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दुनिया

बच्चों की हिफाजत में नाकाम भारत

भारतीय सरकार छात्रों और सरकारी प्रतिष्ठानों में बच्चों को यौन हिंसा से बचाने में नाकाम रही है. मानवाधिकार संगठन का दावा है कि स्कूलों में बच्चे सुरक्षित नहीं हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट ऐसे वक्त में आई है, जब दिल्ली बलात्कार कांड के बाद से लोगों में यौन हिंसा और महिला अपराध को लेकर जागरूकता बढ़ी है. रिपोर्ट के मुताबिक सरकार और आम आदमी इस मसले को गंभीरता से नहीं ले रहा है.

इसमें कहा गया है कि सरकारी बालगृहों का जरूरी निरीक्षण नहीं किया जा रहा है और कई ऐसे लोग वहां पहुंच रहे हैं, जिनका नाम भी रजिस्टर नहीं है. ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली का कहना है, "हैरानी की बात है कि जिन प्रतिष्ठानों पर बच्चों की सुरक्षा का दायित्व है, वही उन्हें जोखिम में डाल रहे हैं."

ग्रुप का कहना है कि कानून का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए और बाल सेवाश्रमों की निगरानी और देखरेख में और चौकसी बरती जानी चाहिए. इसमें कहा गया है कि पुलिस को भी इंसानी व्यवहार अपनाना चाहिए और कुछ अमानवीय मेडिकल टेस्ट बंद किए जाने चाहिए. भारत और दक्षिण एशिया के कई दूसरे मुल्कों में बलात्कार की शिकार महिला की मेडिकल जांच के नाम पर उसकी योनि में दो अंगुली डाल कर जांच की जाती है. ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट सैकड़ों विस्तृत अध्ययनों, स्वतंत्र जानकारों, पुलिस, यौन हिंसा के शिकार बच्चों और उनके रिश्तेदारों, पुलिस और डॉक्टरों से बातचीत के बाद तैयार की गई है.

हिफाजत से दूर बच्चे

भारत में करीब 43 करोड़ बच्चे हैं, जो देश की आबादी का एक तिहाई और पूरी दुनिया के बच्चों के 20 फीसदी हैं. भारत में सरकारी संस्थाओं की स्थिति ज्यादा खराब है. पारिवारिक यौन हिंसा के शिकार लोगों की मदद करने वाली दिल्ली की संस्था रिकवरिंग एंड हीलिंग फ्रॉम इनसेस्ट की अनुजा गुप्ता का कहना है, "बच्चों में यौन उत्पीड़न का खतरा बहुत ज्यादा रहता है. यह ज्यादा खतरनाक हो जाता है क्योंकि ऐसे बालगृहों में उनकी देख रेख के लिए कोई नहीं होता."

गुप्ता का कहना है कि ज्यादातर मामलों में सुरक्षा करने वाले ही बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार करते हैं, "अगर रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो स्थिति बुरे सपने की तरह हो जाती है क्योंकि बच्चे के पास तो कहीं और जाने की जगह ही नहीं है."

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग भी बड़ी चुनौती का काम होता है. बच्चों की सुरक्षा के राष्ट्रीय आयोग की प्रमुख शांता सिन्हा का कहना है कि पुलिस, अदालत या अफसर इन बातों को मानते ही नहीं है कि किसी रिश्तेदार ने बच्चे के साथ बदसलूकी की है, "लोगों को अपने अधिकारों के बारे में जागरूक करना पड़ता है. यह काम थाने में रिपोर्ट करने से शुरू होती है और इस बात पर जोर देना पड़ता है कि बच्चों को न्याय मिले."

नाकाम पुलिस

भारतीय पुलिस में सही ट्रेनिंग की कमी है और इस वजह से बच्चों के साथ हुई यौन हिंसा को लेकर उनमें जागरूकता नहीं है. वे किसी मामले को दर्ज करने की जगह आपस में सुलह कर लेने पर जोर देते हैं. गिने चुने मामलों में किसी को सजा होती है और देश की लचर कानून व्यवस्था की वजह से एक एक मामले के पूरा होने में दसियों साल लग जाते हैं.

दिल्ली बलात्कार कांड के बाद सरकार पर कुछ जरूरी कदम उठाने का दबाव बढ़ा है और महिला अधिकार के लिए एक नया विधेयक भी आ रहा है. सरकार ने एक पैनल बनाया है, जो महिलाओं को बेहतर अधिकार देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की चर्चा कर रहा है. सरकार ने बाल सुरक्षा के लिए 2012 में एक सख्त कानून लागू किया है लेकिन इसके पालन में मुश्किल हो रही है.

भारत में महिला और बाल कल्याण को लेकर पिछले डेढ़ महीने में बड़ी बड़ी बातें हुई हैं लेकिन सरकारी कोशिशों का अंदाजा इस बात से लग सकता है कि इस दौरान महिला कल्याण मंत्री कृष्णा तीरथ का नाम तक सामने नहीं आया है.

एजेए/एमजी (एपी, डीपीए)

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