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खेल

फुटबॉल मैदान पर हिंसा को रोकने के कदम तय

फुटबॉल के मैदान पर हिंसा बढ़ जाए तो जिम्मेदारी किसकी है? सबसे पहले फुटबॉल क्लबों की. जर्मनी के 36 पेशेवर क्लबों ने एक सुरक्षा अवधारणा तय की है, जो खेल मैदानों को हिंसा से दूर रखेगा.

जर्मनी में फुटबॉल का वही दर्जा है जो भारत में क्रिकेट का है. फुटबॉल धर्म है और खिलाड़ी देवता, जो अगर अच्छा प्रदर्शन न करें तो भक्त नाराज भी हो जाता है. जर्मनी के फुटबॉल लीग मैच साल में 34 हफ्ते होते हैं. पिछले हफ्तों में मैचों के दौरान या बाद में हिंसा की घटनाएं हुई हैं. पेशेवर क्लबों पर कुछ करने का सरकार की ओर से भी भारी दबाव था, नहीं तो सरकार अपनी ओर से फैसले करने की धमकी दे रही थी.

अब लीग के अधिकारियों के सम्मेलन में बहुमत से नई सुरक्षा अवधारणा को पास कर दिया गया है. बायर्न म्यूनिख के प्रमुख कार्ल-हाइन्स रुमेनिगे ने बताया, "हम अपने फैंस से दूर नहीं हुए हैं, ऐसा लगता है कि हमारे बीच संवाद में कुछ गलत हो गया है." बंद बैठक में क्लबों के प्रतिनिधियों ने हिंसा को रोकने के कदम तय किए जो फैंस के प्रतिनिधियों में विवादित है.

जर्मन फुटबॉल लीग ने 16 विवादास्पद सुरक्षा प्रस्तावों को भारी बहुमत से पास कर दिया. डीएफएल के अध्यक्ष राइनहार्ड राउबाल ने कहा कि पांच क्लबों की आपत्तियों और फैसला टालने की मांग को ठुकरा दिया गया. उन्होंने कहा कि प्रस्तावों पर गरमागरम बहस के बावजूद फैसले से पेशेवर फुटबॉल की जीत हुई है.

जर्मनी की केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के गृह मंत्रियों ने जर्मन फुटबॉल लीग और जर्मन फुटबॉल संघ के अलावा क्लबों से मांग की थी कि वे हिंसा को रोकने के कदम उठाएं. भारी ठंड के बावजूद सैकड़ों फैंस क्लबों के सम्मेलन स्थल के बाहर इकट्ठा हुए थे. सम्मेलन सार्वजनिक नहीं था और पुलिस ने सुरक्षा के लिए सम्मेलन स्थल की नाकेबंदी कर रखी थी. फैंस ने पिछले तीन खेलों के दौरान 12 मिनट और 12 सेकंड का मौन रखकर क्लबों द्वारा उठाए जा रहे कदमों का विरोध किया था.

एमजे/एमजी (डीपीए)

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