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दुनिया

फिदेल कास्त्रो और विश्व नागरिक बिरादरी

करीब एक सदी का जीवन फिदेल कास्त्रो का रहा है. 20वीं सदी के संघर्षों, यातनाओं और विडंबनाओं के चुनिंदा चश्मदीदों में वो एक थे. 90 की उम्र में जाने के बाद भी उनकी प्रासंगिकता के बारे में टिप्पणी कर रहे हैं शिव प्रसाद जोशी.

शीत युद्ध के उपरांत विश्व की उथल-पुथल के दौर में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सशक्त प्रवक्ता, क्यूबा में समाजवाद के अनूठे प्रयोग के निर्माता और दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति अमेरिका और उसके युद्धोन्मत्त राष्ट्रपतियों के विभिन्न कार्यकालों के साये में छोटे से क्यूबा को खड़ा रख पाने वाले योद्धा और राजनीतिज्ञ फिदेल कास्त्रो अब नहीं हैं. लेकिन उनकी प्रासंगिकता कुछ ऐसी है कि दबदबे, आधिपत्य और नवउदारवादी कब्जों से चोट खाई और सताई दुनिया के लिए अब भी सांत्वना और साहस का काम करती है.

कास्त्रो दुनिया के उन गिने चुने नेताओं में से हैं जिनकी एक खास अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और लोकप्रियता ताउम्र बनी रही. क्यूबाई नेता के विरोधी और आलोचक भी उन्हें तानाशाह बताते हुए झिझकते रहे हैं क्योंकि एक राष्ट्र के नेता के तौर पर कास्त्रो की सफलता असदिंग्ध और निर्विवाद थी. शिक्षा और स्वास्थ्य और खेलों को लेकर क्यूबा को विश्व के अग्रणी देशों में खड़ा कर देने वाले कास्त्रो का ये करिश्मा ही था कि उनके इन नागरिक अभियानों को संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं अनदेखा नहीं कर पाई. इन्हीं अभियानों की चमक ने कास्त्रो को अफ्रीका, लातिन अमेरिका और एशिया के विकासशील और गरीब देशों में भी अपार लोकप्रियता दिलाई. 

अंतरराष्ट्रीय राजनय में कास्त्रो इसलिये महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने न सिर्फ दो ध्रुवीय विश्व में गुटनिरेपक्षता के सिद्धांत को व्यवहार में लाने में निर्णायक भूमिका निभाई, बल्कि गुटनिरेपक्ष आंदोलन के कमजोर होने और सोवियत संघ के विघटन और भूमंडलीकरण की चुनौतियों के बीच भी उन्होंने उस विचार को जिंदा रखा. एकध्रुवीय विश्व में कास्त्रो ही थे जो अपने कुछ लातिन अमेरिकी पड़ोसियों के साथ एक प्रतिरोध की दीवार थामे रख सकते थे. ये सही है कि आज हूगो चावेज नहीं हैं, फिदेल कास्त्रो भी नहीं है, लातिन अमेरिका में अमेरिका विरोधी आवाजें अब शिथिल हो रही हैं, उधर अमेरिका में डॉनाल्ड ट्रंप के रूप में एक नये उग्र राष्ट्रवादी नेतृत्व का उभार हुआ है. क्यूबा अब धीरे धीरे उन विचलनों में डगमगाता सा जाने लगा है जिनके प्रतिरोध का वो झंडाबरदार था. ऐसी तमाम स्थितियों में भी फिदेल कास्त्रो जैसे नेताओं की कमी तो खलती ही रहेगी. फिर वो चाहे सुदूर एशिया का भारत हो या सुदूर यूरोप का यूक्रेन.

अगर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में शख्सियत और करिश्माई व्यवहार की अहमियत है तो कास्त्रो उसकी बेहतरीन मिसाल थे. समतामूलक और न्यायपूर्ण जीवन दशाएं और विकास के वैकल्पिक मॉडल के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ही उनकी सबसे बड़ी देन है. औपनिवेशिक सत्ताओं के दमन से जूझ रहे देशों को क्यूबा ने न सिर्फ नैतिक और सामरिक मदद मुहैया कराई, अपने डॉक्टरों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और टेक्नीशियनों को भेजकर उन देशों की बदहाली को संवारने मे अपना किंचित योगदान वो देता रहा.

हाल के वर्षों तक दुनिया के किसी भी हिस्से में कुदरती आफत से होने वाले विनाश के बाद पुनर्वास के काम में क्यूबाई वॉलटिंयरों का योगदान भला कौन भूलेगा. ये कास्त्रों की ही दृष्टि थी जो दुनिया के गरीब मुल्कों की एकजुटता के रास्ते परखती और देखती रही. 2010 में हैती में आए विनाशकारी भूकंप के बाद जब हैजा जैसी महामारी फैली तो क्यूबाई चिकित्सा टीमें ही थी जो अंत तक डटी रहीं. पश्चिमी अफ्रीकी में इबोला वायरस के संक्रमण से निपटने में उन गरीब देशों की मदद में क्यूबा पीछे नहीं हटा. दक्षिण अफ्रीका में पसरे नस्लभेद को मिटाने में कास्त्रो ने भी एक बड़ी भूमिका निभाई थी. लेकिन इस सबके बावजूद कास्त्रो पर मानवाधिकार उल्लंघन और विरोधियों के दमन के आरोप भी लगते रहे. उन पर एक कल्ट सरीखा विकसित कर देने का आरोप भी लगा. लेकिन कास्त्रो ने इन आरोपों की परवाह कभी नहीं की. वो विश्व मंचों पर अमेरिकी सत्ता-तंत्र की विरोधी सामरिकता की प्रखर आवाज बने रहे.

कास्त्रो अपनी जनता की सच्ची निराशा के प्रतिनिधि थे. वो उनकी सच्ची कामनाओं के प्रतिनिधि भी थे. आज उनके निधन पर अगर पूरी दुनिया में उनसे एक जुड़ाव महसूस किया जा रहा है तो इसकी एक बड़ी वजह यही है कि कास्त्रो ने अपना एक विशिष्ट लातिन अमेरिकी समाजवाद विकसित किया था. सोवियत मॉडल से हटकर कास्त्रो ने लातिन अमेरिकी परिवेश में जो प्रयोग किया और समाजवाद के साथ ईसाइयत की प्रेरणाओं को पिरोया, उससे लोगों में नई उम्मीद जगाई. आज जब पूंजीवादी सिस्टम को लेकर कई सवाल और चिंताएं सामने हैं, खुद अमेरिका एक बड़े अनिश्चय से गुजर रहा है- ऐसे में फिदेल कास्त्रो का समाजवाद एक नई मानवीय विश्व संरचना की मांग को ज़िंदा रखेगा.

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