैं, "अधिकतर मामलों में यह अस्थायी संतुष्टि की भावना पैदा करता है और लंबे समय में आपको कुछ नहीं मिलता. प्रतिशोध की भावना बहुत विभाजनात्मक है. बहुत जरूरी है कि लोगों को यह संदेश मिले कि मैं खुद की रक्षा कर रहा हूं. लेकिन अक्सर लोग यह सोचते हैं कि अक्सर सामने वाले को उनका दुखी करने वाला व्यव्हार ही दिखाई देगा."

सिर्फ प्रेम ही ऐसा है जहां प्रतिशोध किसी समस्या को हल नहीं कर सकता. युएटे कहती हैं, "दूसरे को घायल कर आप घाव नहीं भर सकते. साथी अगर एक दूसरे को चोट पहुंचाते हैं तो यह युद्ध, संघर्ष में बदल जएगा और प्रेम कहीं बचेगा ही नहीं. इसलिए वह हमेशा लोगों से कहती हैं कि बातचीत करना सबसे अच्छा है बजाए कि बदला लिया जाए."

रिपोर्टः एजेंसियां/आभा एम

संपादनः ए जमाल

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