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ब्लॉग

फिल्मों की आड़ में अभिव्यक्ति पर हमला

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों के कार्यकर्ताओं ने देश भर में अनेक स्थानों पर हमले करके आमिर खान की फिल्म 'पीके' का प्रदर्शन रुकवा दिया है. एक बार फिर अभिव्यक्ति की आजादी के लिए खतरे सामने आए हैं.

गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे बीजेपी-शासित राज्यों में इन हमलों और विरोध प्रदर्शनों की तीव्रता कहीं अधिक है. विरोध करने वालों का आरोप है कि इस फिल्म में हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया गया है, इसलिए इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए. उधर सेंसर बोर्ड का कहना है कि उसने सोच-समझ कर ही इस फिल्म को दिखाए जाने की अनुमति दी है, इसलिए फिल्म में किसी भी प्रकार का फेर-बदल नहीं किया जाएगा. जहां तक प्रतिबंध का सवाल है, तो यह तय करना सरकार का काम है.

दिलचस्प बात यह है कि वरिष्ठतम भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी इस फिल्म को देखकर काफी पसंद कर चुके हैं. उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी इस पसंदगी को जाहिर भी किया है. यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास की सफलतम फिल्म साबित हो सकती है. वर्ष 2014 की सफलतम फिल्म 'किक' ने अब तक 233 करोड़ रुपये कमाए हैं. 'पीके' की कामयाबी का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने रिलीज होने के दो सप्ताह के भीतर ही इस आंकड़े को छू लिया. स्पष्ट है कि फिल्म को दर्शकों की बहुत बड़ी संख्या ने बेहद पसंद किया है. इनमें जाहिर है कि अधिक तादाद हिन्दुओं की ही रही होगी क्योंकि देश में वे बहुसंख्यक हैं. इन हिन्दू दर्शकों को फिल्म पर कोई ऐतराज नहीं है. लेकिन हिन्दुत्ववादी विश्व हिन्दू परिषद और उसके उग्र युवा संगठन बजरंग दल को है. ये संगठन पहले भी अनेक बार पेंटिंग प्रदर्शनी, नाटक और फिल्म आदि पर हमले कर चुके हैं.

संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है. यह सही है कि यह अधिकार असीमित नहीं है और किसी को भी किसी धर्म, समुदाय, क्षेत्र या व्यक्ति के खिलाफ नफरत फैलाने की इजाजत नहीं दी जा सकती. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंदिश लगाना सरकार का काम है, किसी संगठन को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता. लेकिन भारत में पिछले कुछ दशकों से जिस तरह का माहौल बना है, उसमें राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक कहे जाने वाले संगठनों को यह अधिकार अनौपचारिक रूप से सौंपा जाने लगा है.

हिंदुत्ववादी संगठन ही इस तरह का विरोध करते हों, ऐसा भी नहीं है. मुस्लिम, ईसाई, सिख और जैन समुदायों की ओर से भी इस प्रकार के विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं और किसी-न-किसी किताब, नाटक, पत्रिका या फिल्म पर रोक लगाने की मांग उठती रहती है. 1980 के दशक में जब गोविंद निहलाणी ने भीष्म साहनी के उपन्यास 'तमस' पर इसी नाम का टीवी धारावाहिक बनाया था, तो उसका प्रसारण शुरू होने के बाद भी इसी तरह के विरोध प्रदर्शन हुए थे और उसे बंद किए जाने की मांग की गई थी. उस समय भाजपा का उभार होना शुरू ही हुआ था जबकि आज तो उसकी केंद्र में और कई राज्यों में सरकारें हैं. उस समय निहलाणी ने वरिष्ठ भाजपा नेता केवल रतन मलकानी को अपना धारावाहिक दिखाकर उनसे मंजूरी ली थी. ऐसा करके उन्होंने एक तरह से सामाजिक-राजनीतिक संगठनों के समांतर सेंसर बोर्ड होने की हकीकत को स्वीकार कर लिया था.

क्या यह सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं कि जिस फिल्म को उसके द्वारा स्थापित सेंसर बोर्ड ने ठीक मानकर प्रदर्शन की अनुमति दी है, वह उसे शांतिपूर्ण वातावरण में दिखाए जाने को सुनिश्चित करे? क्या अभिव्यक्ति की आजादी का कोई अर्थ नहीं? क्या सरकारों का दायित्व नहीं कि वे कलाकारों की रचनाशीलता को खुलकर अभिव्यक्त होने के लिए उचित महौल मुहैया कराएं? किसी फिल्म को देखकर नाराज होना और उसे नापसंद करना हरेक का अधिकार है. लेकिन अपने आक्रोश की हिंसक अभिव्यक्ति करने का किसी को भी अधिकार नहीं है.

'पीके' को मिल रही असाधारण सफलता इस बात का प्रमाण है कि उसे जनता पसंद कर रही है और पसंद करने वालों में हर धर्म के लोग शामिल है. हिन्दू धर्म के स्वयंभू प्रवक्ताओं को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वे समांतर सेंसर बोर्ड की तरह काम करें. सरकार को भी ध्यान में रखना होगा कि एक धर्म की कट्टरता के सामने झुकने के बाद उसे हर धर्म की कट्टरता के सामने झुकना पड़ेगा. किसी लोकतंत्र में इसकी इजाजत नहीं होनी चाहिए.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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