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दुनिया

बढ़ी हिजाब पहनने वाली महिलाओं की तादाद

जब 18 वर्षीया यूथ वर्कर समरीन फारुख के साथ लंदन की सड़कों पर गाली गलौज हुआ तो उसने सोचा कि अब तय करने का समय आ गया है और उसने हिजाब पहनने का फैसला लिया. यूरोप में बढ़ते विरोध के बीच हिजाब लोकप्रिय हो रहा है.

समरीन फारूख ब्रिटेन में रहने वाली उन बहुत सी युवा मुस्लिम लड़कियों में से हैं जिन्होंने अलग अलग कारणों से हिजाब को अपनी आस्था दिखाने के साधन के रूप में इस्तेमाल करने का फैसला किया है. हालांकि आंकड़े बताते हैं कि देखकर पहचाने जाने वाले मुसलमानों के खिलाफ असहिष्णुता और हिंसा बढ़ रही है. यूरोपीय देशों में आम धारणा है कि मुस्लिम लड़कियों पर हिजाब पहनने के लिए मर्दों या परिवार वालों का दबाव होता है. लेकिन उन देशों में जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, सर्वे और इंटरव्यू दिखाते हैं कि अक्सर महिलाएं खुद सिर ढकने का फैसला करती हैं.

समरीन फारुख पेशे से सेल्सगर्ल हैं और अपने खाली समय में पूर्वी लंदन के लेटन में इस्लामिक यूथ सेंटर की वॉलंटियर का काम करती हैं. वे कहती हैं, "मैं जो कुछ करूं उसकी जिम्मेदारी मेरी है, इसलिए मैं हिजाब भी पहन सकती हूं." ब्रिटेन की 6.3 करोड़ आबादी में सिर्फ 5 फीसदी मुसलमान हैं और इस बात के आंकड़े नहीं हैं कि कितनी महिलाएं हिजाब या बुरका पहनती हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि हाल के सालों में ज्यादा युवा महिलाएं अपनी धार्मिक अस्मिता पर जोर देने के लिए हिजाब पहनने लगी हैं. उन्हें लगता है कि उनकी मुस्लिम पहचान पर हमला हो रहा है और उन्हें अपनी धार्मिक आस्था का खुलेआम प्रदर्शन करना चाहिए.

पढ़ी लिखी लड़कियां

एक मुस्लिम संगठन में काम करने वाली पाकिस्तानी मूल की 25 साल की शांजा अली ने मास्टर्स किया है. उनका कहना है कि उनकी मां ने कभी हिजाब नहीं पहना लेकिन उन्होंने और उनकी बहन ने 20 साल की उम्र में हिजाब पहनने का फैसला किया. शांजा ने पूर्वी लंदन के अपने घर में कहा, "मैंने मुस्लिम के रूप में प्रतिबद्धता दिखाने का फैसला किया और उसके बाद मैं कभी नहीं रुकी." वे आगे कहती हैं, "यह मुस्लिम महिलाओं को उन चीजों से दूर रखने में मदद देता है जो वे नहीं चाहतीं. यदि आप क्लब नहीं जाना चाहते, शराब नहीं पीना चाहते, शादी से बाहर रिश्ते नहीं बनाना चाहते तो इससे मदद मिलती है. यह अच्छा इंसान होने और दूसरों के साथ अच्छा बर्ताव करने की चेतावनी भी हो सकता है.

Muslimische Frauen in Kopenhagen

यूरोप की सड़कों पर मुस्लिम महिलाएँ

ब्रिटेन के मुस्लिम महिला नेटवर्क की प्रमुख शाइस्ता गोहिर कहती हैं कि अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमलों और लंदन में 2005 के हमलों के बाद और अधिक महिलाओं ने हिजाब पहनना शुरू कर दिया. वे कहती हैं, "कुछ महिलाओं के लिए यह ऐसा दिखाने का जरिया है कि वे अलग हैं, वे मुसलमान हैं, हालांकि इस्लाम में इसकी बाध्यता नहीं है." उनका कहना है कि ब्रिटेन में बहुत कम महिलाएं बुरका पहनती थीं लेकिन वह देश में समेकन और ब्रिटिश मूल्यों की बहस के केंद्र में आ गया था. यह बहस यहां तक आ पहुंची कि पिछले साल एक जज ने फैसला सुनाया कि मुस्लिम महिलाएं बुरका पहनकर अदालत में गवाही नहीं दे सकतीं.

