1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

विज्ञान

बच्चों के बर्ताव पर बहस

स्वीडन के घरों में बच्चों का राज चलता है, वो मां बाप पर हुक्म चलाते हैं. स्कूल में वो शिक्षकों से बदजुबानी करते हैं. बीते तीन साल से सामने आ रही ऐसी शिकायतों के बाद अब स्वीडन में लालन पालन को लेकर जोरदार बहस छिड़ गई है.

छह बच्चों के पिता और स्वीडन के मशहूर मनोचिकित्सक डेविड एबरहार्ड कहते हैं, "कुछ मायनों में स्वीडिश बच्चे वाकई बदतमीज हैं. अगर डिनर टेबल पर बड़े बात कर रहे हों तो वे चीखते हैं, वे लगातार बाधा डालते हैं और बड़ों की ही तरह के अपने अधिकार मांगते हैं."

एबरहार्ड ने हाल ही 'हाउ चिल्ड्रेन टुक पावर' यानी बच्चों ने कैसे नियंत्रण हासिल किया नाम की किताब लिखी है. वह कहते हैं, "इसमें कोई विवाद नहीं कि आपको बच्चों की सुननी चाहिए लेकिन स्वीडन में ये बात हद के पार चली गई है. वे परिवार में सब कुछ तय करने की कोशिश करते हैं, जैसे सोने के लिए बिस्तर में कब जाना चाहिए, कब खाना चाहिए, छुट्टियों पर कहां जाना चाहिए और ये भी कि टेलीविजन पर क्या देखना चाहिए."

एबरहार्ड का तर्क है कि इस माहौल में पलने वाले बच्चे जवानी के लिए ढंग से तैयार ही नहीं हो पाते, "उनकी उम्मीदें बहुत ही ज्यादा हैं और जिंदगी उनके लिए बहुत कठिन हो जाती है. हम साफ देख रहे हैं कि मानसिक अवसाद और खुद को नुकसान पहुंचाने के मामले नाटकीय ढंग से बहुत ज्यादा बढ़ रहे हैं."

संवेदनशील विषय

लेकिन फेमिली थेरेपिस्ट मार्टिन फोरस्टर जैसे विशेषज्ञों को एबरहार्ड के तर्कों पर आपत्ति है. फोरस्टर कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वीडन के युवा काफी सफल है. इसका कारण बताते हुए वह कहते हैं, "स्वीडन इस विचार से बहुत ज्यादा प्रभावित है कि बच्चे केंद्र में होने चाहिए और उनकी सुनी जानी चाहिए." इससे बच्चों की प्रतिभा निखरती है. हालांकि लालन पालन पर हो रही बहस के कुछ बिंदुओं से फोरस्टर भी सहमत हैं. वह भी मान रहे हैं कि अगर बच्चे सब कुछ ही तय करने लगें तो मुश्किल भरी स्थिति आ जाएगी, लेकिन इससे निपटने की जिम्मेदारी वो माता पिता की बताते हैं. कहते हैं, "बच्चे बहुत ही ज्यादा फैसले करें तो ये मूल्यों की बात है. लालन पालन के भिन्न तरीके और बच्चे अलग संस्कृति बनाते हैं."

स्वीडन के स्कूलों में बच्चों का प्रदर्शन खराब होता जा रहा है, इससे बात से भी बहस को बल मिला है. इंटरनेट, अखबारों और टीवी पर लगातार चर्चा हो रही है. नई नई बातें सामने आ रही हैं. ऐसा ही एक वाकया पत्रकार ओला ओलोफसन सामने लाए. वो अपनी सात साल की बेटी से मिलने जब स्कूल पहुंचे तो देखा कि दो बच्चे एक दूसरे को भद्दे अपशब्द कह रहे थे. ओलोफसन कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि सात साल के बच्चे ऐसे शब्दों का मतलब जानते हैं और जब मैंने दखल देने की कोशिश की तो उन्होंने मुझसे अपशब्द कहे और कहा कि मैं अपने काम से काम रखूं."

