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मनोरंजन

फारूख शेख नहीं रहे

शुक्रवार को दिल का दौरा पड़ने से अभिनेता फारूख शेख की मौत हो गई है. 1980 के दशक में फारूख शेख भारतीय समाज का विश्लेषण कर रही फिल्मों के जरिए मशहूर हुए. इस साल जून में डीडब्ल्यू से उनकी बातचीत हुई.

फारूख शेख ने 1973 में एम. एस. सथ्यु की फिल्म गरम हवा से फिल्मी सफर शुरू किया था. वो मानते हैं कि पहले फिल्मों की कहानियां बहुत ठोस होती थीं. फारूक ने कहा, "लेखक और निर्देशक के कंधे बहुत कद्दावर और मजबूत होते थे जो एक अभिनेता को बराबर का सहारा देते थे. आज वह सब खो सा गया है. आज की कॉमेडी में भद्दापन ज्यादा दिखाई देता है. हालांकि मुख्य धारा में कई लोग साफ सुथरी, दिलचस्प फिल्में बना रहे हैं."

हाल ही में न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में फारूख शेख की फिल्में विशेष रूप से दिखाई गयीं. सागर सरहदी, रमेश तलवार, सई परांजपे, एम. एस. सथ्यु, सत्यजित रे जैसे निर्देशकों के साथ काम कर चुके फारूख ने गरम हवा के बारे में बताया की इस्मत चुगताई की कहानी पर बनी इस फिल्म से जुड़े सब लोग बहुत जोश में थे. ऐसी फिल्म बनाना चाहते थे जो उस में उठाये मुद्दे को याद रखने लायक बनाए. फारूख शेख को इन लोगों से बहुत सीखने को मिला, साथ ही मिला वह वातावरण जिसने यह सिखाया की पात्र कितना छोटा भी क्यों न हो आपसे कुछ न कुछ कहने लगता है और पूरी कहानी के लिए बड़ा महत्वपूर्ण होता है.

शतरंज के खिलाड़ी को याद करते हुए फारूख शेख ने बताया की सत्यजित रे के फोन को पहले तो उन्होंने किसी का मजाक समझा. अपने आप को खुशनसीब मानते हैं कि रे की फिल्म में काम करने का मौका मिला. फारूख के अनुसार रे साब का काम करने का तरीका एकदम नियम कायदे से रहता था. जाने अनजाने वे अभिनेता को उस ओर ले जाते थे जैसा उन्होंने सोचा होता था.फारुख मानते हैं कि मुंबई में गरम हवा के समय से ही शुरू हो गया था समानांतर हिंदी फिल्मों का दौर. फारूख शेख की नजर में समानांतर सिनेमा क्या है?

ऐसा सिनेमा जो आपका ध्यान खींचे, ज़िन्दगी से जुडी बातों को सामने रखे, दर्शकों को पकड़ ले लेकिन वह उबाऊ भी नहीं होना चाहिए. शतरंज के खिलाड़ी हो या बाजार, उस समय एक नया सिनेमा जोर पकड़ रहा था तो हम भी उस चलती बस में चढ़ लिए.

आजकल पुरानी सफल फिल्मों को फिर से बनाने का चलन हो गया है. फारूख शेख और दीप्ती नवल की चश्मे बद्दूर का रिमेक भी आया. फिल्मों के रिमेक पर फारूख की क्या राय है?

रिमेक कोई नयी बात नहीं है. देवदास कितनी बार बनी है. मूल फिल्म बनाने वाले की सोच रीमेक बनाने वाले की सोच से अलग ही होती है तो जाहिर है कि फिल्म का ट्रीटमेंट भी अलग तरह का होगा. रिमेक अच्छा मौका भी देता है पहले से तैयार एक फिल्म को आधार बना कर नयी फिल्म बनाने का, साथ ही बड़ी चुनौती भी देता है क्योंकि हर कोई देखना चाहता है कि पुरानी सफल फिल्म की तुलना में नयी फिल्म कितनी खरी उतरती है.

पिछले कुछ सालों से फारूख शेख कम ही फिल्मों में दिखाई दियें हैं, क्यों?

मैं आरामतलब आदमी हूं. अगर टी वी कर रहा हूं तो फिल्मों की ओर ध्यान नहीं दे पाता. थियेटर कर रहा होता हूं तो उसमे ही लगा रहता हूं. फिर भी कुछ न कुछ करता ही रहता हूं.

लाहौर फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फारूख शेख क्या वर्तमान दौर की फिल्मों से संतुष्ट हैं?

सिनेमा आज जो मोड़ ले रहा है वह बहुत ही दिलचस्प मोड़ है. हिन्दुस्तानी सिनेमा पूरी दुनिया में अपनी मौजूदगी का एहसास दिला रहा है लेकिन मनोरंजन के साथ यदि फिल्म याद रखने वाली बात भी पेश करे तो वह सोने में सुहागा होगा.

इंटरव्यूः अंबालिका मिश्रा, न्यू यॉर्क

संपादनः एन रंजन


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