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विज्ञान

बंदरों का टीका इंसानों को

शोधकर्ताओं ने जानलेवा इबोला विषाणु के खिलाफ एक टीका तैयार किया है. ये असल में है तो चिंपाजियों के लिए लेकिन इंसानों पर भी काम आ सकता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इसमें अगर कुछ कमी है तो वह सिर्फ पैसे की है.

ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और अमेरिका के न्यू आईबेरिया रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने चिंपाजियों पर इस टीके का सफल प्रयोग किया है. पीएनएएस जर्नल में शोधकर्ताओं ने लिखा है, "यह सुरक्षित और प्रतिरोध बढ़ाने वाला है." यह टीका चिंपाजियों को इबोला से बचाता है. शोधकर्ता पीटर वॉल्श ने कहा, "अगर कोई मुझे थोड़े पैसे दे दे और फील्ड पर काम करने वाले लोगों की मुझे अनुमति मिल जाए तो मैं जंगली चिंपाजियों और गुरिल्लाओं को टीका लगा दूंगा." इबोला इंसान और चिंपाजी दोनों के लिए जानलेवा है.

बंदरों से गुरिल्ला तक

टीके में एक कोट प्रोटीन होता है जो इबोला वायरस को घेरे रहता है. यह वायरस सक्रिय नहीं होता इसलिए इसका संक्रमण भी नहीं हो सकता. वॉल्श कहते हैं, "इस्तेमाल के पहले से ही हम जानते थे कि वो सुरक्षित है. इसकी टेस्टिंग सिर्फ उन लोगों को दिखाने के लिए की गई जो वैक्सीन से डरते हैं." समस्या सिर्फ इतनी ही है कि सक्रिय वायरस की तरह ये प्रोटीन शरीर में बढ़ते नहीं है इसलिए चिंपाजियों को इसकी भरपूर खुराक देनी पड़ेगी. तब जा कर वह इबोला से बच सकेंगे.

और इंसानों पर इस्तेमाल करने के लिए लाइसेंस चाहिए. और लाइसेंस पाने के लिए लंबी टेस्टिंग जरूरी है. अक्सर बड़ी दवा कंपनियां टेस्ट करवाने के लिए पैसे देते हैं. समस्या और ही कुछ है, वॉल्श कहते हैं, "कोई दवा कंपनी इबोला का टीका बना के मुनाफा नहीं कमा सकती. यह बीमारी तो सिर्फ अफ्रीका के गांवों में फैली हुई है."

फार्मा प्रोजेक्ट के आंकड़ों के मुताबिक कई अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियां इबोला वैक्सीन प्रोजेक्ट चला रही हैं लेकिन वो सभी शुरुआती प्रक्रिया में हैं. वॉल्श के मुताबिक, "अमेरिकी सरकार टीके पर शोध के लिए पैसे देगी. खासकर आतंक के खिलाफ टीके बनाने में. और इबोला जैविक आतंक है. लेकिन सरकार क्लीनिकल ट्रायल के लिए पैसा नहीं देगी क्योंकि वो बहुत खर्चीला है."

कम से कम एक

कम से कम एक टीका ऐसा है जो इंसान के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. आधिकारिक रूप से इसका परीक्षण सिर्फ बंदरों पर किया गया है. लेकिन साबित हुआ है कि ये इंसान को फायदा कर सकता है. 2009 में हैम्बर्ग के बैर्नहार्ड नोख्ट इंस्टीट्यूट में एक रिसचर्र को गलती से इबोला इंफेक्शन वाला टीका चुभ गया. अमेरिका से आया एक टीका उन्हें लगाया गया. टीके का केमिकल का लाइसेंस नहीं था. उसका इस्तेमाल संक्रमित गाय, घोड़ों और सुअरों के लिए किया जाता रहा. इस जीन संवर्धित टीके में इबोला वायरस प्रोटीन का हिस्सा था. लेकिन हैरानी तब हुई जब टीका लगाने के बाद रिसचर्र ठीक हो गईं.

इबोला के टीके का परीक्षण करना आने वाले दिनों में और मुश्किल होने वाला है क्योंकि दुनिया में केवल अमेरिका ही एक ऐसा देश है जहां चिंपाजियों पर टीके की टेस्टिंग की जा सकती है. नए टीके का परीक्षण पकड़े गए चिंपाजियों पर ही किया गया है. अब अमेरिका में भी इस तरह के परीक्षण पर रोक लगाए जाने की तैयारी चल रही है.

उधर सिएरा लियोन में इबोला के कारण पहले व्यक्ति की जान गई है. कैलाहुन के पूर्वी इलाके में पहले मामला दर्ज हुआ. केनामा को हाई रिस्क वाला इलाका घोषित किया गया है. इबोला के कारण कारण आंतरिक और बाहरी रक्तस्राव के साथ ही तेज बुखार आता है. इसके साथ ही उल्टी, दस्त, मांसपेशियों में दर्द और गंभीर मामलों में आतंरिक रक्तस्राव और अंदरूनी अंग काम करना बंद कर सकते हैं.

रिपोर्टः ब्रिगिटे ओस्टेराथ/आभा मोंढे

संपादनः ओंकार सिंह जनौटी