1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

मनोरंजन

बढ़ रहा है अमेरिका में बच्चों पर दबाव

अमेरिका में शिक्षा इतना प्रतिस्पर्धी होता जा रहा है कि कुछ बच्चों के मां बाप उन्हें फ्रेंच और चीनी भाषा में निजी ट्यूशन दिलवाने लगे हैं. छोटे बच्चों को तो सर्वात्तम स्कूलों में भर्ती के लिए पहले ही ट्रेनिंग दी जाती है.

धरती के सबसे रईस, सबसे प्रतिस्पर्धी और सबसे फैशनेबल माता-पिताओं में से कुछ अपने बच्चों की मदद में कोई कसर नहीं छोड़ते ताकि वह दूसरे बच्चों से बेहतर स्थिति में हो. ऐसे बच्चों को, जो अपनी मातृभाषा अंग्रेजी में भी शब्द बनाने की हालत में नहीं होते, उन्हें मैनहटन के अल्ट्रा ट्रेंडी इलाके ट्रिबेका में चीनी या फ्रेंच सीखने के लिए "बेबी एंड मी" क्लासों में भर्ती करा दिया जाता है. ट्रिबेका लैंग्वेज में शिशुओं की भर्ती तभी शुरू हो जाती है, जब उनके मुंह से बोली फूटनी शुरू होती है.

एक क्लास में फ्रेंच टीचर अमेरिकी मां के साथ चटाई पर बैठे नौ महीने के जुड़वां बच्चों को एक जाना माना फ्रेंच नर्सरी गीत गाकर सुनाती है. फिर वे उन बच्चों को एक गेम खेलने में मदद देती है, जिसमें दरवाजों वाले एक घर की तस्वीर बनी है, दरवाजों के पीछे कमरे में जानवरों की छोटी आकृतियां हैं. एक दरवाजे को खोलकर वह पूछती है, खरगोश कहां है? फिर जवाब देती है, ड्रॉइंग रूम में.

बड़ा बाजार

ट्रिबेका लैंग्वेज के संस्थापक मॉरिस हाजान बताते हैं कि जब वे बीस साल पहले न्यू यॉर्क आए तो उन्हें महसूस हुआ कि बच्चों को जितनी जल्दी हो सके विदेशी भाषा सिखाने का बाजार बहुत बड़ा है. न्यू यॉर्क ऐसा शहर है जिसके 37 फीसदी निवासी विदेशों में पैदा हुए हैं. यहां के औसत से ज्यादा रईस माता-पिता अपने बच्चों को दो भाषा बोलने वाला बनाना चाहते हैं, भले ही खुद माता या पिता दो भाषाएं न बोलते हों. वे इस तरह के शोध से भी प्रभावित होते हैं, जिनके अनुसार दो भाषाएं सीखने का याददाश्त और पढ़ाई पर अच्छा असर होता है.

चीनी अर्थव्यवस्था के तेज विकास के कारण चीनी भाषा सिखाने की मांग बढ़ी है, लेकिन हाजान के अनुसार फ्रेंच सीखने को अभी भी फैशनेबल समझा जाता है. दो साल से इस स्कूल में भाषा सीख रही चार साल की एक बच्ची की मां कहती है, "हम चाहते हैं कि उसका सीखने का हुनर विकसित हो और भाषा के लिए संवेदना पैदा हो ताकि बाद में चलकर भाषाओं और संस्कृतियों की छानबीन के लिए प्यार पैदा हो."

विदेशी भाषा सीखने से अच्छे प्राइमरी स्कूलों में दाखिला मिलने में भी आसानी होती है, जहां बेबी बूम के कारण पिछले सालों में प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ी है. अच्छे प्राइवेट स्कूलों में दाखिला पाने के लिए चार चार साल के बच्चों को कठिन टेस्ट देना पड़ता है. इन स्कूलों की सालाना फीस 30,000 यूरो तक होती है. प्राइवेट स्कूलों का खर्च उठा पाने असमर्थ मध्यमवर्गीय माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे सरकारी स्कूलों में दाखिल करवाना चाहते हैं, लेकिन वहां भी उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है.

बच्चों से उम्मीदें

शुरू में बच्चों के लिए निकटवर्ती प्राइमरी स्कूल में जाना अनिवार्य है, लेकिन बाद में शहर के बेहतरीन जूनियर या हाई स्कूल में जाना चाहते हैं. सात और दस साल की दो बेटियों के पिता और सरकारी कर्मचारी ली बेरमन कहते हैं, "यदि मैं कर सकता तो स्कूल के पास वाले इलाके में शिफ्ट कर जाता, लेकिन मेरी सामर्थ्य नहीं है." उनका कहना है कि मैनहटन के लोवर इस्ट साइड इलाके के सरकारी स्कूल अच्छे नहीं हैं. उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल के टैलेंट प्रोग्राम में शामिल करवाने के लिए सारा जोर लगा दिया.

2008 तक बच्चों को इस प्रोग्राम के लिए स्कूल के हेड मास्टर द्वारा चुना जाता था, लेकिन अब इसके लिए भी लिखित टेस्ट होता है. माता पिता इसकी तैयारी के लिए बच्चों के कोचिंग पर खर्च करते हैं. बेरमन की बेटियां चार साल की उम्र से ब्राइट किड्स संस्था में जाती रही हैं, जो 35 डॉलर में फोन ऐप्स, 400 डॉलर में बूट कैंप और 200 डॉलर प्रति घंटे प्राइवेट ट्यूशन बेचता है. हालांकि दोनों स्कूल के टैलेंट प्रोग्राम में शामिल हैं, लेकिन पिता का मानना है कि स्कूल ठीक से संचालित नहीं है. इसलिए बच्चियों को एक और टेस्ट देना होगा ताकि उन्हें अधिक प्रतिष्ठित सरकारी स्कूल में दाखिला मिल सके.

बच्चों पर दबाव बढ़ रहा है और बेरमन भी इसे मानते हैं. वे कहते हैं, "यह कहना कि आपका बच्चा मेधावी है, भले ही उसने पढ़ना भी शुरू नहीं किया है, बहुत से लोग इसे हास्यास्पद मानते हैं." उनका कहना है कि लक्ष्य ये नहीं है कि बच्चा हर सवाल का जवाब दे सके, बल्कि यह कि उसे टेस्ट की आदत लग सके. 2008 में खुले ब्राइट किड्स संस्था के लिए इस बीच 200 टीचर्स काम करते हैं और उसकी शहर में पांच शाखाएं हैं. वहां काम करने वाले टीचर एंड्रू पीटरसन कहते हैं कि माता-पिता को यह स्वीकार करना होगा कि बच्चे को यदि 99 के बदले 98 फीसदी मार्क्स आए हैं, तो भी वह मेधावी है.

एमजे/एनआर (एएफपी)

DW.COM

संबंधित सामग्री