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दुनिया

फ्रांस के राष्ट्रपति ने 100 दिन में क्या किया?

फ्रांस के राष्ट्रपति ने सत्ता में सौ दिन पूरे कर लिए हैं और ओपिनियन पोल में उन्हें निराश करने वाला बताया जा रहा है. लेकिन वो इरादों पर अटल हैं और उनकी पार्टी उनके साथ है. मतलब कि उनके सुधारों का कार्यक्रम जारी रहेगा.

सोमवार को फ्रेंच राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों को सत्ता में आने के 100 दिन पूरे हो गये हैं. इसी साल सात मई को राष्ट्रपति का चुनाव जीतने के बाद जब समर्थकों का अभिवादन स्वीकार करने वो लूव्रे के अहाते में आए तो उन्हें अंदाजा रहा होगा कि फ्रांस की सत्ता संभालना कितनी बड़ी चुनौती है. इतने दिनों में ही उनकी लोकप्रियता कम हुई है. इसी महीने की शुरूआत में रुढ़िवादी अखबार ले फिगारो के लिए आईएफओपी के किए एक सर्वे के नतीजे बताते हैं कि केवल 36 फीसदी लोगों ने ही सर्वे में माक्रों के काम से संतु्ष्टि जतायी है. तो क्या फ्रांस में अब तक के सबसे युवा राष्ट्रपति के लिए चीजें खराब हुई हैं? आखिरकार मई में राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर में उन्हें 66 फीसदी वोट मिले थे जबकि उनके विरोधी धुर दक्षिणपंथी उम्मीदवार मरीन ले पेन को सिर्फ 34 फीसदी.

उससे पहले अक्टूबर में जब उन्हें बाहरी उम्मीदवार बताया जा रहा था तब उन्होंने चैलेंज पत्रिका से कहा था कि वो अपने अलोकप्रिय पूर्ववर्ती फ्रांसोआ ओलांद की तरह "सामान्य राष्ट्रपति" नहीं बनना चाहते. माक्रों ने कहा था कि ओलांद ने राष्ट्रपति के रूप में उनके "महत्वाकांक्षी" तौर तरीकों को खारिज कर दिया था. माक्रों का कहना था कि फ्रांस को ऐसे राष्ट्रपति की जरूरत है जो "हरेक चीज का स्रोत हुए बगैर समाज का नेतृत्व ताकत, प्रतिबद्धता और अपने कामों से करे और वह क्या करता है उसका साफ मतलब दे." माक्रों ने जब रुढ़िवादी प्रधानमंत्री एदुआर्द फिलिपे के नेतृत्व वाली पहली सरकार का गठन किया तो उस पर अपनी प्रभुसत्ता कायम करने में जरा भी देर नहीं लगाई.

सरकार के प्रवक्ता क्रिस्टोफ कास्टनर कहते हैं कि फ्रांस के पास "ऐसा राष्ट्रपति था जिसने समीक्षक की बजाय अभिनेता बनने का फैसला किया." अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माक्रों का पहला महीना विजेता के रूप में था जब उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को पेरिस जलवायु समझौते से बाहर होने के लिए ललकारा और उसके बाद उनके पेरिस दौरे पर थोड़े दोस्ताना माहौल में उनकी मेजबानी भी की. हालांकि शायद ज्यादा अहम ये है कि प्रतिबद्ध यूरोपियन के रूप में उन्होंने जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल के साथ रिश्ता मजबूत किया.

