फांसी में फंसता भारत | दुनिया | DW | 18.02.2013
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दुनिया

फांसी में फंसता भारत

दुनिया को अहिंसा की ताकत बताने वाले महात्मा गांधी को सरेशाम गोली मार दी गई. हत्यारे को फांसी की सजा हुई. खुद गांधी के दो बेटों और नेहरू ने विरोध किया लेकिन नाथूराम को फंदे पर लटका दिया गया.

गांधी के बेटों और पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दलील थी कि जिस शख्स ने पूरा जीवन अहिंसा के लिए लड़ा हो, क्या उसकी हत्या के लिए फांसी जैसी हिंसक कार्रवाई सही होगी. एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स के प्रमुख सुहास चकमा इसे आज के वक्त से जोड़ते हैं, "महात्मा गांधी के हत्यारों को फांसी दी गई ताकि दूसरे लोग इससे सबक लें. लेकिन 1947 के बाद से आज तक हर दूसरे साल राजनीतिक हत्या हो रही है."

अफजल गुरु के बाद वीरप्पन के चार साथियों के फांसी का रास्ता साफ कर भारत ने विवादों का पिटारा खोल लिया है. चकमा का दावा है कि अगर यह जारी रहा तो भारत दुनिया का पांचवां सबसे ज्यादा फांसी देने वाला देश बन जाएगा. इसे "बदले का इंसाफ" करार देते हुए उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, "यहां औसतन हर तीसरे दिन एक आरोपी को फांसी की सजा सुनाई जा रही है. इस मामले में भारत से आगे सिर्फ चीन, सऊदी अरब, ईरान और इराक ही रहेंगे."

Indien/ Vergewaltigung/ Proteste

दिल्ली में बलात्कार कांड के बाद प्रदर्शन

क्या है दुर्लभों में दुर्लभ

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 1983 के फैसले में साफ कर दिया था कि सिर्फ "दुर्लभों में दुर्लभ" मामले में ही फांसी हो सकती है. लेकिन "दुर्लभों में दुर्लभ" क्या है और क्या वक्त के साथ इसकी परिभाषा बदलती है. वरिष्ठ वकील संजीव दुबे के मुताबिक हां, "यह हमेशा वक्त के साथ देखा जाता है. मिसाल के तौर पर अभी बलात्कार के मामले में. लेकिन इसके साथ ही दोषी की मानसिक स्थिति और उसकी पृष्ठभूमि भी देखी जाती है कि क्या वह ऐसी जगह पहुंच गया है, जहां कोई भी सजा उसे एक सभ्य नागरिक नहीं बना सकती."

भारत की जटिल कानूनी व्यवस्था और इंसाफ में होने वाली देरी के साथ "दुर्लभों में दुर्लभ" का मामला हमेशा व्यापक रहता है. हालांकि दुबे मानते हैं कि निचली अदालत, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के तीन स्तर पर जांच जाने के बाद सवाल की गुंजाइश नहीं होती. लेकिन पहली बार सजा सुनाने वाली निचली अदालतें अक्सर जन भावनाओं और "तथ्यों और परिस्थितिजन्य सबूतों" के आधार पर फैसला सुनाती हैं.

पिछले साल यानी 2012 में मुंबई हमलों के दोषी आमिर अजमल कसाब को फांसी दी गई और इस साल अफजल गुरु को. इससे पहले भारत में 2004 में ही फांसी हुई, जब एक नाबालिग के बलात्कार और हत्या के दोषी धनंजय चटर्जी को फांसी की सजा दी गई. इस बीच दुनिया के कई देशों ने फांसी की सजा खत्म कर दी और भारत से भी ऐसा करने की मांग होने लगी. पिछली राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने प्रावधान होने के बाद भी किसी को फांसी नहीं दी.

Mohammad Afzal Guru

अफजल गुरु की फांसी पर बहस जारी

मध्यकाल की विरासत

लेकिन प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनते ही फांसी की घटनाओं में तेजी आ गई. मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता और अफजल गुरु की वकील रह चुकी नंदिता हकसर का कहना है, "मृत्युदंड मध्यकाल की सबसे खराब विरासत में से एक है. मौत की सजा नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह कभी भी समस्या को हल नहीं करती है." जानकारों का मानना है कि भारत सरकार अगले चुनाव से पहले लोगों में सहानुभूति पैदा करने के लिए भी इस तरह के कदम उठा रही है.

चकमा का कहना है, "सुप्रीम कोर्ट ने इसका विकल्प तलाश लिया है. अगर किसी को जिंदगी भर जेल हो यानी 14 साल या 20 साल या 30 साल बाद भी वह जेल से बाहर न आ सके, तो उसकी जिंदगी जेल में ही खत्म होगी और इस तरह बड़े से बड़ा अपराधी भी समाज के लिए खतरा नहीं बन सकता."

दुनिया के 140 देशों ने मृत्युदंड खत्म कर दिया है. सुरक्षा जानकारों का कहना है कि यूरोप और अमेरिका के विकसित देश ऐसा कर सकते हैं, जहां लोगों के बीच साक्षरता और जागरूकता बहुत ज्यादा है, लेकिन ये नियम भारत पर भी नहीं लागू किए जा सकते. पर चकमा का दावा है, "नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों में भी भारत जैसी ही स्थिति है, जिन्होंने मौत की सजा खत्म कर दी है. इस काम के लिए आपको पश्चिम की तरफ देखने की जरूरत नहीं, बल्कि आप अपने दक्षिण और उत्तर में ही देख लें."

रिपोर्टः अनवर जे अशरफ

संपादनः ओंकार सिंह जनौटी

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