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दुनिया

फिर मिशन बना जर्मन एकीकरण

इस साल जर्मन एकीकरण दिवस ऐसे समय में मन रहा है जब जर्मनी संसदीय चुनावों के बाद घरेलू मामलों में उलझा है. डॉयचे वेले की मुख्य संपादक इनेस पोल का कहना है कि जर्मनी को अंतरराष्ट्रीय रुख तय करना है.

1990 से जर्मनी अपने एकीकरण की याद 3 अक्टूबर को राष्ट्रीय दिवस के साथ मनाता आ रहा है. सारी अनसुलझी मुश्किलों, निराश करने वाली उम्मीदों और अधूरी परियोजनाओं के बावजूद यह दिन खुशी का दिन है. एक दिन, जब सारी दुनिया अचंभे के साथ इस देश को देखती है, जो इतने सारे अत्याचारों के लिए जिम्मेदार रहा है, लेकिन उसने शांतिपूर्ण तरीके से दीवार को गिरा डाला ताकि वह एकीकरण के बाद भरोसेमंद लोकतंत्र और फलती फूलती आर्थिक सत्ता के रूप में पश्चिमी दुनिया का एक पाया बन सके.

पटरी से उतरी दुनिया

और फिर आया 2017 का बुंडेसटाग का चुनाव. और धुर दक्षिणपंथी एएफडी पार्टी करीब 13 फीसदी वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रही. तब से आजादी के संघर्ष में उतरने वाले जीडीआर नागरिकों का नारा अलग खनकता है. उन्होंने 1989 में ड्रेसडेन और दूसरे शहरों में "हम जनता हैं" का नारा लगाया था और इसके साथ जीडीआर की साम्यवादी सरकार को उखाड़ फेंका था. "हम जनता हैं" का मतलब था कि हम लोकतांत्रिक फैसला लेना चाहते हैं कि हम कैसे देश में रहना चाहते हैं. हम दूसरों को फैसले लेने और दमन करने की अनुमति नहीं देंगे.

आज जब पहली बार बुंडेसटाग में एक धुर दक्षिणपंथी पार्टी चुनी गयी है, तो यह वाक्य एकदम अलग मायने देता है. इस "हम जनता हैं" वाक्य में लोकतांत्रिक अधिकार की मांग नहीं सुनायी देती. बहुत सारे लोगों के लिए इसका मुख्य संदेश यह है कि तुम इसमें शामिल नहीं, तुम यहां के नहीं हो. यह बात उन शरणार्थियों पर लागू होती है जो पिछले दो सालों में जर्मनी आये हैं, युद्ध से सुरक्षा पाने और अपने लिए नया भविष्य तलाशने. यह पटरी से उतरी दुनिया को पीछे की ओर ले जाने वाली प्रतिक्रिया है, दुनिया जो पहले जैसी नहीं रही, और न कभी होगी.

भाग रहे हैं लाखों लोग

लाखों लोग घर बार छोड़कर भाग रहे हैं, क्योंकि वे अपने वतन में रह नहीं सकते या रहना नहीं चाहते क्योंकि युद्ध, महामारी, सूखा और बाढ़ उन्हें भगा रहे हैं. और लाखों लोग उनके पीछे से आयेंगे. जरूरी नहीं कि ये सारे लोग यूरोप आयें, लेकिन लोगों का भागना और उसके नतीजे पूरी दुनिया पर असर डालेंगे. इसलिए दूसरों को बाहर रखने वाला यह नारा "हम जनता है", ऐसा नारा है जो अपनी बेबसी में न सिर्फ राजनीतिज्ञों पर लक्षित है बल्कि 87 प्रतिशत मतदाताओं की ओर भी जिन्होंने एएफडी के खिलाफ फैसला किया है.

Ines Pohl Kommentarbild App (DW/P. Böll)

डॉयचे वेले की मुख्य संपादक इनेस पोल

1989 में पूर्वी जर्मनी में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के विपरीत आज यह कोई बहुमत नहीं जो जनता शब्द की समझ के पीछे इकट्ठा हुआ है. पहले की तरह काम करते रहना जैसे कि कुछ हुआ ही न हो और व्यक्तिगत विकास और निजी खुशहाली की ओर वापस लौटना इस चुनावी नतीजे पर सही प्रतिक्रिाय नहीं होगी. जटिल गठबंधन वार्ताएं भी इस बात का सबूत है कि बड़ा सवाल यह है कि आखिर हम कैसे देश में रहना चाहना चाहते हैं.

एकता स्वाभाविकता नहीं

जर्मन महाकवि गोएथे ने अपने किरदार फाउस्ट से कहलवाया था, "जो तुमने अपने पुरखों से पाया है, उसे हासिल करो ताकि वह तुम्हारा हो." एक वाक्य जो जर्मन एकीकरण के आज के दिन के लिए लिखा गया लगता है. क्योंकि एकता स्वाभाविक रूप से आयी एकता नहीं है. वह ऐसी चीज नहीं, जिसके लिए भले ही दूसरे लड़े हों लेकिन अब वह हमारे लिए स्वाभाविक हो.

पश्चिम जर्मनी के बवेरिया और बाडेन वुर्टमबर्ग प्रांतों में एएफडी की जीत इस बात का सबूत है कि इन इलाकों को पूरब और पश्चिम के समस्या वाले इलाकों में बांटना इस दुनिया के लिए बहुत आसान है. अब ऐसे जर्मनी के लिए संघर्ष करना होगा जो खुद को यूरोपीय संघ का सदस्य समझे, जो संविधान के मजबूत आधार पर खड़ा हो और अपनी समृद्धि और प्रभाव को जिम्मेदारी समझे, वहां मदद करने के लिए जहां के लोगों की हालत अच्छी नहीं है.

जर्मनी एकीकरण दिवस मना रहा है. एक समारोह जो 2017 में जश्न से ज्यादा एक मिशन है.

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