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मनोरंजन

फिल्म उद्योग का महिलाओं से भेदभाव

संयुक्त राष्ट्र का एक सर्वे इस नतीजे पर पहुंचा है. इसमें कहा गया है कि फिल्मों में महिलाओं को अक्सर उनके पुरुष साथियों की तुलना में अलग तरह की भूमिका दी जाती है. स्टडी के अनुसार यह अंतर नग्न दृश्यों में भी दिखता है.

Filmstills MÄNNER ZEIGEN FILME & FRAUEN IHRE BRÜSTE

फिल्म "मर्द फिल्म दिखाते हैं, महिलाएं स्तन" का दृश्य

हाल ही में जर्मनी में आई इजाबेल सूबा की एक फिल्म का नाम है, "मर्द फिल्म दिखाते हैं, महिलाएं स्तन." यह फिल्म फिल्म उद्योग में व्याप्त सेक्सिज्म की कहानी कहती है. सूबा की फिल्म का टाइटल न्यूयॉर्क में जारी संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन से मिलता जुलता है.

मर्द डॉक्टर तो महिला नग्न

इस अध्ययन के अनुसार फिल्मों में सिर्फ एक तिहाई अहम भूमिकाएं महिलाओं की होती हैं. फिल्मों के उच्च प्रशिक्षित किरदारों पर नजर डालना भी अहम है. इससे पता चलता है कि डॉक्टर, प्रोफेसर या वकील जैसे किरदार शायद ही महिलाओं को दिए जाते हैं. इसके विपरीत पुरुषों के मुकाबले लड़कियों और महिलाओं को दोगुना नग्न दिखाया जाता है. इन दृश्यों के जरिए समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों को और मजबूत बनाया जाता है.

संयुक्त राष्ट्र के लिए यह अध्ययन साउथ कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ने किया है. इस अध्ययन के लिए रिसर्चरों ने कई देशों में हुए सर्वे के नतीजों का सहारा लिया है. इनमें भारत, जर्मनी, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, चीन और जापान शामिल हैं. संयुक्त राष्ट्र ने इन अध्ययनों की पहल की थी. उसका इरादा समानता के संघर्ष में मीडिया की अहम भूमिका की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित कराना था.

मर्दवादी नजरिया

जर्मनी में संयुक्त राष्ट्र के इस अध्ययन पर पहली प्रतिक्रिया हुई है. डॉर्टमुंड और कोलोन में होने वाले अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के अधिकारियों ने इस अध्ययन का स्वागत किया है और कहा है कि जर्मनी में फिल्म उद्योग में महिलाओं के साथ इस तरह का भेदभाव होता है. यह सिर्फ भूमिकाओं के बंटवारे पर ही लागू नहीं होता बल्कि फिल्म और टेलिविजन प्रोडक्शनों में जिम्मेदार पदों के बंटवारे में भी नजर आता है.

डॉर्टमुंड और कोलोन का फिल्म महोत्सव दुनिया के अहम फिल्म महोत्सवों में शामिल है जिसमें महिला फिल्मकारों की फिल्में दिखाई जाती हैं. यह हर साल आयोजित होता है. महोत्सव अधिकारियों का कहना है कि निर्देशन और कैमरामैन जैसे कामों में महिलाएं कम दिखती हैं. इसका असर यह होता है कि मुद्दों पर कुछ खास नजरिया फिल्मों में नहीं दिखाया जाता.

एमजे/ओएसजे (डीपीए, डीडब्ल्यू)

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