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मनोरंजन

"बचपन से थी कविता की ललक"

दिनेश कुमार शुक्ल हिन्दी के अत्यंत चर्चित कवियों में हैं और अपनी ठेठ हिन्दी के ठाठ के लिए मशहूर हैं. वर्ष 2008 में उन्हें प्रतिष्ठित केदार सम्मान से अलंकृत किया गया और अगले वर्ष प्रथम सीता पुरस्कार से.

दिनेश कुमार शुक्ल के आठ कविता संग्रह और चिली के नोबेल पुरस्कार विजेता पाब्लो नेरुदा की कविताओं का हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं. प्रस्तुत है उनके साथ हुई बातचीत के अंश:

आप तो विज्ञान के विद्यार्थी थे. साहित्य में कब और कैसे रुचि हुई? आपकी शिक्षा दीक्षा कहां हुई?

मेरी शुरुआती पढ़ाई लिखाई अपने गांव नरवल में हुई जहां शिक्षा का माहौल रहा है. यह गणेश शंकर विद्यार्थी की कर्मभूमि रही. स्व. श्री श्यामलाल गुप्ता पार्षद जिनकी लिखी हुई कविता "झंडा ऊंचा रहे हमारा" पूरा हिन्दुस्तान पढ़ता है, हमारे ही गांव के थे. दसवीं की शिक्षा गांव से करके इंटरमीडिएट के बाद मेरी पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई जहां भौतिकी में मैंने बीएससी, एमएससी और पीएचडी की. कविता लिखने की ललक तो बचपन से ही थी और हमारे क्षेत्र में "कोई कवि हो जाए सहज संभाव्य है" वाला वातावरण हमेशा ही रहा है. आगे चल कर तो फिजिक्स भी कविता जैसी ही हो जाती है जहां भाव और भौतिकी दो समुद्रों की तरह आपस में एकमेक होते रहते हैं. यहां बता दूं कि प्रख्यात नाटककार और कवि विपिन कुमार अग्रवाल इलाहाबाद में हमारे न्यूक्लियर फिजिक्स के प्रोफेसर थे.

शुरुआती साहित्यिक अनुभव किस तरह के थे? उस दौर में किससे प्रेरणा ली? इलाहाबाद का साहित्यिक माहौल कैसा था?

शुरुआती साहित्यिक अनुभव ज्यादातर दो चार दोस्तों के साथ बातचीत तक ही सीमित था. उस जमाने में सोवियत साहित्य बहुत आसानी से और सस्ते दामों में सुलभ था जो हमारे लिए विश्व साहित्य की खिड़की का काम करता था. इलाहाबाद में साहित्यिक तथा सांस्कृतिक आयोजन बहुत होते रहते थे जहां हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार महादेवी वर्मा जी, सुमित्रानंदन पंत, अज्ञेय, उपेन्द्र नाथ अश्क, विजय देवनारायण साही, डॉक्टर रघुवंश, दूधनाथ सिंह, मार्कण्डेय, भैरव प्रसाद गुप्त आदि को अनेक बार सुनने का मौका मिला. फिराक साहब तो विश्वविद्यालय के निकट ही रहते थे, उनका दरबार सभी के लिए खुला रहता था चाहे वह नया लेखक हो या पुराने से पुराना सहित्यकार. इलाहाबाद में दूसरी जगहों से भी बड़े बड़े साहित्यकार आते रहते थे और उनके पास‌ उठने बैठने, बातचीत करने का मौका बहुत मिला.

मेरे ऊपर प्रमुख प्रभाव उस समय की साहित्यिक पत्रिका "उत्तरार्ध" ने डाला. इसके अतिरिक्त हैदराबाद से निकलने वाली "कल्पना" तथा इलाहाबाद से निकलने वाली "कहानी" और "नई कहानी" पत्रिकाएं भी थीं. वे दिन वामपंथी प्रगतिशील रुझान के थे. उन दिनों राममनोहर लोहिया के समाजवाद का भी असर साहित्यिक हल्कों में बहुत बड़े पैमाने पर था. इलाहाबाद में प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था "परिमल" ने भी सक्रिय रचनाशीलता का माहौल बना रखा था.

आपकी कविता अपनी लयबद्धता और छंद के समकालीन इस्तेमाल के लिए जानी जाती है जबकि हिन्दी में अधिकांश कविता गद्य के बेहद नजदीक आ चुकी है. क्या कविता से छंद और लय का अनुपस्थित होना भी उसके और पाठक के बीच दूरी पैदा करता है?

देखिये, 'लय' और 'छंद' बिल्कुल अलग अलग हैं. 'लय' तो गद्य कविता में भी हो सकती है और 'छंद' में बांधकर लिखी हुई कविता लयहीन हो सकती है. मैं समझता हूं कि लय वह चीज है ‌जो वाक्य को प्राणवान बनाती है. लयात्मक रचना पाठक की अपनी व्यक्तिगत 'लय' के साथ अपनी 'लय' बैठा लेती है और एक तरह का रेजोनेन्स रचना और पाठक के बीच स्थापित हो जाता है. लय का अर्थ सह अनुभूति भी हो सकता है. कविता में अगर लय होगी तो वह पाठक के स्नायुतंत्र को छूना शुरू कर देगी. लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि 'लय' हो और पढ़ने वाला उसे पकड़ ही न पाए. अर्थ की अपनी एक अलग 'लय' होती है जो शब्द और ध्वनि से हट कर एक नया संसार बनाने की चेष्टा करती है. छंद कई बार अनर्थ भी कर सकता है. अब आप देखिए, इधर हिन्दी में गजल और दोहों की ऐसी दुर्गति हुई है कि अजीरन हो गया है.

छंद भले ही न हो, किंतु लय के अभाव में कविता निष्प्राण हो जाती है. हिन्दी में कविता के सुनने वालों की संख्या जो घटती जा रही है, उसके अनेक कारणों में से यह भी एक कारण है.

लोकजीवन के प्रति गहरा लगाव भी आपकी कविता की एक प्रमुख विशेषता है जो आज की अधिकांशतः शहरी कविता से उसे अलग करता है. क्या कविता में लोकजीवन के तत्व अनायास आते हैं या इसके पीछे कोई सचेत कोशिश भी है?

मैं गांव का हूं. मुझे कविता मिलती ही लोकजीवन से है. मेरी कविता के प्रेरणास्रोत वे मेहनतकश हैं जो गांव और शहर में रोज की वंचनाओं को झेलते हुए जीवन यापन कर रहे हैं लेकिन उनके स्वप्नों और उम्मीदों में जीवन सबसे प्रखर और तेजस्वी रूप में उपस्थित होता है - कविता वहीं से आती है. लोक को केवल गांव और प्रकृति तक ही सीमित न समझा जाए. लोकचेतना का अर्थ उन सारे लोगों के प्रति संवेदना से जुड़ा हुआ है ‌जो मेहनतकश हैं. उनमें निम्न मध्यम वर्ग भी आता है और जो अन्याय के प्रतिकार में खड़े होने का दम रखता है.

हिन्दी साहित्य का समकालीन परिदृश्य आपको कैसा लगता है. क्या वह आशान्वित करने वाला है?

हिंदी का समकालीन परिदृश्य बहुत भीड़ भाड़ भरा है. नगाड़े भी बज रहे हैं और तुरहियां भी. इस उर्जस्वित और विविधता से भरी हुई हिन्दी कविता की दुनिया में आप आशान्वित भी हो सकते हैं और बेहद निराश भी.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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