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विज्ञान

बच्चों को चाहिए कंगारू केयर

यूरोप के कई देशों में पैदा होते ही बच्चों को अलग कमरे में सुलाए जाने का रिवाज है. यानी उनके लिए शुरू से ही मां बाप के बिस्तर से अलग बिस्तर होना चाहिए. लेकिन अब उन्हें कंगारू केयर का तरीका सिखाया जा रहा है.

सीजर अल्गेसिरास कई बार नवजात शिशुओं की इंटेसिव केयर युनिट में अपने बच्चे को छाती से लगाए चार पांच घंटे बैठी रहती हैं. 36 साल की सीजर कहती हैं, "उसकी धड़कन सुनना आनंद देता है. कई बार तो मैं मॉनिटर भी नहीं देखती कि मशीन ठीक से चल रही है या नहीं."

त्वचा से त्वचा का यह संपर्क कंगारू केयर कहलाता है. कंगारू अपने बच्चों की पैदाइश के बाद कई महीने तक उसे पेट पर बनी थैली में लिए घूमते हैं. ताकि उनका विकास हो सके. कोलंबिया में भी इस तरीके की शुरुआत हुई क्योंकि वहां प्री मैच्युर बच्चों के लिए इन्क्यूबेटरों की कमी थी.

अब यह तरीका पसंद किया जाने लगा है. 27वें हफ्ते में पैदा हुआ सीजर का बच्चा जीने की लड़ाई लड़ रहा है. कुछ समय वह इन्क्यूबेटर में रहता है लेकिन उनके पिता को विश्वास है कि शारीरिक संपर्क जादू कर सकता है. 1978 से कंगारू केयर का समर्थन करने वाली डॉक्टर नाताली चारपार्क कहती हैं, "इंटेसिव केयर में रहने वाला शिशु दिन में 19 मिनट से ज्यादा नहीं सोता."

कुछ नियम

भले ही शब्द सुनने में आसान लगता हो लेकिन यह इतना आसान है नहीं. बच्चे को लिए हुए माता पिता को हिलने की इजाजत नहीं है. वह बच्चे को दूध पिलाने और नैपी बदलने के लिए ही हिला सकते हैं. रात में देखना होता है कि बच्चा बिलकुल सीधा सोया है और शरीर से संपर्क भी बना हुआ है.

आसपास का माहौल भी अहम है. भ्रूण जैसा माहौल बनाने के लिए सुनिश्चित किया जाता है कि लाइटें हल्की हों और आवाज का स्तर 60 डेसिबल से ज्यादा ना हो. नाताली ने बताया कि उन्होंने अमेरिका, स्पेन और स्वीडन सहित 30 देशों को इसकी ट्रेनिंग दी है. और अब एशिया और अफ्रीका में भी इसका प्रचार किया जा रहा है.

एएम/आईबी (एएफपी)

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