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ब्लॉग

फायदे नुकसान का तेलंगाना

तेलंगाना के नया राज्य बनने की उलटी गिनती शुरू हो गई है. अगले सप्ताह या मॉनसून सत्र से पहले किसी बैठक में कांग्रेस की सर्वोच्च निर्णायक संस्था, सीडब्लूसी कांग्रेस वर्किग कमेटी इस पर संभव है हां में ही फैसला सुनाएगी.

दिसंबर 2009 में जब यूपीए सरकार के तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने ऐलान कर दिया था कि तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का काम शुरू कर देंगे और इस वादे से टीआरएस प्रमुख चंद्रशेखर राव का अनशन तुड़वा दिया गया- तो किसी को यकीन नहीं था कि चिदम्बरम और उनकी पार्टी कांग्रेस और उनकी यूपीए सरकार अपने वादे से पलट जाने वाली है. जब ऐसा हुआ तो सब लोग स्तब्ध थे. तेलंगाना में जहां जश्न का माहौल था वहां अचानक वज्रपात जैसा हुआ.

इस तरह 2009 से करीब चार साल और यूं आजादी के समय से ये मामला अब तक खिंचता आ रहा है. अब एक बार फिर लग रहा है कि कांग्रेस ने अपनी ऐतिहासिक गलती को दुरुस्त करने का फैसला किया है और आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना देश का 29वां राज्य बन जाएगा. सारे संकेत यही बता रहे हैं कि इस बार शायद कांग्रेस फैसला कर उसे न निभाने का जोखिम मोल न ले. कांग्रेस आलाकमान जहां अलग राज्य के मूड में हैं तो कांग्रेस के ही सूबाई इंचार्ज यानी आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री किरण रेड्डी तेलंगाना के धुर विरोधी माने जाते हैं. इस तरह की खबरे भी आईं हैं कि ऐलान हुआ तो रेड्डी कहीं इस्तीफा न दे दें. लेकिन क्या वो आलाकमान से बगावत करने की जुर्रत कर पाएंगें. लगता तो नहीं है.

तेलंगाना की स्वायत्तता की मांग आजादी के समय से ही उठाई जा रही है. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उसे नजरअंदाज किया, उनकी बेटी और बहुत लंबे समय तक देश की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी ने भी तेलंगाना को महत्व नहीं दिया. किसान आंदोलन की तपती जमीन रहा तेलंगाना सुलगता रहा. 1969 में छात्र किसान आंदोलन ने तेलंगाना को देश भर के जन आंदोलनों में पहली पंक्ति में ला दिया और वो जन संघर्षों का मुहावरा बन गया. कविता गीत कहानी नाटक लिखे जाने लगे, मंचन होने लगे, तेलंगाना जैसे जनअधिकार की एक अपरिहार्यता बन गया. जितना ज्यादा तेलंगाना भड़का उतनी ही उसकी राजनीतिक अनदेखी हुई, दमन हुआ, नाइंसाफियां हुईं. जितना दमन हुआ उतना ही तेलंगाना और भड़का, इस तरह ये चक्र बना रहा और तेजी से घूमता रहा.

भारी विरोध के बावजूद 1956 में तेलंगाना का आंध्र में विलय कर आंध्रप्रदेश राज्य का गठन किया गया था. इसके तीन सांस्कृतिक जोन हैं, तटीय आंध्र, रायलसीमा और तेलंगाना. रायलसीमा और तटीय आंध्र की राजनीतिक बिरादरी खासकर कांग्रेस के उन इलाकों के नेता, तेलंगाना का जबरदस्त विरोध कर रहे हैं. 2009 की घोषणा से पीछे हटने की कांग्रेस आलाकमान की विवशता के पीछे इन इलाकों में भड़का उग्र आंदोलन भी था. अब बात घूम फिर कर वहीं आ रही है. ऐसा नहीं है कि तेलंगाना के विरोध में आंदोलन नहीं होंगे लेकिन कांग्रेस को अब कड़े फैसले की धार से गुजरना है.

पार्टी के तेलंगाना विरोधी नेताओं का तर्क है कि अलग राज्य बन जाने से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं होगा बल्कि और दो इलाकों की सीटें निकल जाएंगी. तेलंगाना के समर्थकों का दावा है कि अलग राज्य बन जाने से कांग्रेस सौ प्रतिशत सीटें जीतेगी और इसका असर दूसरे इलाकों पर भी पड़ेगा. कहा जा रहा है कि कांग्रेस की ये चाल 2014 में चुनावी फायदा उठाने के लिए है. आंध्र की 42 लोकसभा सीटों में से 17 तेलंगाना क्षेत्र की हैं. 12 पर कांग्रेस का कब्जा है. इसी तरह विधानसभा की 294 सीटों में से 119 सीटें तेलंगाना से आती हैं और 50 से ज्यादा अभी कांग्रेस के पास हैं. ये एक ललचाऊ भी है और न निगलते बने न उगलते की स्थिति भी. कांग्रेस को तेलंगाना की फिक्र से ज्यादा सीटों का मोह है. नफा नुकसान तौला जा रहा है. और इसीलिए पसोपेश सघन है. लेकिन सिक्का तो उछालना ही होगा.

राजनैतिक नफा नुकसान से इतर, जरा इस बात पर भी गौर कर लें कि 29वें राज्य के रूप में तेलंगाना अस्तित्व में आ जाता है तो क्या पीढियों के संघर्ष और आंदोलनधर्मिता की भावना का एक लिहाज से सकारात्मक जवाब मिल जाएगा या ये बात कोरी भावुकता ही रह जाएगी. भारत का 20 फीसदी कोयला खदान तेलंगाना में हैं. आंध्र का 45 फीसदी जंगल तेलंगाना क्षेत्र के पांच जिलों में फैला है. राज्य की करीब 41 फीसदी आबादी तेलंगाना में रहती है. तेलंगाना सामाजिक सांस्कृतिक और राजनैतिक तौर पर एक समृद्ध इलाका है. लेकिन जैसा कि हमने उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के साथ होते देखा क्या तेलंगाना की भी वैसी दुर्गति होगी. राजनीतिक और पूंजी निवेश के ठिकाने बन जाने वाले राज्यों से आस थी कि वे जन आकांक्षाओं को पूरा करते और लोगों की उम्मीदों के राज्य बनते. 2000 के तीनों राज्य तो जल जंगल जमीन के बेरोकटोक दोहन और निवेश की एकतरफा मुनाफाखोर संस्कृति में लोटपोट हैं.

चुनिंदा लोकसभा सीटों और बहुत सारी विधानसभा सीटों की राजनीति और अपार कुदरती संसाधनों के इस्तेमाल का गणित देखने वाले रोडमैप से अलग- बने तो वो तेलंगाना बने जो लोकगीतों, लोककथाओं, जंगलों, खेतों, किसानों, छात्रों, संघर्षों और अस्मिताओं में धड़कता रहा है. लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा. हम एक जीवंत समाज के रोडमैप की बात कर रहे हैं. तेलंगाना का रोडमैप कैसा होगा.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी, देहरादून

संपादनः एन रंजन

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