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दुनिया

बड़े, स्मार्ट शहरों में लड़कियां कहां रहेंगी?

आने वाले दिनों में दुनिया के बड़े शहर तेज रफ्तार वाली रेल, सुपरफास्ट इंटरनेट और हरित ऊर्जा वाले तंत्र से तो लैस होंगे लेकिन जानकारों का कहना है कि इन स्मार्ट शहरों में एक चीज की जगह नहीं होगी और वह हैं लड़कियां.

दुनिया भर के नेता जिन स्मार्ट शहरों को बनाने में जुटे हैं वह तेजी से बढ़ते मध्य वर्ग के लोगों को सुविधायें तो देगा लेकिन इसमें ऐसी जगहें शायद नहीं होंगी जहां लड़कियां चैन से सुरक्षित रह कर पढ़ लिख सकें, खेल कूद सकें. समाजसेवी संगठन नादी फाउंडेशन के प्रमुख मनोज कुमार कहते हैं, "मैं समावेशी शहरों, लचीले शहरों, स्मार्ट शहरों, टिकाउ शहरों पर बनी पारंपरिक रिपोर्ट देखता हूं. मैं आग्रह करता हूं कि आप उनके अंदर झांक कर देखिये वहां लड़कियों की कोई जगह नहीं. हमारे पास सबवे होंगे, मेट्रो होंगे, ये सब जैविक ईंधन पर चलेंगे लेकिन लेकिन किसके लिए. इस बात पर कोई चर्चा नहीं है कि लड़कियों के लिए दुनिया कैसी होगी?" मनोज कुमार ने यह बातें थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के सालाना कांफ्रेंस में कही जहां गुलामी और महिलाओं के अधिकार के मुद्दे पर चर्चा हो रही थी.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2014-15 में 54 फीसदी आबादी शहरों में रहती थी. 2050 तक ये आंकड़ा बढ़ कर 66 फीसदी तक पहुंच जायेगा. इसके साथ ही मेगासिटी यानि जहां एक करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं उनकी तादाद 1990 की तुलना में तीन गुना बढ़ कर 31 तक पहुंच गयी है. संयुक्त राष्ट्र हैबिटेट का कहना है कि 2030 तक दुनिया में ऐसे शहरों की तादाद 41 तक पहुंच जायेगी. मिस्र, भारत और ब्रिटेन के जानकारों ने कहा कि शहरीकरण की तेज रफ्तार लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा को बहुत पीछे छोड़ देगी.

झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोगों की भलाई के लिए काम करने वाली संस्था सोसायटी फॉर द प्रमोशन ऑफ एरिया रिसोर्स सेंटर्स की निदेशक शीला पटेल का कहना है कि बढ़ता मध्य वर्ग शहरों के बढ़ने के लिए जिम्मेदार है लेकिन इन शहरों में गरीबों को कोई नहीं देखता. पटेल ने कहा, "शहरी मध्यवर्ग में गरीब लोगों की एक बहुत बड़ी तादाद है जो हमारे जीवन को सुगम बनाते हैं लेकिन हम उन्हें अदृश्य बनाये रखते हैं."

मनोज कुमार का कहना है कि भारत के शहरों में भी लड़कियों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं इसलिए वो क्लास खत्म होने के बाद भी स्कूल में रहना चाहती हैं क्योंकि भीड़ भाड़ वाले घरों और मुहल्लों में उन्हें उत्पीड़न और हमले का डर बना रहता है. उनका संगठन लड़कियों के लिए आफ्टर स्कूल क्लब का भी संचालन करता है.

कुमार यह भी कहते हैं कि भारत में गांवों से शहरों की तरफ बड़ी संख्या में पलायन हो रहा है और इसके कारण रिहायशी इलाकों में भीड़ और खतरा बढ़ रहा है. इसकी वजह से महिलाओं पर खतरा बढ़ने के साथ ही उनके लिए अवसरों में भी कमी आ रही है. उन्होंने कहा, "लड़कियों की सुरक्षा पर खतरा है और सबसे बड़ी चुनौती उनके सामने यह है कि इस खतरे से बचने का सिर्फ एक ही तरीका माना जाने लगा है कि उनकी शादी कर दी जाये."

एनआर/एमजे (रॉयटर्स)

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