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ब्लॉग

फागुन में झमकते रंग

लोक स्मृतियों की तहों से ही निकलते हैं त्योहार. वे बुराई से अच्छाई की ओर लौटती स्मृतियां हैं, इन्हीं में एक है होली जो यादों के पानी में ढेर सारे रंग घोलकर सबकुछ भूल जाने का निराला अनुभव बन जाती है.

होली को मनाए जाने का इतिहास बहुत पुराना है. आर्यों के समय से. 11वीं सदी में फारस से आए विद्वान अल बरूनी ने भी होली मनाने का जिक्र किया है. कुदरत की करवट के स्वागत का पर्व भी होली है. वसंत की विदाई और फागुन का आगमन. सरसों के पीले फूल, पलाश की लालिमा, गेहूं की बालियां, किसानों के गीत सब मिलकर होली का एक रंगीला रोमान रच देते हैं. जितना ये प्रकृति का उल्लास पर्व है उतना ही ये, बकौल रघुबीर सहाय ‘एक अद्वितीय सामाजिक मौसम' भी है. संस्कृतियों और समाजों और संस्कारों की मिलीजुली रंगतें. एक विशुद्ध भारतीय सामाजिक एकजुटता का प्रतीक. जाति, धर्म और संप्रदाय के बंधनों को खोलता.

सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो से लेकर बहादुरशाह जफर और नजीर अकबराबादी की रचनाएं होली की खिलंदड़ी, उसके अध्यात्म, उसकी सूफियाना मस्ती और उसके विहंगम सामाजिक फैलाव के बारे में बताती हैं. आज भी होली की रंगतें देश के सांस्कृतिक वैविध्य में घुली मिली हैं. मान्यता और मिथक कुछ भी हों, कुछ भी कहें लेकिन भारत का सामाजिक तानाबाना तो मानो होली की मस्ती और रंग के रेशों से बुना गुंथा हुआ है. बेशक इसे तोड़ने वाले भी यही हैं और वे हर किस्म के सौहार्द को शक से और क्रोध से देखते आए हैं वे बस एक ही रंग जानते हैं जो हिंसा का डरावना रंग है लेकिन ये पर्व है ही ऐसा कि ऐसे रंगों को सोखता रहता है.

नजीर अकबराबादी की एक नज़्म हैः हिंद के गुलशन में जब आती है होली की बहार. वो कहते हैं, जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब/मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार/तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ/तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार

कमोबेश इसी भावना को अभिव्यक्त करते हुए कवि गुरू रबींद्रनाथ टैगोर ने अपनी रचना ऋतुरंगशाला में एक जगह लिखा है, “यह दोल(फाल्गुनी पूर्णिमा) पाने और न पाने की एक अजीब सी विवशता के बीच झुलाता है. एक ओर मिलनोत्सव है तो दूसरी तरफ विरह और बिलगाव. इन दोनों को छू-पाकर ही तो विश्व का हृदय दोल(झूला) झूल रहा है.”

जाने किन किन रूपों में होली मनाई जाती है इस देश में. ब्रज की होली, बरसाने की लठमार होली, पहाड़ों की शास्त्रीय संगीत की बैठकी और खड़ी होली, मालवा की होली, हरियाणा की धुलंडी, बंगाल की दोल यात्रा, महाराष्ट्र में खास गुलाल, पंजाब का होला, राजस्थान की फूलों की होली, छत्तीसगढ़ में लोकगीतों की लाग-डांट, बिहार यूपी का फगुआ और आदिवासी जन का भगोरिया, न जाने कितनी परंपराओं और फिर दुनिया के कई देश जहां रंग और पानी की हलचलों के अपने अपने प्रतीक उत्सव हैं.

मिथकीय आख्यानों में कृष्ण और राधा, शिव और पार्वती की ठिठोलियां होली के रंगों में सराबोर हैं. निश्छल-उन्मुक्त प्रेम ही होली की पहचान है. शायद अकेला उत्सव यही है जिसके लिए न जाने कितने लोकगीत लिखे गए होंगे. उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में कितनी भाषाओं बोलियों में. पहाड़ी लोककवि गिर्दा गाते थेः बांजबुरांस की कुमकुम मारो....डाना काना रंग दे बसंती नारंगी...पार्वती ज्यूं को झिलमिल चादर.....रंग में डूबकर अपने आपको विस्मृत करते हुए हमेशा हमेशा की याद में ढल जाओ, आओ होली मनाओ. नंददास ने जैसे कहा है...रंग रंगीली राधिका,। रंगी रंगीली पीय। इहि रंग भीनै नित बसो। नंददास के हीय। सब कुछ भूलकर एकात्म हो जाने का पर्व है होली. ये विस्मृति, होशोहवास भूल जाने या सुध खो देने की कमजोरी नहीं है. ये जैसे एक मस्ती की धुन है, एक आंतरिक आल्हाद. भूलों को भूलती हुई भूल. गल्तियों और नादानियों को भुलाने की घड़ी. परिपक्व हो जाने का क्षण.

लेकिन होली की मिठास और इसकी सादगी के नशे में कुछ और नाजायज भी घुल रहा है. कुछ अंधेरे तेजी से हमारे सामूहिक प्रकाश को निगलने के लिए बढ़े आ रहे हैं, उत्पाती हिंसाएं चारों ओर इकट्ठा हैं, बाजार की शक्तियां अलग अलग रूपों में हमें डराती हैं, सांप्रदायिक ताकतें वर्चस्व और समानुरूप पहचानें गढ़ने पर आमादा हैं. ऐसे इस कठिन समय में करुणा, प्रेम और क्षमा के रंगों की हिफाजत का काम और चुनौती भरा है.

इन्हें अक्षुण्ण रखने की कामना में हम भी शामिल होना चाहेंगे जैसी कामना कुमाऊं की बैठकी होली को शुरू करते हुए गणेश से की जाती हैः आज विघ्न हरो महाराज होली के दिन में.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादन: महेश झा