माक्रों के "महत्वाकांक्षी" प्रतीक शुरू से ही उनके साथ चल रहे हैं. पहली बार शाँसेलिसी तक आने के लिए उन्होंने सेना की कार का इस्तेमाल किया लेकिन उनके कामों से सबसे पहला झटका भी सेना को ही लगा. जब ऑडिट रिपोर्ट से ये बता चला कि देश का बजट कटौतियों के अपने लक्ष्य से बहुत पीछे है तो बिना देरी किए सेना के बजट में सबसे बड़ी कटौती का आदेश दे दिया. ये कटौती करीब एक अरब डॉलर की थी. सेना प्रमुख ने इसका विरोध किया तो सालाना बास्टिले डे की परेड के दौरान उन्हें सैनिकों के सामने ही खरी खरी सुना दी. इसके बाद सेना प्रमुख ने तुरंत ही इस्तीफा देकर आलोचना करने वालों को रास्ता दिखा दिया. सेना के पूर्व जनरल विंसेंट डेस्पोर्ट्रस ने ले मोंद अखबार में लिखा कि एक "कच्ची उम्र की तानाशाही" ने सेना के साथ "भरोसे की जोड़ को तोड़ दिया." माक्रों के लिए पहले ही महीने में ये बड़ा झटका था.

जून के संसदीय चुनाव के बाद जब माक्रों ने अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल किया तो उन्हें चार मंत्रियों को हटाना पड़ा क्योंकि वो न्यायिक जांचों में प्रमुख रूप से शामिल थे. माक्रों की मध्यमार्गी ले रिपब्लिक एन मार्श और उसके सहयोगी दलों ने चुनावों में भारी जीत हासिल की. इन्हें 577 में से 350 सीटें मिली थीं इसके बाद भी अनुभव की कमी समय समय पर सामने आती रही है.

आवास की सुविधा में हर महीने पांच यूरो की कटौती को लेकर उन्हें वामपंथी दलों से काफी आलोचना मिली है. माक्रों के बारे में यह राय बनी है कि दक्षिण और वाम के विभाजन को लगातार गुजरे जमाने की चीज बताने वाले माक्रों मुख्य रूप से दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों को लागू कर रहे हैं. हालांकि फिलिपे की सरकार ने पहली बार महत्वाकांक्षी वैधानिक कार्यक्रम के लिए दबाव बनाने में सफलता हासिल की है. राजनीतिक आचार को लेकर एक कानून को सीनेट ने पास कर दिया है और नागरिक अधिकार संगठन के विरोध के बावजूद एक नए आतंकवाद विरोधी कानून को मंजूरी दे दी गई है. संसद ने माक्रों के पहले आर्थिक कानून को भी मंजूरी दे दी है जिसके बाद सरकार के पास ये अधिकार आ गया है कि वह लेबर कोड को अपने आदेश के जरिये बदल सकती है. ज्यादा हैरान करने वाली बात ये है कि श्रम मंत्री मुरियल पेनकॉड अब तक ज्यादातर ट्रेड यूनियनों को सुधारों के मसले पर बातचीत की टेबल पर रख पाने में कामयाब हुए हैं. हालांकि कट्टर माने जाने वाले सीजीटी ने 12 सितंबर को हड़ताल बुलाई है.

इन सबके बीच सबसे अहम ये है कि ले रिपब्लिक एन मार्श राष्ट्रीय संसद में अनुशासित हो गई है. सरकार के प्रस्तावों पर उसके लगातार समर्थन को उसके विरोधी बगैर सोचा समझा आज्ञापालन कह रहे हैं है लेकिन एजेंडों से भरे राष्ट्रपति के लिए यह वरदान जैसा है.

राष्ट्रपति की असली परीक्षा होगी गर्मियों की छुट्टी के बाद. श्रम कानूनों में सुधार का मसला माक्रों की पहली बड़ी परीक्षा होगी जो पतझड़ के मौसम में सामने आएगा. हालांकि माक्रों की अपनी प्रतिबद्धता कायम है और एक ठोस और अनुशासित संसदीय बहुमत के साथ अगर ट्रेड यूनियनों के विरोध को शांत कर लेते है तो वो कम से कम अपने सुधारों को लागू कराने में सफल होंगे और उसी के आधार पर उन्हें परखा जाना चाहिए.

एनआर/एमजे (डीपीए)

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