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दुनिया

फिर शुरू हुई मुस्लिम महिला तलाक पर बहस

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शरई कानूनों की हिफाजत के लिए कमर कसी. महिलाओं के हक का मामला बना धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा. बोर्ड ने शरई अदालतों की तादाद में इजाफे का भी फैसला किया है.

भारत में शरई कानूनों की हिफाजत के लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तगड़ी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है. बोर्ड ने सर्व सम्मति से प्रस्ताव पास कर कहा कि इस मामले में प्रधानमंत्री से भी सम्पर्क कर कहा जाएगा कि शरई मामलों में दखल देने की कोशिशों पर विराम लगाया जाए. साथ ही बोर्ड ने भारत में शरई अदालतों (दारुल कजा) की तादाद में इजाफे का भी फैसला किया है. बोर्ड ने कहा कि यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि मुस्लिम औरतों की स्थिति ठीक नहीं है, जबकि वास्तविकता इसके एकदम उलट है.

लखनऊ के मशहूर मदरसे नदवातुल उलूम से निकली बोर्ड की इस आवाज में हैदराबाद के फायरब्रांड मौलाना असददुद्दीन औवेसी भी शामिल हुए. पर्सनल लॉ बोर्ड की इस सक्रियता के पीछे सुप्रीम कोर्ट की दो टिप्पणियां हैं. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा की एक मुस्लिम महिला के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव पर गंभीर टिप्पणी की थी. यह मामला ठंडा भी नहीं पड़ा था कि उत्तराखंड की सायरा बानो की सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी पर कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कहा कि मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के शाहबानो के पक्ष में दिए गए फैसले के खिलाफ आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की पहल पर ही देश व्यापी आंदोलन और जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई थी और तब राजीव गांधी सरकार ने 'द मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट 1986 लागू कर दिया था.

धार्मिक दलील

एक बार फिर हालात इतिहास की ओर मुंह मोड़ रहे हैं. केंद्र में दक्षिणपंथी सरकार है और अल्पसंख्यकों में अपने मजहबी अधिकारों की रक्षा की लड़ाई फिर शुरू हो गई है. लखनऊ में बोर्ड की बैठक में शामिल रहीं आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की महिला सदस्य डॉक्टर असमां जहरा ने इस मामले पर कहा कि हमारी मजहबी आजादी की गारंटी भारतीय संविधान देता है, उसे कोई छीन नहीं सकता. उन्होंने तीन तलाक के मामले में कटाक्ष करते हुए कहा कि भारत के चार मेट्रो शहरों में 'इस्टेंट डिवोर्स' तेजी से बढ़ रहा है और जाहिर है इनमें मुस्लिमों की तादाद बेहद कम है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद के हवाले से उन्होंने बताया कि कोलकाता में पिछले कुछ ही वर्षों में तलाक के मामलों में 350 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई. बेंगलुरु में तीन फैमिली कोर्ट कम पड़े तो हाल ही में तीन नए फैमिली कोर्ट बनाए गए, क्या बेंगलुरु में सभी मुसलमान ही रहते हैं. उन्होंने कहा कि भारतीय समाज दरअसल धर्म आधारित सामाजिक व्यवस्था है जो पश्चिम के अंधानुकरण से बुरी तरह प्रभावित हो रही है, तलाक इसी कारण बढ़ रहे हैं. डॉक्टर असमां जहरा कहती हैं कि जिस तरह सुनंदा पुष्कर के केस में शशि थरूर और प्रत्यूषा के केस में राहुल के खिलाफ कार्रवाई हुई उसी तरह सायरा बानो केस में उसके शौहर रिजवान के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, न कि उसके मजहब के खिलाफ हाय तौबा मचाई जानी चाहिए.

दक्षिण एशियाई समस्या

दरअसल एक झटके में तीन बार 'तलाक, तलाक, तलाक' बोल कर बीवी से छुटकारा हासिल करने का चलन दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व एशिया में ही है और सिर्फ सुन्नी मुसलमानों में ही इस तलाक को मजहबी वैधता प्राप्त है. मुसलमानों में चार मसलक हैं, शाफई मलेशिया और अफ्रीका में प्रचलित मसलक है, हम्बली तुर्की और यूरोप में, मालिकी यूरोप और अरब में पाए जाते हैं. हनफी इराक, ईरान और मध्य तथा दक्षिण एशिया में सबसे अधिक पाए जाते हैं, तीन तलाक हनफी मुसलमानों में ही प्रचलित है. यही मसलक अरब से लेकर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक फैला हुआ है. विश्वविख्यात दारुल उलूम देवबंद, लखनऊ के नदवा और फिरंगी महल जैसे मदरसे हनफी मसलक के स्कूल ऑफ थॉट कहे जाते हैं. इनमें 1693 में स्थापित लखनऊ का फिरंगी महल सबसे पुराना मदरसा है जिसे औरंगजेब (1658-1707) ने शुरू करवाया था. इसी का बनाया पाठ्यक्रम 'दर्से निजामी' देवबंद, नदवा और अन्य मदरसों में लागू है.

अजीब सा बेतुकापन यह है कि हनफी उलेमा यह तो मानते हैं कि एक झटके में तीन बार बोल कर दिया गया तलाक ठीक नहीं है, इसीलिए उसे 'तलाके बिदअत' (बिदअत की अवधारणा यह है कि इस्लाम में जो कुछ प्रचलित नहीं है) कहते हैं. लेकिन कोई शौहर तीन बार बोल दे तो तलाक तो हो ही जाता है. तीन महीनों के अंतराल पर दिए जाने वाले तलाक को 'तलाके अहसन' कहते हैं. मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की चेयरपर्सन शाइस्ता अंबर इसी तलाक को लागू करने की हिमायती हैं.

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