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ताना बाना

बंगाल में दिलचस्प होती चुनावी जंग

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों की जंग दिलचस्प हो गई है. तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बैनर्जी ने अपने विचार रखने के लिए और प्रतिद्वंद्वियों का जवाब देने के लिए एक चैनल ही शुरू करने का फैसला किया है.

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पश्चिम बंगाल में इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राज्य से प्रसारित होने वाले बांग्ला टीवी चैनलों की सूची में जल्दी ही मां माटी और मानुष चैनल का नाम भी शामिल हो जाएगा. तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने चुनावों से पहले अपनी बात रखने और सीपीएम के कथित कुप्रचार का जवाब देने के लिए यह चैनल शुरू करने का फैसला किया है.

राज्य में चुनावों के औपचारिक एलान से पहले ही सत्ता के दोनों प्रमुख दावेदारों यानी सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस के बीच चुनावी जंग तेज होने लगी है. चुनावी रैलियों के मामले में तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी और मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य एक-दूसरे को पछाड़ने में लगे हैं. ममता के मां, माटी और मानुष (मां, जमीन और मनुष्य) ' के नारे की काट के तौर पर मुख्यमंत्री ने कृषि, शिल्प और मानुष (खेती, उद्योग और मनुष्य) ' का नारा दिया है.

तृणमूल कांग्रेस की कमान तो पहले की तरह पार्टी प्रमुख और रेल मंत्री ममता बनर्जी के हाथों में है. लेकिन माकपा की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु और पूर्व कामरेड सुभाष चक्रवर्ती जैसे दिग्गजों की गैरमौजूदगी में अबकी कमान संभाली है मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने. इस चुनाव में दोनों दलों और उनके इन नेताओं की साख दांव पर है. इसलिए दोनों नेता तूफानी गति से राज्य के विभिन्न इलाकों का दौरा कर रैलियों को संबोधित कर रहे हैं. इन दोनों में एक-दूसरे को पछाड़ने या उनका कच्चा चिठ्ठा खोलने की होड़-सी मच गई है.

Buddhadev Bhattacharya, Ministerpräsident von Westbengalen (Indien)

तीखी चुनावी जंग

आलम यह है कि अगर बुद्धदेव कहीं किसी रैली को संबोधित करते हैं तो दो-तीन दिनों के भीतर ही ममता भी उसी इलाके में रैली करती हैं. दूसरी ओर बुद्धदेव और उनकी पार्टी भी रैलियों के मामले में इसी तरह ममता का पीछा कर रही है. बुद्धदेव अपनी रैलियों में ममता और उनकी पार्टी पर राज्य के विकास की राह में रोड़े अटकाने, हिंसा फैलाने और माओवादियों से हाथ मिलाने का आरोप दोहरा रहे हैं. उधर, ममता माकपा पर भ्रष्टाचार, किसानों की जमीन जबरन हड़पने और माओवादी गतिविधियों वाले इलाके में हथियारबंद शिविर चलाने के आरोप लगा रही हैं. उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बलों के दुरुपयोग का भी सवाल उठाया है.

ममता ने सिंगूर आंदोलन के दौरान मां, माटी और मानुष (मां, जमीन और मनुष्य)' का नारा दिया था. उनका वह नारा बेहद चर्चित रहा है. उन्होंने उसी नारे पर अब पार्टी के नए टीवी चैनल का नाम रखने का फैसला किया है. ममता कहती हैं, ‘ज्यादातर चैनल सीपीएम के पक्ष में हवा बनाने में जुटे हैं. लेकिन हमारा चैनल सच के साथ ही आम लोगों का नजरिया भी दिखाएगा.'

ममता के इस लोकप्रिय नारे की काट के लिए मुख्यमंत्री ने इस सप्ताह कृषि, शिल्प व मानुष (खेती, उद्योग और मनुष्य)' का नारा दिया है. अब राज्य में होने वाली माकपा की तमाम रैलियों में इसी नारे का इस्तेमाल किया जा रहा है. बुद्धदेव अपनी रैलियों में कह रहे हैं कि खेती ही राज्य का मजबूत आधार रहा है और उसमें हमें काफी कामयाबी मिली है. अब खेती को आधार बनाते हुए राज्य में उद्योगों की स्थापना जरूरी है. वह सवाल करते हैं कि अगर नए उद्योग नहीं लगे तो राज्य के बेरोजगार युवकों को रोजगार कैसे मिलेगा? वह तृणमूल पर उद्योगों की स्थापना की राह में रोड़े अटकाने का आरोप दोहराते हैं.

दूसरी ओर, ममता सफाई देती हैं कि उनकी पार्टी उद्योगों की स्थापना और विकास के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन उद्योगों के लिए किसानों की जमीन का जबरन अधिग्रहण उचित नहीं है. वह अपनी दलील के समर्थन में सैकड़ों ऐसे किसानों का हवाला देती हैं जिनकी जमीन सरकार ने कौड़ियों के मौल ले ली है.

मुख्यमंत्री कहते हैं कि अगर तृणमूल ने आंदोलन नहीं किया होता तो टाटा ने सिंगुर में अपनी लखटकिया कार नैनो की फैक्टरी लगा ली होती और उसमें हजारों युवकों को रोजगार तो मिला ही होता, इलाके की तस्वीर भी बदल जाती. अब मुख्यमंत्री अपनी रैलियों में कबूल कर रहे हैं कि तीन दशक से भी लंबे शासनकाल में वाममोर्चा से भी कुछ गलतियां हुई हैं. वह उन गलतियों को सुधारने की बात कहते हैं. बीते महीने उत्तर 24-परगना जिले में पार्टी की एक रैली में उन्होंने साफ कहा कि अब खुद को राजा और आम लोगों को प्रजा मानने से काम नहीं चलेगा. हमें अपना नजरिया बदलना होगा. उनकी यह टिप्पणी पार्टी के तानाशाह और भ्रष्ट नेताओं को निशाने पर रखते हुए की गई थी.

यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि चुनाव के महीनों पहले शुरू हुआ यह आक्रामक अभियान चुनावों के एलान के बाद और उग्र होगा. जहां तक आम लोगों का सवाल है वह तो इन दोनों को सुन रहे हैं. दोनों की रैलियों में बराबर भीड़ उमड़ रही है.

रिपोर्टः प्रभाकर,कोलकाता

संपादनः आभा एम

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