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ब्लॉग

"बगावत मुकदमे की आलोचना सही"

बांग्लादेश की अदालत ने 152 लोगों को 2009 में बॉर्डर गार्ड्स की बगावत में हिस्सा लेने के दोष में मौत की सजा सुनाई. डॉयचे वेले के दक्षिण पूर्व एशिया के प्रमुख ग्राहम लुकास का मानना है कि यह आलोचना सही है.

बांग्लादेश का मानवाधिकार रिकॉर्ड हाल के साल में काफी नीचे गया है. उस पर ये भी आरोप हैं कि देश अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनल के मानकों का पालन करने में विफल रहा है. और यह भी कि पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने का सिलसिला बढ़ रहा है. 846 आरोपियों पर चले मुकदमे में पांच नवंबर को जो सजा सुनाई गई, उससे बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मानकों का पालन करने और मानवाधिकार का सम्मान करने की कोशिशों पर एक बार फिर सवाल उठा है.

बगावत में शामिल जिन लोगों को दोषी पाया गया उनके पास बचाव के लिए वकील बहुत सीमित थे ऐसे में मुकदमे के निष्पक्ष रहने की संभावनाएं खत्म हो गईं. इस बगावत में 74 लोग मारे गए थे जिनमें से 57 सैन्य अधिकारी थे. बताया जाता है कि 47 लोग ऐसे भी थे जिन्हें बगावत में शामिल होने के संदेह पर पकड़ा गया था और मुकदमा शुरू होने से उनकी मृत्यु हो गई. इसके पीछे कथित दुर्व्यवहारों को इसका कारण बताया गाय है. ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक अदालत ने गारंटी तो दी थी लेकिन आरोपियों की गवाही उन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल की गई.

बॉर्डर गार्ड के महानिदेशक अजीज अहमद जैसे कुछ लोगों के मुताबिक न्याय हुआ है. विशुद्ध बांग्लादेशी दृष्टिकोण से ही यह संभव हो सकता है. आखिरकार तनख्वाह और काम के माहौल के मुद्दे पर हुई बगावत में शर्मनाक और बिना उकसावे के हिंसा हुई जिसके कारण बहुत से लोगों की जान गई.

समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक सेना खुद ही बगावत को दबाने की कोशिश कर रही थी लेकिन सरकार ने उन्हें ऐसा करने से रोका. सरकार राजधानी की सड़कों पर सेना नहीं चाहती थी. यह अपने आप में तो आश्चर्यजनक बात नहीं है. बांग्लादेश की सेना ने 1971 में पाकिस्तान से आजादी के बाद 21 बार तख्तापलट की कोशिश की है.

दो बार तख्तापलट सफल हुआ और सैन्य शासन सत्ता में आया. इनमें से एक तख्तापलट के दौरान 1975 में देश के संस्थापक शेख मुजिबुर्रहमान की हत्या हुई. वो देश की वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना के पिता थे. हालांकि इसकी वजह से सरकार को स्वीकार्य तरीके और अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मानकों के आधार पर मुकदमे की कार्रवाई सुनिश्चित करने में विफल रहने के लिए माफ नहीं किया जा सकता.

इसके साथ ही पिछले कुछ महीनों में देश में हुए मानवाधिकार हनन की दूसरी घटनाओं के लिए भी सरकार को माफी नहीं दी जा सकती. उदाहरण के लिए बांग्लादेशी अधिकारियों ने हाल ही में देश के मानवाधिकार संगठन अधिकार के प्रतिनिधियों पर आरोप लगा दिए. यह संगठन मई 2013 के दौरान ढाका में हुए दंगों में सेना की क्रूरता के खिलाफ अभियान चला रहा था. ये आरोप सूचना और संचार तकनीक अधिनियम के तहत कार्यकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए. दो महीने पहले ही यह कानून पास हुआ था. ह्यूमन राइट्स वॉच की दलील है कि "अंतरराष्ट्रीय कानून पुराने मामलों में नए कानून को लागू करने से रोकता है."

अंतरराष्ट्रीय न्यायिक ट्रिब्यूनल ने 2010 में उन लोगों को सजा देने की शुरुआत की जो बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनसंहार और बलात्कार के कथित जिम्मेदार थे. मानवाधिकार संगठनों ने इसकी भी आलोचना की है और यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि कथित अपराध के 40 साल बाद गवाह जुटाना मुश्किल है. इसके साथ ही सरकार विपक्षी बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी और उसकी सहयोगी जमाते इस्लामी के इन आरोपों का जवाब देने में विफल रही कि शेख हसीना बदला लेने और पार्टियों को नुकसान पहुंचाने जैसे निजी कारणों से आरोपियों के पीछे पड़ी हैं.

सरकार देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर भी लगाम लगाने से नहीं चूकी. हालांकि प्रमुख ब्लॉगरों ने अंतरराष्ट्रीय न्यायिक ट्रिब्यूनल के काम और फैसले का समर्थन किया है, क्योंकि इससे देश के इतिहास का एक बदसूरत अध्याय खत्म हुआ. उनके ब्लॉग पर इस्लामी पार्टियों ने भारी विरोध जताया और इनके कारण दंगे भी हुए.

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डॉयचे वेले दक्षिण पूर्व एशिया प्रमुख ग्राहम लुकास

लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों पर आरोप लगाने की बजाए सरकार ने ब्लॉगरों पर निशाना साधा. ढाका हाई कोर्ट ने आने वाले चुनावों में जमाते इस्लामी के हिस्सा लेने पर रोक लगा दी और सार्वजनिक बहस का गला घोंट दिया. अब असल खतरा ये है कि इस्लामी कट्टरपंथियों का गुस्सा आतंकी कार्रवाइयों के जरिए निकल सकता है. जनवरी 2014 के चुनावों और बांग्लादेश में लोकतंत्र के भविष्य के मद्देनजर ये ठीक नहीं है. आने वाले कुछ महीने निश्चित ही मुश्किल साबित होंगे.

समीक्षाः ग्राहम लुकास/एएम

संपादनः ए जमाल

(ग्राहम लुकास डॉयचे वेले दक्षिण पूर्व एशिया विभाग के प्रमुख हैं.)

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