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दुनिया

फ्रांस ने नया मंत्रिमंडल पेश किया

फ्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोजी ने फ्रांस्वां फिलों को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी फिर सौंप दी है. मंत्रिमंडल में बदलाव के जरिए सार्कोजी 2012 में राष्ट्रपति चुनावों से पहले पार्टी की छवि बेहतर करना चाहते हैं.

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वापस आए प्रधानमंत्री फिलों

वित्त मंत्री क्रिस्टीन लागार्द, बजट मंत्री फ्रांस्वा बारों और आंतरिक मामलों के मंत्री ब्रीस ओर्तेफह को नहीं बदला गया है. बारों को बजट मंत्रालय के अलावा सरकारी प्रवक्ता की भी जिम्मेदारी दे दी गई है. रक्षा मंत्री एर्व मोरें और विदेश मंत्री बेर्नार कूशनेर की जगह आलें जुप और मिशेल आलियो-मारी ने ली है. पार्टी को पैसा देने के आरोप में फंसे श्रम मंत्री एरिक वोर्त को भी मंत्रिमंडल से हटा दिया गया है.

सार्कोजी की मध्य-दक्षिणपंथी यूएमपी पार्टी के मंत्रियों को मंत्रिमंडल में मुख्य जिम्मेदारियां दी गई हैं औऱ इस वजह से सरकार की नीति में ज्यादा बदलाव आने की संभावना नहीं है.

Präsident Nicolas Sarkozy und Premierminister Francois Fillon NO FLASH

क्या टीम अच्छी साबित होगी?

प्रधानमंत्री फिलों ने एक बयान में कहा कि वे अर्थव्यवस्था और नौकरियां पैदा करने पर ध्यान देंगे. उन्होंने कहा कि वे एक नए दौर की शुरुआत करना चाहते हैं जिससे देश में आर्थिक विकास होगा और फ्रांस के नागरिकों के लिए सुरक्षा पैदा की जा सकेगी. फिलों के बारे में माना जाता है कि वे राष्ट्रीय नीतियों को संभालने में ज्यादा अच्छे हैं जबकि सार्कोजी विश्व मुद्रा सुधार में ध्यान दे रहे हैं.

विपक्षी सोशियलिस्ट पार्टी की प्रमुख मार्तीन औब्री ने एक बयान में कहा कि राष्ट्रपति यह नहीं समझ पा रहे हैं कि नागरिकों को राजनीतिक बदलाव चाहिए. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति उसी प्रधानमंत्री को वापस लाकर वहीं नीतियां आगे बढ़ा रहे हैं.

सार्कोजी ने छह महीने पहले मंत्रिमंडल में बदलाव लाने की बात कही थी. औब्री ने कहा कि मंत्री लोगों से ज्यादा अपने पद को सुरक्षित करने में ध्यान दे रहे हैं. सार्कोजी हाल ही में जी20 देशों के शिखर सम्मेलन से वापस लौटे हैं. देश में पेंशन सुधार को लेकर उन्होंने नागरिकों से लड़ाई तो जीत ली है लेकिन उनकी लोकप्रियता में भारी कमी आई है.

एक जनमत सर्वेक्षण के मुताबिक जहां प्रधानमंत्री फिलों के पक्ष में 40 प्रतिशत लोग हैं, वहीं 30 प्रतिशत से कम लोग सार्कोजी का साथ दे रहे हैं. सार्कोजी नए मंत्रीमंडल के जरिए अपने वोटरों के समर्थन को सुरक्षित करना चाह रहे हैं और आर्थिक मंदी के दौर में लोगों से समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. मंत्रिमंडल के लिए उनके चुनिंदा नेता शायद रूढीवादियों को खुश करें, लेकिन मध्यवादी पार्टियों के नेता उनका साथ छोड़ सकते हैं और 2012 के चुनावों में उन्हीं के खिलाफ खड़े हो सकते हैं.

रिपोर्टः एजेंसियां/एमजी

संपादनः एस गौड़

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