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दुनिया

बंगाल में बदलते चुनावी समीकरण

पश्चिम बंगाल में अबकी विधानसभा चुनावों में समीकरण बदल रहे हैं. कल तक दुश्मन रहे दल अब गले मिल रहे हैं और पिछली बार दोस्त रहे दल आपस में तलवारें भांज रहे हैं.

कांग्रेस ने पिछला विधानसभा चुनाव तृणमूल कांग्रेस के साथ मिल कर लड़ा था. लेकिन अब उसी तृणमूल को सत्ता से बाहर करने के लिए उसने लेफ्टफ्रंट से हाथ मिला लिया है. ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं तो दूसरी ओर, भाजपा को अपना खाता खोलने के लिए किसी चमत्कार की तलाश है.

तृणमूल कांग्रेस 2011 के चुनावों में जीत कर राज्य की सत्ता पर काबिज हुई तो इसकी अकेली सबसे बड़ी वजह ममता की लोकप्रियता थी. उन्होंने अब तक अपनी इस लोकप्रियता को तो बरकरार रखा ही है, सरकार में रहने की वजह से थोक भाव में पूरे राज्य में विकास परियोजनाएं शुरू की हैं. उन्होंने दो रुपए किलो खाद्यान्न सप्लाई की योजना शुरू की है, इसके अलावा छात्रों को स्कॉलरशिप, साइकिलें, स्कूल ड्रेस और जूते बांट रही हैं. बेरोजगारों को आसान शर्तों पर कर्ज भी मुहैया कराये गए हैं. उनकी कन्याश्री योजना को यूनीसेफ ने भी सराहा है.

इसी तरह सबूज साथी योजना के तहत लगभग चालीख लाख छात्र-छात्राओं को साइकिलें दी जा रही हैं. इसी जनवरी में ममता ने खाद्य साथी नामक योजना शुरू की जिसके तहत आठ करोड़ लोगों को दो रुपए किलो की दर पर अनाज मिल रहा है. वह अपनी लोकप्रियता और इन विकास परियोजनाओं के सहारे आसानी से चुनावी वैतरणी पार कर सत्ता में बने रहने के प्रति आश्वस्त हैं.

विपक्ष चाहे जैसी रणनीति बना रहा हो, मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी विकास की नाव पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार करने की त्रिस्तरीय रणनीति पर आगे बढ़ रही हैं. चुनावों से पहले आम लोगों को लुभाने और अपने विकास के एजेंडे को घर-घर तक पहुंचाने के लिए उन्होंने विकास परियोजनाओं की भरमार कर दी है. राज्य की तंग माली हालत के बावजूद ममता बीते छह महीनों के दौरान हजारों करोड़ की परियोजनाओं का ऐलान और शिलान्यास कर चुकी हैं. उन्होंने मुस्लिमों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. इसके साथ ही अपना जनाधार बढ़ाने के लिए वे दूसरे दलों और चुनिंदा हस्तियों को भी साथ ले रही हैं. माकपा के निष्कासित नेता और पूर्व मंत्री अब्दुर रज्जाक मौल्ला, क्रिकेटर लक्ष्मी रतन शुक्ला और जगमोहन डालमिया की पुत्री वैशाली डालमिया को पार्टी में शामिल करना और उनको चुनाव मैदान में उतारना इसी रणनीति का हिस्सा है.

विपक्ष की राह

लेफ्टफ्रंट ने अबकी लंबी ऊहापोह के बाद यहां कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल किया है. इसके तहत फिलहाल उसने कांग्रेस को 75 सीटें दी हैं. लेकिन आगे चल कर कुछ और सीटें उसके लिए छोड़ सकता है. इसके अलावा कुछ सीटों पर दोनों दलों के बीच दोस्ताना मुकाबला होने की संभावना है.

विपक्ष के पास राज्य की बदहाल औद्योगिक स्थिति और शारदा चिटफंड घोटाले के अलावा दूसरा कोई मुद्दा नहीं है. लेकिन बंगाल में औद्योगिक बदहाली का दौर तो तीन दशक पहले ही शुरू हो गया था. राजनीतिक पयर्वेक्षक अमित कुमार जाना कहते हैं, "आम वोटरों पर ममता की परियोजनाओं और लोगों के लिये किए गये कार्यों का खासा असर होगा."

कमजोर भाजपा

दो साल पहले लोकसभा चुनावों में राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर आश्चर्यजनक रूप से उभरी भाजपा को मिले लगभग 17 फीसदी वोटों ने तब राज्य में लेफ्टफ्रंट की लुटिया डुबो दी थी. लेकिन बीते डेढ़- वर्षों के दौरान भाजपा की लोकप्रियता घटी है. पार्टी में 2014 वाले न तो तेवर हैं और न ही वोटरों पर वैसी मजबूत पकड़. शहरी निकाय के चुनावों ने साफ कर दिया है कि पिछली बार जिन दो लोकसभा सीटों यानी आसनसोल और दार्जिलिंग में उसके उम्मीदवार जीते थे, वहां भी उसका ग्राफ तेजी से गिरा है.

वैसे, उसने फिलहाल बंगाल में 52 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की है. पार्टी को यहां अपनी पहचान बनाने के लिए नेताजी का ही सहारा है. जिस नेताजी सुभाष चंद्र बोस की फाइलों को सार्वजनिक करने के लिए ममता बनर्जी ने पहल की थी, बीजेपी ने उसकी काट के लिए नेताजी के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस को ही उनके खिलाफ मैदान में उतार दिया है. बंगाल चुनावों में नेताजी के प्रपौत्र ही बीजेपी का चेहरा होंगे.

अहम हैं अल्पसंख्यक

राज्य में लगभग 29 फीसदी आबादी अल्पसंख्यकों की है और कई चुनाव क्षेत्रों में तो मुस्लिम वोट ही निर्णायक स्थिति में हैं. यही वजह है कि तमाम राजनीतिक पार्टियां अबकी ज्यादा तादाद में ऐसे तबके के उम्मीदवारों को टिकट दे रही हैं. पिछली बार तृणमूल को सत्ता में पहुंचाने में अल्पसंख्यक वोटरों ने अहम भूमिका निभाई थी. और विपक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद पार्टी का यह वोट बैंक अटूट है.

किसी दौर में अल्पसंख्यक तबके ने खुल कर कांग्रेस को समर्थन दिया था. उसके बाद यह वोट बैंक माकपा की झोली में चला गया और इसी के सहारे उसने कोई 34 साल तक बंगाल पर निरंकुश राज किया. उसके बाद ममता ने नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण-विरोधी आंदोलन के दौरान इस हकीकत को समझा कि अल्पसंख्यक वोट बैंक ही उनको सत्ता दिला सकता है और लंबे अरसे तक कुर्सी पर टिकाये रख सकता है.

वैसे, वाम-कांग्रेस गठजोड़ ने ममता की चिंता बढ़ा दी है. यही वजह है कि अपनी चुनावी रैलियों के दौरान वे इसे अनैतिक करार देते हुए लगातार इन दोनों दलों पर हमले कर रही हैं. राजनीतिक पयर्वेक्षकों का कहना है कि इस चुनाव के नतीजे भले चौंकाने वाले नहीं हों, तृणमूल समेत तमाम दलों के लिए यह एक खूनी संघर्ष साबित हो सकता है.

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