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विज्ञान

फिर होगी बर्ड फ्लू पर रिसर्च

रिसर्च की तो खतरा, नहीं की तो और भी बड़ा खतरा. बर्ड फ्लू के वायरस के रिसर्च पर एक साल पहले रोक दी गई, लेकिन अब इसे फिर से शुरू करने का फैसला किया गया है. लेकिन भला क्या हैं इससे जुड़े खतरे.

पिछले साल रिसर्च के आधार पर अमेरिका ने आशंका जताई कि एच5एन1 वाइरस के म्यूटेशन से और भी खतरनाक वाइरस बन सकते हैं. डर बना कि अगर आतंकवादियों के हाथ ये वायरस लग गया तो जैवआतंकवाद का खतरा हो सकता है. वाइरस के गलत इस्तेमाल के डर से रिसर्च रोक दी गई थी. साल भर बाद फ्लू पर काम कर रहे विशेषज्ञों का कहना है कि उन्होंने इन खतरों को भांप लिया है और आगे इस दिशा में सतर्कता से काम करने का फैसला किया गया है.

वैज्ञानिकों का मानना है एच5एन1 बर्ड फ्लू वाइरस पर रिसर्च करने से जो खतरे हो सकते हैं, उनकी तुलना में शोध करने के फायदे ज्यादा है. हालांकि यह रिसर्च सिर्फ उन देशों में आगे बढ़ाई जाएगी जो इसको आगे बढ़ाने में सहमति रखते हैं जिनमें नीदरलैंड्स भी शामिल है. अमेरिका में या उन लैबों में जो अमेरिकी आर्थिक मदद पर निर्भर हैं, रिसर्च आगे बढ़ाने के लिए वॉशिंगटन सहमति की जरूरत होगी. विज्ञान की पत्रिकाओं नेचर और साइंस में छपे अमेरिका, चीन, जापान, ब्रिटेन, नीदरलैंड, हॉन्ग कॉन्ग और जर्मनी के वैज्ञानिकों के एक पत्र में कहा गया है, "किसी भी दूसरी रिसर्च की तरह इस रिसर्च में भी कुछ खतरे हैं लेकिन इस शोध को न करने के खतरे और भी बड़े हो सकते हैं और हमें महामारी का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए इसे आगे बढ़ाना ही अच्छा होगा."

प्राकृतिक म्यूटेशन का खतरा

म्यूटेशन किसी जीव की डीएनए संरचना में होने वाले उस परिवर्तन को कहते हैं जिससे जीव के गुण और व्यवहार में कई परिवर्तन आते हैं. म्यूटेशन आमतौर पर जीव को और ताकतवर बनाते हैं. प्रकृति में भी म्यूटेशन की प्रक्रिया लगातार होती रहती है, ऐसे में वैज्ञानिकों को यह डर भी सता रहा है कि अगर इस वाइरस का प्राकृतिक म्यूटेशन हो गया तो यह बहुत बड़ा संकट होगा.

फिलहाल बर्ड फ्लू पक्षियों से पक्षियों में और उनसे इंसान में फैल सकता है. लेकिन एक इंसान से दूसरे इंसान में यह वाइरस सीधा नहीं फैलता है. यदि एच5एन1 वाइरस का म्यूटेंट यानि परिवर्तित वाइरस अगर इंसान में फैला तो हो सकता है कि आगे यह इंसानों के लिए संक्रामक बीमारी बन जाए. म्यूटेंट वाइरस से होने वाले खतरे को भांपने के बाद इस रिसर्च की शुरुआत में ही 2011 में अमेरिका की राष्ट्रीय साइंस सलाहकार बोर्ड ने शोध से जुड़ी जानकारी पर पाबंदी लगा दी थी. बोर्ड चाहता था कि जानकारी गलत हाथों में न पहुंचे. इस सेंसरशिप पर इसके बाद ये विवाद भी उठा कि रिसर्च के नाम पर इस संक्रामक वाइरस पर काम किस हद तक जारी रखा जा सकता है जिससे कि मानव जाति को खतरा न हो.

Elektronenmikroskopische Aufnahme H5N1 Virus

वायरस के म्यूटेशन का खतरा

रिसर्च रोके जाने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मांग की कि वैज्ञानिक इस बात की पूरी जानकारी दें कि वे शोध में सावधानी बरतने के लिए क्या कदम उठाएंगे. डब्ल्यूएचओ ने यह भी पूछा कि इस रिसर्च को आगे बढ़ाना क्यों जरूरी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के कोलैबरेटिंग सेंटर फॉर फ्लू के अध्यक्ष जॉन मैक कॉली कहते हैं, "मुझे लगता है इस रिसर्च की अहमियत अब तक समझी जा चुकी है और सुरक्षा संबंधी सभी संभव कदम उठाए जा रहे हैं."

नीदरलैंड्स की रॉटेडैम लैब में काम कर रहे वैज्ञानिक रॉन फोउशियर ने बताया कि अगले कुछ हफ्तों में रिसर्च फिर शुरू हो जाएगी.

रिसर्च न करना ज्यादा बड़ा खतरा

टोक्यो विश्विद्यालय में पक्षियों पर रिसर्च कर रहे योशिहिरो कावाउका कहते हैं, "हम चाहते हैं कि एच5एन1 वाइरस से होने वाली महामारी के खतरों से निबटने के लिए हम पहले से तैयार हों. जितना हम अभी तैयार हैं उससे कहीं ज्यादा." उन्होंने बताया कि रिसर्च आगे बढ़ाने में वे परिणाम की संवेदनशीलता को समझते हुए पूरी सतर्कता बरत रहे हैं. कावाइका के अनुसार इस रिसर्च की मदद से 'बायोसर्वेलेंस' का सिस्टम तैयार किया जा सकता है जिससे इसके फैलने से पहले ही हम आगाह हो सकते हैं. दवाओं और टीकों की मदद से इसे रोकने के तरीकों पर काम होने की तैयारी है.

लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में वाइरोलॉजी की विशेषज्ञ वेंडी बार्क्ले मानती हैं कि एच5एन1 की रिसर्च के परिणाम इंसान और पशुओं, दोनों के लिए ही फायदेमंद होंगे. जनवरी 2012 में अमेरिका के विस्कॉंसिन विश्विद्यालय और यूरोप के इरासमुस मेडिकल सेंटर में एच5एन1 पर चल रही रिसर्च के दौरान कुछ ऐसे म्यूटेंट वाइरस बने जिनके फैलने से मनुष्य को सीधा खतरा हो सकता है. यह म्यूटेंटट वाइरस सीधे एक इंसान से दूसरे में पहुंच सकता है. इरासमुस मेडिकल सेंटर के रॉन फोउशियर के मुताबिक रिसर्च को आगे बढ़ाने के लिए उन सभी सुरक्षा संबंधी बातों का खयाल रखा जा रहा है जिनकी वजह से एक साल पहले इसे रोक दिया गया था.

जानलेवा खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार 2003 से अब तक एच5एन1 वाइरस की वजह से 610 मरीजों में से 360 की जान गई है. इंसानों में यह संक्रमण परिंदों के करीब आने या उनका मांस खाने से फैलता है. हालांकि अगर पक्षी या उनके अंडे ठीक तरह से उच्च तापमान पर पके हों तो इसका खतरा नहीं रहता. उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में रिसर्च ऐसे ढांचे को बनाने में मदद करेगी जिससे इस वाइरस के खतरे को समय रहते काबू में किया जा सके.

एसएफ/ ओएसजे(रॉयटर्स/एएफपी)

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