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दुनिया

फांसी पर बहस से पहले खुद को सुधारो: जस्टिस ढींगरा

भारत में मौत की सजा दी जानी चाहिए या नहीं, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एसएन ढींगरा इस बहस को बौद्धिक नूराकुश्ती मानते हैं. डॉयचे वेले से बातचीत में उन्होंने भारतीय न्यायपालिका की कमियां बताईं.

भारतीय न्यायपालिका में लंबा वक्त गुजार चुके जस्टिस शिवनारायण ढींगरा ने अपने कार्यकाल में तीन मामलों में मौत की सजा सुनाई. उन्होंने अफजल गुरु और 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में मृत्युदंड की सजा दी. मृत्युदंड के नैतिक पहलू पर डॉयचे वेले से बात करते हुए जस्टिस ढींगरा ने जज की कुर्सी पर बैठे हुए अपने वक्त को याद किया और कहा, "कोई भी जज मृत्युदंड शौक से नहीं देता है और न ही देना चाहता है. लेकिन कई बार हालात इस तरह के बन जाते हैं कि कठोर फैसला लेना पड़ता है."

जस्टिस ढींगरा से बातचीत के प्रमुख अंश..

डॉयचे वेले: सजा का काम सुधार है, जान से मारना नहीं हैं, मृत्युदंड का विरोध करने वाले यह तर्क देते हैं. आप जज रह चुके हैं, आप इस तर्क को कैसे देखते हैं?

जस्टिस ढींगरा: देखिए ये सिद्धांत हैं. एक सुधारवादी है और दूसरा दंड सिद्धांत है. तीसरी थ्योरी समाज के अंदर यह भय पैदा करने की है, जो कहती है कि अगर आप कानून का उल्लंघन करेंगे तो आपको भी दंड सहना पड़ेगा. ये सब अलग अलग सिद्धांत हैं, हर आदमी अपने सिद्धांत की बात कर सकता है. लेकिन कानून संसद द्वारा बनाए जाते हैं. जिस दिन संसद यह कह देगी कि कानून का काम सुधार करना है, तो कोई भी जज मृत्युदंड जैसी सजा नहीं देगा. जज कानून के हिसाब से चलते हैं, वे सिद्धांतों के मुताबिक नहीं चल सकते.

2014 में भारत सबसे ज्यादा मृत्युदंड सुनाने वाले देशों की सूची में चौथे नंबर पर रहा. व्यक्तिगत रूप से आप मृत्युदंड के पक्ष में है या विरोध में?

कुछ ऐसे मामलों में जहां कोई आदमी खुद इंसान नहीं रहता, वह पशुओं से भी बुरी मनोदशा दर्शाता है, उन मामलों में उच्चतम सजा देनी पड़ती है. जानवर भी तभी हमला करता है जब उसे भूख लगी होती है या फिर उसे अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस होने लगता है. लेकिन आदमी सिर्फ इस वजह से लोगों को मार दे कि उसे लूटना है, उसे किसी मिशन के तहत जाकर 20 लोगों को मारना है, ऐसे में कठोर सजा का मामला बनता है.

आज के हालात देखें तो हम कह सकते हैं कि अगर किसी को मृत्युदंड नहीं दिया जाना चाहिए, तो हमें यह भी कहना होगा कि किसी को आत्मरक्षा का अधिकार भी नहीं होना चाहिए. हम समाज की सुरक्षा के लिए पुलिस को बंदूक क्यों देते हैं? आत्मरक्षा का मतलब ही यह है कि हमें खुद को और समाज को ऐसे लोगों से सुरक्षित करना है. जघन्य मामलों को देखें तो पता चलता है कि कई अपराधी दूसरों को इंसान समझते ही नहीं हैं.

दुनिया के कई देश मृत्युदंड को खत्म कर चुके हैं और कइयों में में यह आज भी जारी है, इस अंतर को आप कैसे देखते हैं?

