फिर उठा भारत में अलग टाइम जोन का मुद्दा | दुनिया | DW | 21.07.2017
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दुनिया

फिर उठा भारत में अलग टाइम जोन का मुद्दा

पूर्वोत्तर भारत के कई संगठन समय-समय पर इलाके के लिए अलग टाइम जोन की मांग उठाते रहे हैं. अब पहली बार केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार-विमर्श शुरू किया है.

बीजू जनता दल (बीजेडी) के सांसद भतृहरि महताब ने लोकसभा में यह मुद्दा उठाया है. उनका कहना है कि देश के पूर्वी और पश्चिमी छोर के समय में लगभग दो घंटे का अंतर है. ऐसे में अलग टाइम जोन होने की स्थिति में मानव श्रम के साथ अरबों यूनिट बिजली भी बचाई जा सकती है. संसदीय मामलों के मंत्री अनंत कुमार का कहना था कि यह मुद्दा बेहद अहम और संवेदनशील है और सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर रही है. 

महताब कहते हैं, "पश्चिम बंगाल-असम सीमा से दूसरा टाइम जोन शुरू हो सकता है." उनकी दलील है कि अरुणाचल प्रदेश में सूरज तो सुबह चार बजे ही उगता है. लेकिन दफ्तर 10 बजे खुलते हैं. महताब दिल्ली की अंबेडकर यूनिवर्सिटी के कानून के प्रोफेसर लॉरेंस लियांग के हवाले से कहते हैं कि देश के पूर्वी और पश्चिमी छोर के बीच समय में दो घंटे का अंतर रहता है. केंद्रीय विज्ञान व तकनीक मंत्रालय ने इसका पता लगाने के लिए एक अध्ययन किया था कि दो अलग-अलग टाइम जोन होने की स्थिति में कितनी ऊर्जा बचाई जा सकती है. उन्होंने केंद्र से इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और इसे शीघ्र लागू करने की मांग की है.

फायदा नुकसान

पूर्वोत्तर में लंबे अरसे से अलग टाइम जोन की मांग करने वाले संगठनों की दलील है कि अगर इलाके में घड़ी की सूइयों को महज आधे घंटे पहले कर दिया जाए तो 2.7 अरब यूनिट बिजली बचाई जा सकती है. केंद्रीय विज्ञान व तकनीक मंत्रालय ने कोई एक दशक पहले इस मुद्दे के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन किया था. तब देश में दो अलग-अलग टाइम जोन के विकल्प पर गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया था. इनको ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी) से क्रमश: पांच व छह घंटे आगे होना था. फिलहाल जीएमटी और आईएसटी के बीच साढ़े पांच घंटे का अंतर है.

लेकिन समिति ने अपने अध्ययन के बाद कहा कि एयरलाइंस, रेडियो, टेलीविजन और समय से जुड़ी दूसरी सेवाओं को ध्यान में रखते हुए दो अलग-अलग टाइम जोन बनाना उचित नहीं होगा. मंत्रालय ने वर्ष 2007 में संसद को बताया था कि दो अलग-अलग टाइम जोन बनाने की बजाय पूर्वी राज्यों में कामकाज का समय एक घंटा पहले करना इस समस्या का व्यावहारिक व प्रभावी समाधान हो सकता है. यह काम प्रशासनिक निर्देशों के जरिये हो सकता है.

दोदशकपुरानीमांग

देश में दो अलग-अलग टाइम जोन की मांग लगभग दो दशक पुरानी है. वर्ष 2001 में केंद्र सरकार ने इसके विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के लिए एक समिति बनाई थी. वर्ष 2006 में योजना आयोग ने कामकाज में दक्षता के लिए पूर्वोत्तर इलाके के लिए एक अलग टाइम जोन बनाने की सिफारिश की थी. हाल में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी यह मांग उठाई थी. इससे पहले लंबे समय तक असम के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई ने भी चाय बागान टाइम जोन को सरकारी टाइम जोन बनाने का प्रस्ताव दिया था.

लेकिन केंद्र की उदासीनता की वजह से यह मामला आगे नहीं बढ़ सका. असम के जाने-माने फिल्मकार जाहनू बरूआ भी पहले यह मांग उठा चुके हैं. उन्होंने तो आईएसटी का पालन करने की वजह से पूर्वोत्तर को होने वाले आर्थिक नुकसान के आकलन के लिए एक माडल भी विकसित किया था. बरूआ के मुताबिक, "अलग टाइम जोन नहीं होने की वजह से पूर्वोत्तर इलाके में बिजली के फालतू खर्च के तौर सालाना 94 हजार 900 करोड़ रुपए का नुकसान होता है."

आर्थिक असर

वर्ष 2012 में नेशनल इंस्टीट्यूट आफ एडवांस स्टडीज के शोधकर्ताओं ने आईएसटी को आधे घंटे पहले करने का सुझाव दिया था. उनका कहना था कि इससे रोजाना ऊर्जा की खपत 17 -18 फीसदी कम होगी और पूरे साल के दौरान 2.17 अरब किलोवाट बिजली बचाई जा सकती है. उसी दौरान इसके समर्थन में एक ऑनलाइन अभियान भी शुरू हुआ था. लेकिन वह तमाम प्रयास बेअसर रहे. अब नए सिरे से यह मांग उठने और सरकार के इस पर गंभीरता से विचार करने का भरोसा देने के बाद पूर्वोत्तर राज्यों के लिए अलग टाइम जोन की उम्मीदें एक बार फिर हरी हो गईं हैं.

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान देश में तीन अलग-अलग टाइम जोन थे. बांबे टाइम जोन, कलकत्ता टाइम जोन और बागान टाइम जोन. पूरे देश के चाय बागान मजदूर इसी बागान टाइम जोन के हिसाब से काम करते थे. असम के चाय बागानों में यह टाइम जोन अब भी लागू है. एक संगठन की ओर से हाल में गुवाहाटी हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर केंद्र को अलग टाइम जोन बनाने का निर्देश देने की अपील की गई थी. लेकिन अदालत ने यह कहते हुए उक्त याचिका खारिज कर दी कि इससे कई तरह की दिक्कतें सामने आ  सकती हैं. उसकी दलील थी कि देश में अब भी मैन्यूअल तरीके से ही ट्रेनों की पटरियां बदली जाती हैं. अलग टाइम जोन होने की स्थिति में भ्रामक स्थिति पैदा होगी और रेल हादसे बढ़ सकते हैं.

अलग टाइम जोन के समर्थक संगठनों की दलील है कि दिन में सूरज की कम रोशनी मिलने की वजह से ही अब तक इलाके में औद्योगिक विकास नहीं हो सका है. ऐसे संगठन अपनी बातों के समर्थन में दलील देते हैं कि देश में मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, बेंगलुरू और अहमदाबाद के आईएसटी के पश्चिम में होने की वजह से सूरज की रोशनी ज्यादा देर तक मिलती है. यह उनके विकसित होने की एक प्रमुख वजह है.

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