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विज्ञान

फेंके उपकरण बने भारतीयों की जिंदगी

अमेरिका में दिल के मरीजों को बचाने के लिए जो उपकरण इस्तेमाल किए जाते हैं उन्हें इन्फेक्शन या किसी और वजह से अगर निकालना पड़े तो वे निकालकर भारत भेज दिए जाते हैं. ये उपकरण भारत में कई लोगों की जिंदगियां बचा रहे हैं.

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फिलाडेल्फिया के एक हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. बेहजाद पावरी बताते हैं कि इन बेशकीमती उपकरणों को फेंकने के बजाय दोबारा संक्रमण रहित करके भारत भेज दिया जाता है. वहां वे उन मरीजों के काम आ जाते हैं जो नए महंगे उपकरण नहीं खरीद सकते. पावरी बताते हैं कि ये ऐसे मरीज हैं जिन्हें अन्य किसी तरीके से उपकरण नहीं मिल सकते.

अमेरिकन हार्ट असोसिएशन की सालाना बैठक में डॉ. पावरी ने बताया कि उन्हें भारत से धन्यवाद के ढेरों खत आ चुके हैं जबकि मैं जो चीजें भेज रहा हूं वे असल में कूड़ा हैं. कार्डियोवर्टर डिफिब्रिलेटर्स या आईसीडी नाम के इन उपकरणों की कीमत 35 हजार डॉलर यानी करीब 16 लाख रुपये तक हो सकती है. अमेरिका में हर साल ढाई से तीन लाख आईसीडी लगाए जाते हैं. बैटरी से चलने वाले स्टॉप वॉच के आकार के ये उपकरण आमतौर पर सीने में पांच से आठ साल तक ठीकठाक काम करते हैं. लेकिन कई बार इन्हें वक्त से पहले भी निकालना पड़ता है. ऐसा तब होता है जब मरीज को किसी तरह का इन्फेक्शन हो जाए या फिर उसे उसकी सेहत की स्थिति के मुताबिक एक बेहतर आईसीडी की जरूरत महसूस होने लगे.

भारतीय मूल के डॉ. पावरी अब तक सैकड़ों ऐसे उपकरण भारतीय मरीजों के लिए भेज चुके हैं. 15 साल से इस काम में जुटे डॉ. पावरी बताते हैं कि वह सिर्फ उन्हीं उपकरणों को भारत भेजते हैं जिनकी उम्र तीन साल से ज्यादा हो. अब तो उनके जो साथी इस बात को जान गए हैं वे भी अपने मरीजों के सीने से निकाले उपकरण उन्हें दे देते हैं. उनके मरीज भी उन्हें ये उपकरण खुशी खुशी दे देते हैं. एक मरीज के बारे में याद करते हुए वह कहते हैं, "एक बार एक मरीज ने मुझसे कहा कि वह इस उपकरण को पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करना चाहता था लेकिन बेहतर यही है कि यह किसी और की जान बचा सके."

रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार

संपादनः एन रंजन

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