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फीडबैक

बदलाव लाना होगा

नए कलेवर में डॉयचे वेले हिन्दी का वेबपेज आपको पसंद आ रहा होगा. पाठकों से हमें प्रतिक्रियाएं मिली हैं, जानिए आप भी...

तकरीबन दो महीने से मैं आपकी वेबसाइट से जुड़ा हूं, इतने समय में ही मैं काफी जानकारियों और महत्वपूर्ण विषयों से अवगत हुआ. देश तथा दुनिया से जुड़ी तमाम जानकारियां व चित्र समूह काफी रचनात्मक हैं. परन्तु मेरी नजर में कुछ खामियां भी है जिससे मैं आपको अवगत कराना चाहता हूं. पेज नेविगेशन तथा कंटेंट अपडेट के मामले में वेबसाइट की परफॉरमेंस बहुत वीक है. पुरानी खबरें भी अगले दिन काफी समय तक वेबसाइट के मेन पेज पर दिखती हैं. इसके अलावा रिपोर्टो के विवरण लुभाने वाले लगते हैं न कि विचारात्मक अभिव्यक्ति से पूर्ण संपादको के लेखों जैसे. काफी सालों से मैं बीबीसी हिन्दी का सामान्य और निरंतर पाठक रहा हूं और तुलना में फिलहाल डीडब्ल्यू के हिन्दी संस्करण में काफी सुधार अपेक्षित है. लेखों और खबरों को लेकर हर संस्था के अपने उद्देश्य और नजरिये होते है इसलिए तुलना तर्क संगत नही लगती परन्तु आम भाषा में तुलना से कमियों का पता चलता है. इसके अलावा आजकल आपने प्रतियोगिताएं भी बंद कर दी हैं इस तरह की प्रतियोगिताओ के आयोजन से तो लोग आकर्षित होते है...विवेक आनंद, जिला बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश

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मैंने डीडब्ल्यू हिन्दी को 1996-97 से सुनना शुरू किया. मुझे बहुत पसंद है. अब मैं एमबीए की पढ़ाई कर रहा हूं. क्या डीडब्ल्यू हिन्दी के आईओएस एप्स की हम आशा कर सकते है...नवल, इंदौर से

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मुझे डीडब्ल्यू हिन्दी का वेबपेज बहुत ही पसंद है. यहां जर्मनी के बारे में, जर्मनी की प्राचीन संस्कृति, इतिहास और विशेषता वाले पर्यटन स्थलों के बारे में जान कर मुझे बहुत अच्छा लगता है. जर्मनी के पर्यटन स्थलों के सफर किसी स्वप्नलोक की सैर से कम नहीं हैं. केवल जर्मनी ही नहीं भारत समेत विश्व के सभी देशों की ताजा जानकारियां मुझे सबसे पहले आपसे मिलती हैं. डीडब्ल्यू के साथ मेरा बंधन अटूट रहे यही कामना करता हूं...बिधान चंद्र सान्याल, दक्षिण दिनाजपुर, पश्चिम बंगाल

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सड़क हादसों को रोकना जरूरी इस आर्टिकल में दी गयी जानकारी से सहमत होकर मुस्कान झा कहती है कि न जाने एक घंटे में कितने हादसे हो जाते हैं, कितने ही लोग मर जाते हैं सड़क दुर्घटना में. इसलिए सड़क हादसों को रोकने के लिए बाइक चलाते समय हेलमेट पहनना और कार में बेल्ट लगाना ही चाहिए ताकि हादसे हो ही नही. जब आपके साथ ऐसा कुछ होता है तो जिंदगी भर आपके अपने ही रोते हैं.

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महिला अधिकार कार्यकर्ता और कानूनी विशेषज्ञ भारत में महिलाओं पर बढ़ते एसिड हमलों को रोकने के लिए कानूनों को और सख्त बनाने की मांग कर रहे हैं, इस ब्लॉग पर हमारे कुछ पाठक लिखते हैः

अनिल कुमार राम कहते हैं "जो ये एसिड फेंकता है उसके परिवार के साथ भी ऐसा हो सकता है. कल उसकी बहन, भांजी, बेटी या पत्नी भी हो सकती है. इसे कोई और नहीं बल्कि हम सबको ही रोकना होगा". वहीं परमार भीम का कहना है "जिस देश में महिला सुरक्षित नही है वो देश कभी आगे नही बढ़ सकते". जबकि नरेश लोढ़ा लिखते हैं "तेजाब गिरने से जो पीडा होती है, उसका दर्द तो पीडित ही जानता है. पीडित बचता भी है तो वह सामान्य जीवन नही जी पाता. इसके लिए सख्त कानून बनाने चाहिए." अशोक राय का कहना है "देश में कानून बनाने से काम नही चलेगा हमें अपने में बदलाव लाना होगा."

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संकलनः विनोद चड्ढा

संपादनः आभा मोंढे

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