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विज्ञान

बढ़े हैं गर्मी के जानलेवा हमले

एक ताजा शोध बताता है कि पिछले 15 सालों से विश्व भर में ग्लोबल वार्मिंग की दर घटने के बावजूद जानलेवा गर्मी पड़ने की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं. असहनीय होती गर्मी से अब पहले से कहीं ज्यादा जानें ले रही है.

दुनिया के कई हिस्सों में गर्मी के मौसम में पारे का जानलेवा स्तर तक पहुंचना भी जलवायु परिवर्तन का एक चेहरा है. इससे इंसान भी मारे जा रहे हैं और कई फसलें भी खराब हो रही है. ऊर्जा से लेकर पानी तक हर संसाधन पर दबाव बढ़ा है. स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के वैज्ञानिकों ने मिल कर 'नेचर क्लाइमेट चेंज' नाम के जर्नल में लिखा है, "डाटा दिखाता है कि ग्लोबल वार्मिंग के इस अंतराल में धरती पर गर्मी के अतिरेक के मामले लगातार बढ़े हैं."

2010 में रूस में चली लू की चपेट में आकर सैकड़ों लोग मारे गए. वहीं 2003 में यूरोप में भी गर्म हवाओं ने हजारों की जानें ली. 2010 में ही पाकिस्तान में पारा 53.5 डिग्री सेल्सियस तक चला गया था. 1942 के बाद यह एशिया में दर्ज किया गया सबसे ज्यादा तापमान है. वैज्ञानिकों के मुताबिक 20वीं सदी की तुलना में अब धरती की सतह के गर्म होने की औसत गति कम हुई है. समुद्रों के ज्यादा गर्मी सोखने, सूरज की किरणों को धरती पर पहुंचने से रोकने वाला प्रदूषण और कम ज्वालामुखीय विस्फोट होना इसके प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं.

बीते सालों में कई देशों ने कोयला या पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधन से सौर ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा के स्रोतों की तरफ रुख किया है. 2015 के अंत तक करीब 200 देशों को मिलकर जलवायु परिवर्तन के विषय पर एक आम सहमति बनानी है. रिपोर्ट के मुताबिक धरती के जिन इलाकों में साल में 10, 30 और 50 दिन बहुत ज्यादा गर्मी पड़ती है, उनकी संख्या 1997 से लगातार बढ़ती गई है. आर्कटिक जैसे कई क्षेत्रों में बीते सालों में यह संख्या साल दर साल दोगुनी दर से बढ़ी है.

यह पता नहीं चल पाया है कि गर्मी के जानलेवा थपेड़ों के बढ़ने का क्या कारण है. एक संभावना यह है कि समुद्रों ने वायुमंडल से गर्मी को सोख कर ग्लोबल वार्मिंग की दर को तो कम कर दिया है लेकिन धरती पर उसका कोई खास असर नहीं पड़ा है. शोध की प्रमुख लेखिका सोनिया सेनविरात्ने कहती है, "इस ट्रेंड (अत्यधिक गर्मी का बढ़ना) के रुकने की कोई वजह हमें नहीं दिखाई दे रही है." ज्यूरिख के इंस्टीट्यूट फॉर एटमोस्फियरिक एंड क्लाइमेट साइंस की इस रिपोर्ट में ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से मौसम पर पड़ रहे असर का भी जिक्र है. पिछले साल विश्व मौसम संगठन की समीक्षा में कहा गया था कि दुनिया के 56 देशों में 2001 से 2010 के बीच गर्मी के नए रिकार्ड बने जबकि सिर्फ 14 देश ऐसे थे जहां सर्दी ने रिकॉर्ड तोड़े.

आरआर/ओएसजे (रॉयटर्स)

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