हर देश की संस्कृति और वहां का वातावरण अलग होता है, सामाजिक सोच अलग होती है, समाज का विकास अलग होता है. आप किन्हीं भी दो देशों की एक समान तुलना नहीं कर सकते. कई बार विरोध करने वाले ऐसी स्थिति से नहीं गुजरे होते हैं, जहां उन्होंने व्यक्तिगत रूप से ऐसे अपराध का सामना किया हो. लेकिन खुद को बौद्धिक दर्शाने के लिए किसी चीज का विरोध करना, इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता.

भारत में फिलहाल सबसे ज्यादा जरूरत न्यायिक और पुलिस सुधारों की है. उच्चतम सजा के ऊपर बहस बाद में हो सकती है, पहले न्यायिक और पुलिस सुधारों पर चर्चा होनी चाहिए. समाज को आप रातों रात नहीं बदल सकते हैं लेकिन कम से कम आप एक तंत्र में सुधार तो कर ही सकते हैं. भारत में मुश्किल यह है कि यहां कानूनों का संजीदगी से पालन होता ही नहीं है.

भारत में किस तरह के न्यायिक सुधारों की जरूरत है?

एक जज जिसने पूरी जिंदगी टैक्स संबंधी प्रैक्टिस की है, वह हाई कोर्ट का जज बनता है और उसे क्रिमिनल बेंच दे दी जाती है. वह क्रिमिनल लॉ के ऊपर अथॉरिटी बन जाता है. उसके फैसले ऐसे होते हैं जो कभी किसी ने सुने नहीं, देखे नहीं. हम अपनी अदालतों में स्पेशलाइजेशन नहीं लाते. हमें न्यायिक तंत्र को आसान बनाना होगा, ताकि एक मामला 20-20 साल न चले. इससे लोगों में यह संदेश जा रहा है कि सुनवाई क्या होती है, कुछ नहीं.

आज आलम यह है कि कोई मामला 10 साल निचली अदालत में चलता है, फिर 10 साल अपील कोर्ट में, उसके बाद 10-12 साल सुप्रीम कोर्ट में. तब तक 40 साल हो जाते हैं, मामले से जुड़े लोग बूढ़े हो जाते हैं या मर जाते हैं. हम इस चीज को नहीं सुधार रहे हैं, बल्कि हम यह बहस कर रहे हैं कि हमारे यहां मृत्युदंड दिया जाना चाहिए या नहीं.

भारत में कानूनी कार्रवाई में पैसा बड़ी भूमिका निभाता है. क्या आपको लगता है कि पैसा तय करता है कि न्याय मिलेगा या नहीं?

निचली अदालतों में यह स्थिति नहीं है. लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में जिन वकीलों की बात सुनी जाती है वे ज्यादातर वे लोग हैं जिनकी फेस वैल्यू होती है. अगर आप उन वकीलों में हैं, तो आप जज साहब के घर रात को जाकर भी बहस कर सकते हैं.

मुझे एलएम थापर का केस याद है. उनकी जमानत सीसीएम से खारिज हो गई थी, करीब रात को आठ बजे. लेकिन हाई कोर्ट और सेशंस कोर्ट को दरकिनार करते हुए उन्होंने सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज से उनके घर पर संपर्क किया. आधी रात को करीब 11 या 12 बजे उन्हें जमानत मिल गई. ऐसे कई मामले हैं जहां कुछ वकीलों के चलते मुवक्किलों को रविवार को भी जमानत मिली है. लेकिन रविवार को आम आदमी के लिए अदालत नहीं खुलती, उसकी सुनवाई आधी रात को भी नहीं होती. आदमी जेल में बिना सुनवाई के कई साल गुजार देता है, हो सकता है कि उसकी अपील लंबित ही हो. तो मृत्युदंड पर बहस करने से पहले हमें इस सिस्टम को ठीक करना होगा.

इंटरव्यू: ओंकार सिंह जनौटी

संपादन: ईशा भाटिया

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