स्कूल से लौटने के बाद ओलोफसन ने आंखों देखा हाल लिखा. इंटरनेट पर आर्टिकल डालते ही ऐसी ही शिकायतें करने वाले सैकड़ों अभिभावकों और शिक्षकों के प्रतिक्रियाएं आईं. राजधानी स्टॉकहोम के प्राइमरी स्कूल की एक टीचर ने कहा कि, जब मैं बच्चों कुछ करने को कहती हूं, तो चार पांच साल के बच्चे जवाब देते हुए कहते हैं, "क्या आपको लगता है कि मुझे इसकी परवाह है."

एक और उदाहरण देते हुए टीचर ने लिखा, "एक चार साल के बच्चे को जब मैंने अलमारी में चढ़ने से मना किया तो उसने मुझ पर थूक दिया."

लालन पालन और राजनीति

फैमिली थेरेपिस्ट फोरस्टर मानते हैं कि स्वीडन में बच्चों को लालन पालन पारिवारिक के बजाए राजनीतिक मसला है. 2010 से सरकार ने चाइल्ड वेलफेयर नाम का कार्यक्रम शुरू किया. इसमें मां बाप को लालन पालन के तरीके सिखाये जाते हैं. सरकार कहती है कि "सभी बच्चे केंद्र हैं." कोर्स का संदेश है कि बच्चों को सजा देना सही तरीका नहीं है. कोर्स तैयार करने में शामिल मनोचिकित्सक काजसा लोएन-रोडिन कहती हैं, "अगर आप चाहते हैं कि बच्चे सहयोग करें तो सबसे अच्छा रास्ता ये है कि एक करीबी रिश्ता हो, जिसमें बच्चे भी आपको सहयोग दें. मुझे लगता है कि बड़ी समस्या बच्चों के साथ होने वाला बुरा बर्ताव है, खासकर खराब लालन पालन के दौरान."

मारी मायरस्टाड और उनके पति ने 2012 सरकारी कोर्स में लालन पालन के गुर सीखे. उस वक्त उनकी बेटियों की उम्र तीन और चार साल थी. खाना खाते समय वो इधर उधर भागती थीं और अक्सर खाने की मेज पर खिलौने रख देती थीं. मारी के मुताबिक कोर्स से उन्हें बच्चों के साथ बेहतर समझ विकसित करने में मदद मिली. लेकिन साथ ही शिकायती स्वर में वह यह भी कहती हैं कि स्वीडन के घरों में बच्चों का नियंत्रण ही चलता है, "हमारे कई दोस्तों के यहां भी आप साफ देख सकते हैं कि बच्चे हीरो बने रहते हैं."

स्वीडन के कारोलिन्स्का यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के बाल विशेषज्ञ प्रोफेसर हुगो लागेर्सक्रांट्ज मानते हैं कि लोकतंत्र और बराबरी के नाम पर स्वीडन के मां बाप पर कुछ ज्यादा ही बोझ डाल दिया गया है, "स्वीडिश अभिभावक बहुत ही लोकतांत्रिक होने की कोशिश करते हैं. उन्हें अभिभावक की तरह व्यवहार करना चाहिए और फैसले करने चाहिए. हर वक्त अच्छा बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए."

हालांकि प्रोफेसर लागेर्सक्रांट्ज यह भी कहते हैं कि, "स्वीडिश बच्चे बेहद बेबाक है और वे अपनी राय जाहिर कर सकते हैं. इस वजह से स्वीडन के समाज में ऊंचे नीचे का जटिल ढांचा नहीं बना और कुछ मायनों में ये बेहद अच्छी बात है, आर्थिक रूप से देश के अच्छा प्रदर्शन करने के पीछे यह भी एक वजह है."

ओएसजे/एएम (एएफपी)

DW.COM

संबंधित सामग्री