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विज्ञान

बंकर में बना बीजों का बैंक

एक जमाना था, जब किसान अपनी फसल का एक हिस्सा अगली फसल के लिए बीज के तौर पर अलग रख देते थे आज यह चिंता सताने लगी है कि अगर युद्ध, प्राकृतिक विपदा या जलवायु परिवर्तन के कारण बीज की कोई नस्ल ख़त्म हो जाए, तब क्या होगा.

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ऐसी स्थिति से निपटने के लिए उत्तरी ध्रुव से लगभग 1500 किलोमीटर दूर स्पिट्ज़बैर्गेन नामक आर्कटिक द्वीप पर बर्फ़ के नीचे ज़मीन की गहराई में एक बंकर बनाया गया है, जहां बीजों की पांच लाख से अधिक नस्लों को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा गया है. इस द्वीप पर लॉंगइयरबायेन के निकट की पहाड़ी में यह भंडार बनाया गया है, आर्कटिक सागर से 1300 मीटर की उंचाई पर.

सन 2008 में यहां बीज रखने का काम शुरू किया गया. नार्वे की सरकार और ग्लोबल क्रॉप डाइवर्सिटी ट्रस्ट नामक संस्था की ओर से संयुक्त रूप से इसे चलाया जाता है. यहां काम शुरू होने के एक साल बाद ही पर्माफ़्रॉस्ट यानी चिरतुषार के पिघलने से बंकर के दरवाज़े को नुकसान पहुंचा था, इस बीच उसकी मरम्मत का काम चल रहा है.

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फ़िलहाल वहां दो दरवाज़े लगाए गए हैं. पहले दरवाज़े से घुसकर उसे बंद कर दिया जाता है, फिर लगभग सौ मीटर लंबी सुरंग के बाद दूसरा दरवाज़ा खोला जाता है. यहां जाने के लिए शरीर को गरम रखने वाला थर्मो सूट पहनना पड़ता है, तापमान शू्न्य से काफ़ी नीचे होता है. दीवारों पर बर्फ़ जमी रहती है. इस दूसरे या मुख्य दरवाज़े के पीछे बीजों का भंडार है.

बीजों के भंडार को एक विशाल डीप फ़्रीज़र कहा जा सकता है. यहां बाहर से कोई गर्मी नहीं आने दी जाती. इसके पहले कक्ष में आर्कटिक क्षेत्र की तुलना में तापमान कुछ अधिक है, शून्य से 5-6 डिग्री नीचे, जो पर्माफ़्रॉस्ट का स्वाभाविक तापमान है. जब अंदर का मुख्य हॉल भर जाएगा, तब यहां भी बीज रखे जाएंगे. लेकिन कुछ एक रैकों में अभी से बीजों के बोरे दिख रहे हैं.

स्वीडन के कृषि विश्वविद्यालय में प्लांट जेनेटिक्स के प्रोफ़ेसर रोलांड फ़ॉन बोथमर इनके बारे में कहते हैं, “

यहां इस वक्त डेनमार्क और नई दिल्ली से लाए गए बीजों के नमूने हैं, जिन्हें वैक्यूम पैक किया गया है. उन्हें सुखाकर नमी की मात्रा 5-6 प्रतिशत से नीचे लाई गई है. इन्हें काले बक्से में भरकर यहां लाया गया है. यहां उनकी रजिस्ट्री होती है, और फिर मुख्य हॉल में उन्हें रखा जाता है .

अंदर के मुख्य हॉल में तापमान शून्य से 17 डिग्री नीचे है, जहां बीजों को स्थाई रूप से रखा जाता है. इंटरनेट पर इन बीजों के बारे में सारी जानकारी मिल सकती है. इसे बीजों का बैंक कहा जा सकता है. बीज भेजने वाले उसके मालिक बने रहते हैं. इस बीच विभिन्न देशों में इसी तरह के बीज बैंक बन चुके हैं. लेकिन स्पिट्ज़बैगेन के इस भंडार को उनके डुप्लिकेट का एक सुरक्षित भंडार कहा जा सकता है. इस सिलसिले में प्रोफ़ेसर रोलांड फ़ॉन बोथमर कहते हैं -

“महत्वपूर्ण बात यह है कि डुप्लिकेट के रूप में इन्हें सुरक्षित रखा जाए, ताकि असली बीज नष्ट हो जाने पर उनके मालिकों को इन्हें लौटाया जा सके. सारी दुनिया में इस सिलसिले में समस्याएं हो सकती है. हैती के भूकंप के बारे में सोचिए, या कहीं भूस्खलन हो सकता है, गृहयुद्ध में भी बीजों के नमूने नष्ट हो सकते हैं.”

प्रोफ़ेसर बोथमर की राय में ऐसी विपदाओं के बिना भी बीजों की नस्लें ख़त्म हो सकती हैं. वे कहते हैं, “ दस हज़ार साल से प्राकृतिक चयन की एक इंसानी प्रक्रिया जारी है. हर जगह बीजों की ऐसी नई नस्लें विकसित हो रही है, जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हो. जब किसान आधुनिक ढंग से खेती करना चाहते हैं, तो बीजों की परंपरागत नस्लें अक्सर धीरे-धीरे ख़त्म हो जाती हैं.

जलवायु परिवर्तन के कारण भी यह आवश्यक हो गया है, कि बीजों की नस्लों की बहुतायत बनाए रखी जाए. यह बीज बैंक इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/उ भ

संपादन: एस गौड़

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