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मनोरंजन

फातू दियोमः अपनी जड़ों और सराकारों से लगाव

मशहूर लेखिका फातू दियोम यूं तो अब फ्रांसीसी नागरिक हैं लेकिन अफ्रीकी देश सेनेगल में अपनी जड़ों का अहसास हमेशा उनके साथ रहता है. अफ्रीका के विकास के लिए चिंतित फातू पश्चिम से एक नए नजरिए की मांग करती हैं.

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फर्श से अर्श पर जाने की दास्तां

42 साल की हंसती खिलखिलाती फातू दियोम. हास्य से भरी उनकी विविधतापूर्ण भाषा जो सफलता, निराशा, दर्द, ख़ुशी, अकेलेपन और परिवार का सहारा जैसे गंभीर विषयों को बहुत कुशलता से पेश करती हैं और पढ़ने वाले को वह अपनी दुनिया में ले जाती हैं. 2003 में उनका पहला उपन्यास सागर का पेट बाज़ार में आया. पूरी दुनिया में उनकी प्रशंसा की गई और उन्हें कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया.

कठोर सच्चाइयां

लगता है जैसे फातू दियोम की कड़ी जिंदगी ने उन्हें मज़बूत और ख़ुशमिजाज बना दिया. एक अफ्रीकी महिला के तौर पर उन्होंने अपने अनुभवों और ख्यालों को शब्दों में ढाला. उदाहरण के लिए यूरोप में अफ्रीकियों

Fatou Diome

को कैसे देखा जाता है और एक महिला होने के नाते उन्हें किस तरह की चुनौतियों से दो चार होना पड़ा.

फातू दियोम बताती हैं कि अब भी सेनेगल की एक करोड 20 लाख की आबादी में से दो तिहाई लोग पढ़ना लिखना नहीं जानते है. फातू ने अपनी पढ़ाई के लिए भी लंबी लड़ाई लड़ी. वे एक नाजायज़ औलाद मानी जाती थीं, इसलिए उन्हें समाज में अकसर अलग थलग रखा गया और स्कूल जाने का अधिकार भी नहीं दिया गया. 9 साल की उम्र में वह स्कूल में जबरस्ती घुसीं और कहा कि मुझे पढाओ.

जिस तरह लाखों अफ्रीकी अपनी जान पर खेल कर यूरोप आने का सपना देखते हैं, उसी तरह फातू ने भी यूरोप आने का सपना देखा था. उन्हें किसी फ्रांसीसी व्यक्ति से प्यार भी हो गया. लेकिन उसके परिवार ने उन्हें स्वीकार नहीं किया और फातू का सपना टूट गया. वापस जाना उनके लिए शर्म की बात थी. सेनेगल में वह अपने गांव में लोगों को क्या बतातीं. इस तरह फातू को यूरोप आकर हताशा झेलनी पड़ी और वह अकेली रह गईं. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

रंग लाई मेहनत

वह बताती हैं, "जब मै फ्रांस आई और उस परिवार का हिस्सा बनी, तब मुझे समझ में आया कि उन्होंने अपनी बहू के लिए किसी परीकथा से निकली गोरी चिट्ठी स्नोव्हाइट की कल्पना की थी. लेकिन मेरा रंग तो चॉकलेट जैसा है. मुझे देखकर उन्हें निराशा होती थी. यह मेरे लिए बडा सदमा था. मैंने कभी नस्लवाद को महसूस नहीं किया. ठीक है. मुझे फिर अकेले अपनी ज़िंदगी का सामना करना पड़ा. मैंने लोगों के घरों में सफाई की, बुजुर्गों की मदद की, बेबी सिटिंग की और इसके साथ आगे की पढ़ाई भी की. यह सब मैं हमेशा उन

Fatou Diome

युवाओं को समझाती हूं, जो यूरोप में रहने का सपना देखते हैं. जब विश्वविद्यालय में डिग्री पाकर फ्रांस में इतनी दिक्कत हुई, तो फिर अनपढ़ लोगों का क्या होता. जब कोई सेनेगल में आगे नहीं बढ़ पाता, तब यूरोप में कैसे आगे बढ़ेगा."

फातू दियोम की मेहनत का नतीजा है कि आज फ्रांसीसी समाज और दुनिया उन्हें स्वीकार कर रही है. 16 साल से वह फ्रांस में रह रहीं हैं, स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय में साहित्य पढाती हैं और टीवी में उनके साहित्य से जुड़ा टॉक शो भी है. खूब लड़ झगड़ कर उन्हें फ्रांस की नागरिकता भी मिल गई. लेकिन उन्हें एक बात बहुत सालती है और वह यह कि फ्रांस में तो वह अफ्रीकी हैं और अपने देश सेनेगल में एक फ्रांसीसी.

नए नजरिए की मांग

कुछ ही हफ्ते पहले पश्चिमी सेनेगल ने फ्रांस से स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ मनाई. फातू दियोम देशभक्त हैं और कहतीं हैं कि वह अफ्रीका के धीमे विकास से तंग आ चुकी हैं और यह इसलिए हो रहा है क्योंकि पश्चिमी देश थोड़े समय बाद विकास में दिलचस्पी खो देते हैं. उनके मुताबिक, "यूरोप के लोगों को यह समझना ज़रूरी है कि यदि हम अफ्रीका के विकास पर ध्यान देंगे, तब यह सिर्फ एक महाद्वीप का विकास नहीं होगा. इसके साथ पूरी दुनिया की प्रगति होगी. हम सब एक दूसरे से जुडे हुए हैं. अफ्रीका की मदद करने का मतलब यह होना चाहिए कि आप अफ्रीका को ऐसे तौर तरीके बताएं कि वह अपनी मदद करना खुद सीख ले और किसी पर निर्भर न हो. "

फातू दियोम कल्पना करती हैं कि अफ्रीका को भी कभी ऐसी मदद मिलेगी जिस तरह दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप को अमेरिका की ओर से मिली. उनके मुताबिक, "यदि अफ्रीका के लिए एक काल्पनिक मार्शल प्लान बनाया जाए, तब हमें सबसे पहले शिक्षा में निवेश करना चाहिए. हम अफ्रीकी यूरोपीयों से ज़्यादा बुद्धू तो नहीं हैं. मेरी मां और मेरे बीच सिर्फ एक ही अंतर था और वह था स्कूल जाना. हम दोनों गरीब थे, लेकिन अगर उन्हें मेरी तरह शिक्षा मिल जाती, तब वह भी अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ सकती थीं. सभी तरह के प्रशिक्षण को पाने के लिए लोगों को अवसर मिलने चाहिए. ब्रैड बनाने के लिए एक अच्छा बेकर उतना ही ज़रूरी है जितना कोई ऐसे व्यक्ति जिसने डिग्री पाई हो. मुझे उन बड़े बड़े नामों से नफरत है जो अफ्रीका आते हैं, कुआं बनाते हैं और फिर चले जाते हैं. टीवी में उनकी प्रशंसा की जाती है. लेकिन थोडी देर बाद पता चलता है कि कुआं सूखा ही रह गया है."

रिपोर्टः प्रिया एसेलबोर्न

संपादनः ए कुमार

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