हिजाब पर बहस

इसके बाद यह बहस छिड़ गई कि क्या ब्रिटेन में भी दूसरे यूरोपीय देशों की तरह सार्वजनिक स्थानों पर बुरका पहनने पर रोक लगानी चाहिए. राष्ट्रीय बहस के बाद इस पर समझौता हुआ कि महिलाएं अदालत में बुरका पहन सकती हैं लेकिन गवाही देने के दौरान नहीं. इस्लाम में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए शराफत की बात कही जाती है लेकिन अधिकांश इस्लामी विद्वानों में इस बात पर सहमति है कि चेहरे को पूरी तरह ढकने वाला नकाब पहनना धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक परंपरा है.

Burka Verbot Frankreich Frauen Symbolbild

फ्रांस में बुरके पर प्रतिबंध

हिजाब पहनकर अपने धर्म का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाली महिलाओं ने पाया है कि इसके लिए उन्हें निशाना बनाया जा सकता है. मुस्लिम विरोधी हमलों पर नजर रखने वाली संस्था मामा के अनुसार ब्रिटेन में मुसलमानों पर हमलों में तेजी आई है. अप्रैल 2012 से अप्रैल 2013 तक मामा ने 584 मामले रिकॉर्ड किए जिनमें से 74 फीसदी ऑनलाइन हुए. शारीरिक हमलों में से करीब 58 फीसदी मामले मुसलमान महिलाओं के खिलाफ लक्षित थे और उनमें से 80 फीसदी को मुस्लिम महिला के रूप में पहचाना जा सकता था. फासीवादी रुझानों पर रिसर्च करने वाले मैथ्यू फेल्डमैन का कहना है कि आश्चर्य की बात है कि मुस्लिम महिलाओं पर हमलों के बढ़ने के साथ हिजाब पहनने वाली महिलाओं की तादाद भी बढ़ी है.

अलग अलग रवैया

मुस्लिम दिखने के लिए हिजाब पहनने का रवैया खासकर उन देशों में देखा जा रहा है जहां मुसलमान बहुमत में नहीं हैं. ऑस्ट्रिया, भारत, इंडोनेशिया और ब्रिटेन में 2012 में हुए एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे में हिजाब के मुद्दे पर भी सवाल पूछे गए. इंडोनेशिया में मुसलमान बहुमत में हैं जबकि भारत में वे अल्पसंख्यक हैं. अल्पसंख्यक देशों में हिजाब पहनने के कारण धार्मिक से लेकर सुविधा और स्टीरियोटाइप का विरोध जैसे थे. लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की रिसर्चर कारोलीन होवार्थ कहती हैं, "अल्पसंख्यक मुसलमानों के लिए हिजाब सांस्कृतिक पहचान व्यक्त करने का जरिया है."

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने वाली 29 वर्षीया संदास अली कहती हैं, "इस तरह की गलतफहमी है कि पुरुष महिलाओं को बताते हैं कि उन्हें क्या पहनना है लेकिन मेरे लिए और मेरे दोस्तों के लिए ये लागू नहीं होता." वे कहती हैं कि उनके पति धार्मिक कायदे कानूनों को नहीं मानते, उन्होंने यह बात उनपर छोड़ दी. "हमारी मिश्रित पहचान है, हमारी धार्मिक, जातीय और राष्ट्रीय पहचान हमारे लिए महत्वपूर्ण है. उसके पूरब का होने के अलावा इस बात ने भी मुझे प्रभावित किया कि वह उदार और खुले दिमाग वाला है. हम सचमुच आधुनिक मुस्लिम पीढ़ी हैं."

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